{"_id":"6963a5a532b55c5af50be03c","slug":"records-of-chief-ministers-approval-and-cabinet-approval-were-not-found-in-the-chief-secretarys-office-bilaspur-news-c-92-1-ssml1001-151996-2026-01-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bilaspur News: मुख्य सचिव कार्यालय में नहीं मिला मुख्यमंत्री अनुमोदन और कैबिनेट मंजूरी का रिकॉर्ड","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bilaspur News: मुख्य सचिव कार्यालय में नहीं मिला मुख्यमंत्री अनुमोदन और कैबिनेट मंजूरी का रिकॉर्ड
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 11 Jan 2026 11:56 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई की वैधानिकता पर सवाल, आरटीआई से हुआ चौंकाने वाला खुलासा
14 वर्षों के भूमि अधिग्रहण और मुआवजा फैसले कानूनी चुनौती के घेरे में
अधिसूचना के अभाव में करोड़ों के फंड और प्रशासनिक शक्तियों पर उठे गंभीर सवाल
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के प्रोजेक्ट्स के लिए जमीनों का अधिग्रहण करने वाली ''विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई एक बड़े कानूनी विवाद में फंसती नजर आ रही है। सूचना के अधिकार के तहत हुए एक चौंकाने वाले खुलासे ने इस इकाई की वैधानिक स्थिति पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।
दरअसल, वर्ष 2011 में बिलासपुर मुख्यालय में एक विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई की स्थापना दिखाई गई थी। नियमत: किसी भी ऐसी इकाई के गठन के लिए प्रस्ताव को मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री के पूर्व अनुमोदन के साथ मंत्री परिषद के समक्ष रखा जाना अनिवार्य है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही इसकी विधिवत अधिसूचना जारी की जाती है। हाल ही में दायर एक आरटीआई आवेदन में जब मुख्य सचिव कार्यालय से इस पूरी प्रक्रिया और अधिसूचना की कॉपी मांगी गई, तो कार्यालय ने लिखित जवाब में कहा कि उक्त सूचना उनके अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है। मुख्य सचिव कार्यालय के इस जवाब ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि यदि मुख्य सचिव कार्यालय के पास मुख्यमंत्री के अनुमोदन और कैबिनेट ब्रीफिंग का रिकॉर्ड नहीं है, तो क्या इस इकाई की स्थापना के लिए कभी औपचारिक प्रक्रिया पूरी की भी गई थी या नहीं? रिकॉर्ड न मिलने की स्थिति में मुख्य सचिव कार्यालय ने इस आरटीआई को लोक निर्माण विभाग सेक्शन बी को ट्रांसफर करते हुए उन्हें जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। यह मामला केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं। पिछले 14 सालों से यह इकाई अरबों रुपये के मुआवजे और हजारों कनाल जमीन के अधिग्रहण के फैसले ले रही है। यदि इकाई की अधिसूचना ही अस्तित्व में नहीं है, तो इन सभी फैसलों को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। बिना किसी ठोस कानूनी आधार के एक सरकारी इकाई 14 साल तक कैसे काम करती रही? इस दौरान तैनात रहे प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार विभागों ने इस बुनियादी कमी को क्यों नजरअंदाज किया। एनएचएआई की ओर से दिए गए करोड़ों के फंड का प्रबंधन और वितरण इस इकाई द्वारा किया गया है। अधिसूचना के अभाव में इन वित्तीय लेन-देनों की ऑडिटिंग पर भी सवाल उठ सकते हैं। अब सारा दारोमदार लोक निर्माण विभाग पर है। विभाग को यह साबित करना होगा कि क्या उसके पास इस इकाई के गठन से संबंधित कोई वैध दस्तावेज है या नहीं। यदि लोक निर्माण विभाग भी रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहता है, तो यह माना जाएगा कि राज्य में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई पिछले डेढ़ दशक से बिना किसी संवैधानिक आधार के कार्य कर रही थी। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन शर्मा ने कहा कि क्या 2011 में महज कागजों पर खानापूर्ति कर इकाई शुरू कर दी गई। मुख्य सचिव कार्यालय जैसे संवेदनशील दफ्तर से इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब कैसे हो सकते हैं। अधिसूचना के बिना इस इकाई को बजट और शक्तियां किस आधार पर आवंटित की गईं।
Trending Videos
14 वर्षों के भूमि अधिग्रहण और मुआवजा फैसले कानूनी चुनौती के घेरे में
अधिसूचना के अभाव में करोड़ों के फंड और प्रशासनिक शक्तियों पर उठे गंभीर सवाल
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के प्रोजेक्ट्स के लिए जमीनों का अधिग्रहण करने वाली ''विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई एक बड़े कानूनी विवाद में फंसती नजर आ रही है। सूचना के अधिकार के तहत हुए एक चौंकाने वाले खुलासे ने इस इकाई की वैधानिक स्थिति पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।
दरअसल, वर्ष 2011 में बिलासपुर मुख्यालय में एक विशेष भूमि अधिग्रहण इकाई की स्थापना दिखाई गई थी। नियमत: किसी भी ऐसी इकाई के गठन के लिए प्रस्ताव को मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री के पूर्व अनुमोदन के साथ मंत्री परिषद के समक्ष रखा जाना अनिवार्य है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही इसकी विधिवत अधिसूचना जारी की जाती है। हाल ही में दायर एक आरटीआई आवेदन में जब मुख्य सचिव कार्यालय से इस पूरी प्रक्रिया और अधिसूचना की कॉपी मांगी गई, तो कार्यालय ने लिखित जवाब में कहा कि उक्त सूचना उनके अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है। मुख्य सचिव कार्यालय के इस जवाब ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि यदि मुख्य सचिव कार्यालय के पास मुख्यमंत्री के अनुमोदन और कैबिनेट ब्रीफिंग का रिकॉर्ड नहीं है, तो क्या इस इकाई की स्थापना के लिए कभी औपचारिक प्रक्रिया पूरी की भी गई थी या नहीं? रिकॉर्ड न मिलने की स्थिति में मुख्य सचिव कार्यालय ने इस आरटीआई को लोक निर्माण विभाग सेक्शन बी को ट्रांसफर करते हुए उन्हें जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। यह मामला केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं। पिछले 14 सालों से यह इकाई अरबों रुपये के मुआवजे और हजारों कनाल जमीन के अधिग्रहण के फैसले ले रही है। यदि इकाई की अधिसूचना ही अस्तित्व में नहीं है, तो इन सभी फैसलों को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। बिना किसी ठोस कानूनी आधार के एक सरकारी इकाई 14 साल तक कैसे काम करती रही? इस दौरान तैनात रहे प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार विभागों ने इस बुनियादी कमी को क्यों नजरअंदाज किया। एनएचएआई की ओर से दिए गए करोड़ों के फंड का प्रबंधन और वितरण इस इकाई द्वारा किया गया है। अधिसूचना के अभाव में इन वित्तीय लेन-देनों की ऑडिटिंग पर भी सवाल उठ सकते हैं। अब सारा दारोमदार लोक निर्माण विभाग पर है। विभाग को यह साबित करना होगा कि क्या उसके पास इस इकाई के गठन से संबंधित कोई वैध दस्तावेज है या नहीं। यदि लोक निर्माण विभाग भी रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहता है, तो यह माना जाएगा कि राज्य में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई पिछले डेढ़ दशक से बिना किसी संवैधानिक आधार के कार्य कर रही थी। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन शर्मा ने कहा कि क्या 2011 में महज कागजों पर खानापूर्ति कर इकाई शुरू कर दी गई। मुख्य सचिव कार्यालय जैसे संवेदनशील दफ्तर से इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब कैसे हो सकते हैं। अधिसूचना के बिना इस इकाई को बजट और शक्तियां किस आधार पर आवंटित की गईं।
विज्ञापन
विज्ञापन