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Chamba Bus Accident: बस पलटती रही, सुष्मिता ने नहीं छोड़ा सीट का हैंडल; ऐसे बची जिंदगी
Sun, 09 Aug 2026 10:44 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा।
संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 09 Aug 2026 10:44 AM IST
सार
चंबा के चलुंज मोड़ बस हादसे में घायल 32 वर्षीय सुष्मिता ने बस के कई बार पलटने के दौरान सीट का लोहे का हैंडल कसकर पकड़े रखा। बस रुकने के बाद वह बेहोश हो गईं। मेडिकल कॉलेज चंबा में प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें टांडा रेफर किया गया। सुष्मिता पर्यावरण पर रिसर्च के लिए 15 दिन से चुराह में रह रही थीं। पढ़ें पूरी खबर...
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सड़क हादसे में घायल सुष्मिता।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
बस सड़क से नीचे उतरते ही पलटने लगी। एक के बाद एक कई पलटे खाती बस के भीतर चीख-पुकार मच गई। हर तरफ अफरा-तफरी थी। इसी बीच 32 वर्षीय सुष्मिता ने अपनी सीट के लोहे के हैंडल को कसकर पकड़ लिया। बस लुढ़कती रही, लेकिन उन्होंने सीट का सहारा नहीं छोड़ा। उनके मन में उस वक्त सिर्फ एक ही बात थी कि किसी तरह जिंदगी बच जाए।
चलुंज बस हादसे में घायल सुष्मिता पुत्री प्रमोद कुमार निवासी अयोध्या को उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज चंबा लाया गया। हादसे की आपबीती बताते हुए उन्होंने कहा कि बस के पलटते समय उन्हें एक पल के लिए लगा कि शायद वह जिंदा नहीं बच पाएंगी। बस लगातार नीचे की ओर लुढ़कती रही और उन्होंने डर के बावजूद सीट के लोहे को मजबूती से थामे रखा।
कुछ देर बाद जब बस रुकी तो उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बेहोश हो गईं। हादसे में घायल सुष्मिता के शरीर पर चोटें आई हैं। मेडिकल कॉलेज चंबा में प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बेहतर उपचार के लिए टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
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सीट का सहारा बना जिंदगी की डोर
हादसे के दौरान सुष्मिता ने जिस तरह सीट के हैंडल को पकड़े रखा, वही उनके लिए बड़ा सहारा बना। बस के कई बार पलटने के दौरान उन्होंने पकड़ नहीं छोड़ी। हादसे के उस खौफनाक पल को याद करते हुए उनके चेहरे और आवाज में डर साफ झलक रहा था। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार के बाद उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें टांडा रेफर किया गया है। फिलहाल उनकी जिंदगी डॉक्टरों के भरोसे है।
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चलुंज बस हादसे में घायल सुष्मिता पुत्री प्रमोद कुमार निवासी अयोध्या को उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज चंबा लाया गया। हादसे की आपबीती बताते हुए उन्होंने कहा कि बस के पलटते समय उन्हें एक पल के लिए लगा कि शायद वह जिंदा नहीं बच पाएंगी। बस लगातार नीचे की ओर लुढ़कती रही और उन्होंने डर के बावजूद सीट के लोहे को मजबूती से थामे रखा।
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कुछ देर बाद जब बस रुकी तो उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बेहोश हो गईं। हादसे में घायल सुष्मिता के शरीर पर चोटें आई हैं। मेडिकल कॉलेज चंबा में प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बेहतर उपचार के लिए टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
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सीट का सहारा बना जिंदगी की डोर
हादसे के दौरान सुष्मिता ने जिस तरह सीट के हैंडल को पकड़े रखा, वही उनके लिए बड़ा सहारा बना। बस के कई बार पलटने के दौरान उन्होंने पकड़ नहीं छोड़ी। हादसे के उस खौफनाक पल को याद करते हुए उनके चेहरे और आवाज में डर साफ झलक रहा था। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार के बाद उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें टांडा रेफर किया गया है। फिलहाल उनकी जिंदगी डॉक्टरों के भरोसे है।
15 दिन से चुराह में कर रही थीं पर्यावरण पर रिसर्च
सुष्मिता पर्यावरण से जुड़े विषय पर शोध के लिए अयोध्या से चुराह पहुंची थीं। करीब 15 दिन से वह क्षेत्र में रहकर अपनी रिसर्च पूरी करने में जुटी थीं। शनिवार को वह बैरागढ़ से चंबा के लिए निजी बस में सवार हुई थीं। बस अभी करीब एक किलोमीटर ही आगे पहुंची थी कि अचानक हादसा हो गया। कुछ ही पलों में शोध के सिलसिले में शुरू हुआ उनका सफर जिंदगी और मौत की जंग में बदल गया।
घायल हालत में कहीं अपने परिवार को लेकर कही यह बात
मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान सुष्मिता दर्द से कराह रही थीं। इसी दौरान उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि अगर उनकी मौत हो जाए तो उनके घरवालों को इसकी सूचना न दी जाए। उन्होंने इसके पीछे यह वजह बताई कि घरवाले उनसे प्यार नहीं करते। हालांकि, उनके इस कथन के पीछे की वास्तविक परिस्थितियां क्या हैं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इस संबंध में उनके परिजनों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल चिकित्सक उनका उपचार कर रहे हैं।
एक सफर, जो जिंदगी की जंग में बदल गया
पर्यावरण पर शोध के लिए चुराह आईं सुष्मिता शनिवार को सामान्य तरीके से बस में सवार हुई थीं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनट बाद उन्हें जिंदगी बचाने के लिए सीट का हैंडल पकड़कर बस के साथ लुढ़कना पड़ेगा। हादसे में घायल होने के बावजूद उनका सीट का सहारा नहीं छोड़ना उनके बचने की सबसे अहम तस्वीर बनकर सामने आया है।
सुष्मिता पर्यावरण से जुड़े विषय पर शोध के लिए अयोध्या से चुराह पहुंची थीं। करीब 15 दिन से वह क्षेत्र में रहकर अपनी रिसर्च पूरी करने में जुटी थीं। शनिवार को वह बैरागढ़ से चंबा के लिए निजी बस में सवार हुई थीं। बस अभी करीब एक किलोमीटर ही आगे पहुंची थी कि अचानक हादसा हो गया। कुछ ही पलों में शोध के सिलसिले में शुरू हुआ उनका सफर जिंदगी और मौत की जंग में बदल गया।
घायल हालत में कहीं अपने परिवार को लेकर कही यह बात
मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान सुष्मिता दर्द से कराह रही थीं। इसी दौरान उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि अगर उनकी मौत हो जाए तो उनके घरवालों को इसकी सूचना न दी जाए। उन्होंने इसके पीछे यह वजह बताई कि घरवाले उनसे प्यार नहीं करते। हालांकि, उनके इस कथन के पीछे की वास्तविक परिस्थितियां क्या हैं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इस संबंध में उनके परिजनों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल चिकित्सक उनका उपचार कर रहे हैं।
एक सफर, जो जिंदगी की जंग में बदल गया
पर्यावरण पर शोध के लिए चुराह आईं सुष्मिता शनिवार को सामान्य तरीके से बस में सवार हुई थीं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनट बाद उन्हें जिंदगी बचाने के लिए सीट का हैंडल पकड़कर बस के साथ लुढ़कना पड़ेगा। हादसे में घायल होने के बावजूद उनका सीट का सहारा नहीं छोड़ना उनके बचने की सबसे अहम तस्वीर बनकर सामने आया है।