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Hamirpur (Himachal) News: कारगिल के बलिदानियों की याद में आज भी नम हो जाती हैं आंखें
Sun, 26 Jul 2026 01:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Sun, 26 Jul 2026 01:26 AM IST
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हमीरपुर। कारगिल युद्ध को 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उस दौर की यादें आज भी बलिदानियों के परिजनों की आंखें नम कर देती हैं। किसी के पास पति की आखिरी चिट्ठी है तो किसी के मन में भाई की अंतिम विदाई का दृश्य आज भी ताजा है।
समय बीत गया, लेकिन अपनों को खोने का दर्द और उनके बलिदान पर गर्व आज भी बरकरार है। ऊहल निवासी कारगिल युद्ध के वीर बलिदानी 14 जैक राइफल के जवान कश्मीर सिंह के बेटे सुरेंद्र ठाकुर बताते हैं कि उनकी मां के नाम पिता का लिखा आखिरी पत्र आज भी पूरे परिवार को भावुक कर देता है।
पत्र में लिखा था, मैं कारगिल में हूं। ऊपर से जहाज उड़ रहे हैं। लगातार बमबारी हो रही है, पता नहीं क्या होगा। यह पत्र करीब 20 मई 1999 को घर पहुंचा था। इसके महज 15 दिन बाद, 5 जून को उनके पिता के बलिदान का समाचार मिला।
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उस समय सुरेंद्र नौ वर्ष और उनकी बहन सात वर्ष की थी। वह बताते हैं कि तब वे इतने छोटे थे कि पूरी बात समझ नहीं पाते थे, लेकिन घर का माहौल और कारगिल युद्ध की चर्चाएं आज भी याद हैं। उनका कहना है कि पिता की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती, लेकिन इस बात का गर्व हमेशा रहेगा कि उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
वहीं, काच प्लाही निवासी कर्मचंद अपने छोटे भाई राकेश कुमार को याद करते हुए आज भी भावुक हो जाते हैं। राकेश कुमार 27 जैक राइफल में सिपाही के पद पर तैनात थे। कर्मचंद बताते हैं कि कारगिल युद्ध शुरू होने से करीब दो महीने पहले ही वह ड्यूटी पर गए थे।
घर से निकलते समय वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहे थे। उस समय मन में अजीब-सी आशंका हुई थी, जो बाद में सच साबित हुई। कर्मचंद कहते हैं कि भाई के बलिदान का दर्द आज भी दिल में जिंदा है और यह ऐसा जख्म है, जो कभी नहीं भर सकता।
कारगिल विजय दिवस पर ऐसे परिवारों की आंखों में अपने वीर सपूतों की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। दर्द के साथ उनके चेहरे पर यह गर्व भी साफ झलकता है कि उनके अपने देश की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक डटे रहे और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। संवाद
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समय बीत गया, लेकिन अपनों को खोने का दर्द और उनके बलिदान पर गर्व आज भी बरकरार है। ऊहल निवासी कारगिल युद्ध के वीर बलिदानी 14 जैक राइफल के जवान कश्मीर सिंह के बेटे सुरेंद्र ठाकुर बताते हैं कि उनकी मां के नाम पिता का लिखा आखिरी पत्र आज भी पूरे परिवार को भावुक कर देता है।
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पत्र में लिखा था, मैं कारगिल में हूं। ऊपर से जहाज उड़ रहे हैं। लगातार बमबारी हो रही है, पता नहीं क्या होगा। यह पत्र करीब 20 मई 1999 को घर पहुंचा था। इसके महज 15 दिन बाद, 5 जून को उनके पिता के बलिदान का समाचार मिला।
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उस समय सुरेंद्र नौ वर्ष और उनकी बहन सात वर्ष की थी। वह बताते हैं कि तब वे इतने छोटे थे कि पूरी बात समझ नहीं पाते थे, लेकिन घर का माहौल और कारगिल युद्ध की चर्चाएं आज भी याद हैं। उनका कहना है कि पिता की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती, लेकिन इस बात का गर्व हमेशा रहेगा कि उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
वहीं, काच प्लाही निवासी कर्मचंद अपने छोटे भाई राकेश कुमार को याद करते हुए आज भी भावुक हो जाते हैं। राकेश कुमार 27 जैक राइफल में सिपाही के पद पर तैनात थे। कर्मचंद बताते हैं कि कारगिल युद्ध शुरू होने से करीब दो महीने पहले ही वह ड्यूटी पर गए थे।
घर से निकलते समय वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहे थे। उस समय मन में अजीब-सी आशंका हुई थी, जो बाद में सच साबित हुई। कर्मचंद कहते हैं कि भाई के बलिदान का दर्द आज भी दिल में जिंदा है और यह ऐसा जख्म है, जो कभी नहीं भर सकता।
कारगिल विजय दिवस पर ऐसे परिवारों की आंखों में अपने वीर सपूतों की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। दर्द के साथ उनके चेहरे पर यह गर्व भी साफ झलकता है कि उनके अपने देश की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक डटे रहे और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। संवाद