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हिमाचल प्रदेश: फसलों के दुश्मन कीटों को खत्म करेंगे हिमालयी कवक, सेब के बगीचों में परीक्षण शुरू

Thu, 29 Oct 2026 06:15 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 29 Oct 2026 06:15 AM IST
सार

उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में ऐसे कवकों की विविधता सामने आई है, जो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को संक्रमित कर मार सकते हैं। 

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Himachal Pradesh: Himalayan fungi to reduce pesticide burden; trials underway in apple orchards
सेब बागवानी । - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल में प्राकृतिक कवकों की मदद से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की उम्मीद बढ़ी है। उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में ऐसे कवकों की विविधता सामने आई है, जो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को संक्रमित कर मार सकते हैं। इनमें क्लोनोस्टैकिस फंगस वूली एफिड के नियंत्रण में कारगर पाया गया है। प्रयोगशाला में सफल प्रयोग के बाद अब इसका सेब के बगीचों में परीक्षण किया जा रहा है। एचपीयू के शोधकर्ता दिनेश कुमार भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) के क्षेत्रीय केंद्र शिमला के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संतोष वाटपाड़े और सहायक प्राध्यापक डॉ. नीलम कुमारी के निर्देशन में यह अध्ययन कर रहे हैं।

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राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया शोधपत्र
शोध को हाल ही में केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। शोधपत्र के अनुसार एंटोमोपैथोजेनिक फंगी यानी कीट रोगजनक कवक प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव हैं। उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में मिले ये सूक्ष्मजीव कीटों और अन्य संधिपाद जीवों को संक्रमित कर मार सकते हैं। इन्हें संक्रमित कीटों, मिट्टी और पौधों से जुड़े प्राकृतिक आवासों से एकत्र कर जांच के बाद अलग किया जाता है। अलग-अलग कवकों की कीटों को संक्रमित करने की क्षमता और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होने की योग्यता का आकलन किया जा सकता है। इससे एकीकृत कीट प्रबंधन में इनके इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

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व्यावहारिक परिणामों का परीक्षण जरूरी
हालांकि खेतों में उपयोग से पहले इनकी क्षमता, सुरक्षा और व्यावहारिक परिणामों का परीक्षण जरूरी है। कवकों के व्यवस्थित संग्रह और पहचान से भविष्य में जैविक कीटनाशक विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने और रासायनिक कीटनाशकों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करने की संभावनाएं हैं।

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आठ प्रमुख वंशों के कवकों की पहचान
अध्ययन में एकेंथोमाइसेस, ब्यूवेरिया, क्लोनोस्टैकिस, कॉर्डिसेप्स, लेकेनिसिलियम, लियांगिया, पर्पुरियोसिलियम और सैमसोनिएला वंशों के कवकों की पहचान की गई है। इसके लिए उनकी बाहरी संरचना और आणविक विशेषताओं का विश्लेषण किया गया। इसमें आईटीएस, बीटा-ट्यूबुलिन, एलएसयू, टीईएफ-एक अल्फा और आरपीबी-एक व आरपीबी-दो जैसे आनुवंशिक संकेतकों का इस्तेमाल किया गया।

कई अन्य कवकों से औषधियां बनाने की संभावना
डॉ. संतोष वाटपाड़े ने बताया कि क्लोनोस्टैकिस फंगस वूली एफिड को खत्म करने में कारगर पाया गया है। आने वाले समय में यह सेब बगीचों के लिए उपयोगी हो सकता है। प्रयोगशाला में इसका सफल प्रयोग हुआ है और अब खेतों में परीक्षण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कई अन्य कवकों से भी बेहतरीन औषधियां तैयार की जा सकती हैं।

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