हाईकोर्ट का आदेश: चिकित्सा दावों के सत्यापन-निपटारे के लिए तीन दिन में तैनात करें अतिरिक्त डॉक्टर
प्रदेश हाईकोर्ट ने आयुष्मान भारत और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं के तहत लंबित चिकित्सा दावों के भुगतान में देरी पर कड़ा रुख अपनाया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आयुष्मान भारत और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं के तहत लंबित चिकित्सा दावों के भुगतान में देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य स्वास्थ्य एजेंसी और हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य बीमा योजना सोसायटी को आदेश दिया है कि वे दावों के त्वरित सत्यापन और निपटारे के लिए तीन दिनों के भीतर अतिरिक्त डॉक्टरों की तैनाती करें। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच चल रहे वित्तीय गतिरोध पर दोनों पक्षों को तीन सप्ताह में अपना रुख स्पष्ट करने का आदेश दिया है।
तुरंत भुगतान राशि जारी की जाए: कोर्ट
अब मामले में 16 जून को सुनवाई होगी, जिसमें नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के निदेशक और प्रतिवादी सीईओ स्वास्थ्य बीमा योजना सोसायटी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहना होगा। अदालत ने साफ किया है कि इस विवाद के बीच जिन याचिकाकर्ताओं के दावों का सत्यापन पूरा हो चुका है, उन्हें तुरंत भुगतान राशि जारी की जाए। अदालत के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार राज्य में हजारों चिकित्सा दावे डायलिसिस के अलावा अन्य मामले लंबित हैं। कोर्ट न निर्देश दिए कि डायलिसिस मामलों के लिए 3 और अन्य मामलों के लिए 7 डॉक्टरों की विशेष तैनाती की जाए। मामले की अगली स्टेटस रिपोर्ट 5 जून को पेश होगी।
सुनवाई के दौरान बजट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया
सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार के बीच आयुष्मान भारत योजना के तहत खर्च होने वाले बजट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। केंद्र सरकार ने 2018 के समझौता ज्ञापन का हवाला देते हुए कहा कि योजना के तहत प्रति परिवार अधिकतम वार्षिक राष्ट्रीय सीमा 1,052 रुपये तय की गई है। केंद्र इसका 90 फीसदी (946.80 रुपये) वहन करता है और राज्य को 10 फीसदी देना होता है। शर्तों के मुताबिक, यदि वास्तविक खर्च इस तय सीमा से ऊपर जाता है, तो अतिरिक्त वित्तीय बोझ पूरी तरह राज्य सरकार को उठाना होगा। राज्य के महाधिवक्ता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह योजना इस रूप में व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई नियंत्रण तंत्र नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कुल खर्च तय सीमा के भीतर ही रहे। पूरा ट्रांजैक्शन मैनेजमेंट सिस्टम केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। केंद्र को वास्तविक खर्च का 90 फीसदी हिस्सा देना चाहिए, जिसके लिए कई पत्र लिखे गए हैं पर जवाब नहीं मिला।
जीएसटी मामलों में व्यापारियों को दोहरी जांच से मिलेगी राहत, समानांतर कार्यवाही पर लगाई रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून के तहत व्यापारियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक ही समयसीमा और एक ही विषय पर केंद्र और राज्य दोनों के जीएसटी अधिकारियों द्वारा एक साथ समानांतर कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया है कि करदाताओं को बेवजह की दोहरी जांच से परेशान न किया जाए। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसले मैसर्स आर्मर सिक्योरिटी मामले का हवाला दिया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि जीएसटी अधिनियम की धारा 6(2)(बी) के तहत अगर किसी एक अथॉरिटी (केंद्र या राज्य) ने पहले कार्यवाही शुरू कर दी है, तो दूसरी अथॉरिटी उसी विषय पर समानांतर अदालती कार्यवाही नहीं कर सकती। हालांकि समन जारी करना या सबूत जुटाना जांच का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसला या टैक्स रिकवरी की समानांतर प्रक्रिया पूरी तरह प्रतिबंधित है। अदालत ने याचिकाकर्ता कंपनी को निर्देश दिया है कि वह 30 जून तक केंद्र और राज्य के अधिकारियों के समक्ष अपने सभी सहायक दस्तावेजों के साथ नया और विस्तृत जवाब दाखिल करे।
याचिकाकर्ता का जवाब मिलने के बाद राज्य जीएसटी अथॉरिटी, केंद्रीय अथॉरिटी से संपर्क करेगी। दोनों विभाग आपस में यह तय करेंगे कि इस मामले की आगे की कार्यवाही कौन सा विभाग (केंद्र या राज्य) संभालेगा। पूरी फाइल उसी एक विभाग को ट्रांसफर कर दी जाएगी। विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह व्यापारी को अपनी बात रखने का पूरा मौका दे और आपत्ति दर्ज होने के छह सप्ताह के भीतर एक स्पष्ट व तर्कसंगत आदेश पारित करे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि तय समय के भीतर व्यापारी अपना जवाब दाखिल नहीं करता है, तो विभाग कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होगा, लेकिन किसी भी सूरत में समानांतर कार्यवाही नहीं चलाई जाएगी। याचिकाकर्ता कंपनियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। राज्य कर अधिकारियों ने उनके खिलाफ वित्तीय वर्ष 2019-20 और 2020-21 के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किए थे। हैरानी की बात यह थी कि इसी समान अवधि और इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय जीएसटी प्राधिकरण भी पहले ही नोटिस जारी कर जांच शुरू कर चुका था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि एक ही मामले पर दो अलग-अलग विभागों द्वारा एक साथ कार्यवाही चलाना कानूनन गलत है।
न्यायिक बुनियादी ढांचे का मामला, हाईकोर्ट में बोले सीएस-कैबिनेट बैठक में रखा जाएगा
प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक बुनियादी ढांचे की अनदेखी पर फिलहाल राज्य सरकार को बड़ी राहत दी है। मामले की सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव संजय गुप्ता स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। उन्होंने बताया कि मंत्रिपरिषद की महत्वपूर्ण बैठक होने की संभावना है। मुख्य सचिव ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि इस बैठक में मामले को सरकार के सर्वोच्च स्तर पर सुलझा लिया जाएगा। अदालत ने भले ही सरकार को समय दे दिया है, लेकिन साथ ही सख्त रुख अपनाते हुए मुख्य सचिव को एक निर्देश भी जारी किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि मुख्य सचिव को अदालत द्वारा पारित पिछले आदेश के संदर्भ में एक संयुक्त हलफनामा दायर करना होगा, जिसमें कोर्ट के पिछले निर्देशों पर की गई कार्यवाही का पूरा ब्योरा देना होगा। सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता ने भी अदालत को भरोसा दिलाया कि वह इस विषय को लेकर व्यक्तिगत रूप से कैबिनेट से अनुरोध करेंगे, जिससे मामले का कोई सकारात्मक और स्थायी समाधान निकाला जा सके। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्यवाही को 18 जून तक के लिए स्थगित कर दिया है।