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Kangra News: संपत्ति विवाद में बार-बार मुकदमा करने पर अदालत ने ठोका जुर्माना
Mon, 20 Jul 2026 08:13 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 20 Jul 2026 08:13 PM IST
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धर्मशाला। एक ही मुद्दे पर बार-बार मुकदमेबाजी करना अपीलकर्ताओं को भारी पड़ गया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश पालमपुर धीरू ठाकुर की अदालत ने करीब 19 वर्ष पुराने संपत्ति विवाद में एक सिविल अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट के निर्णय को यथावत बनाए रखा और बार-बार समान मुद्दों पर मुकदमा दायर करने पर अपीलकर्ताओं को 3,000 रुपये जुर्माना (खर्च) लगाया है।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें वाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए केवल भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी गई थी, जबकि विवादित भूमि पर स्वामित्व और अन्य सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया गया था। दरअसल अपीलकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के 23 सितंबर 2019 के निर्णय को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि मृतक ने पंचायत समझौते के तहत भरण-पोषण के बदले उन्हें 9 कनाल भूमि दी थी और बाद में की गई जमीन की बिक्री व वसीयत पूरी तरह अवैध व धोखाधड़ी का परिणाम थी।
अपीलीय अदालत ने जब साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया तो पाया कि वर्ष 1978 में अपीलकर्ता के पक्ष में पारित भरण-पोषण का आदेश तो प्रमाणित है, लेकिन जिस पंचायत समझौते का हवाला दिया जा रहा है, उसमें विवादित भूमि का खसरा नंबर दर्ज ही नहीं था। ऐसे में यह साबित नहीं हो सका कि संबंधित नौ कनाल भूमि वही विवादित खसरा नंबर है जिस पर दावा किया जा रहा है।
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भूमि की बिक्री और उसके पैतृक होने का मामला पहले ही सक्षम अदालतों द्वारा तय किया जा चुका है, इसलिए इन मुद्दों पर दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती। अपीलकर्ता वसीयत को भी दबाव या धोखाधड़ी से बना साबित करने में पूरी तरह असफल रहे, जिसके चलते अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
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अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें वाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए केवल भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी गई थी, जबकि विवादित भूमि पर स्वामित्व और अन्य सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया गया था। दरअसल अपीलकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के 23 सितंबर 2019 के निर्णय को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि मृतक ने पंचायत समझौते के तहत भरण-पोषण के बदले उन्हें 9 कनाल भूमि दी थी और बाद में की गई जमीन की बिक्री व वसीयत पूरी तरह अवैध व धोखाधड़ी का परिणाम थी।
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अपीलीय अदालत ने जब साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया तो पाया कि वर्ष 1978 में अपीलकर्ता के पक्ष में पारित भरण-पोषण का आदेश तो प्रमाणित है, लेकिन जिस पंचायत समझौते का हवाला दिया जा रहा है, उसमें विवादित भूमि का खसरा नंबर दर्ज ही नहीं था। ऐसे में यह साबित नहीं हो सका कि संबंधित नौ कनाल भूमि वही विवादित खसरा नंबर है जिस पर दावा किया जा रहा है।
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भूमि की बिक्री और उसके पैतृक होने का मामला पहले ही सक्षम अदालतों द्वारा तय किया जा चुका है, इसलिए इन मुद्दों पर दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती। अपीलकर्ता वसीयत को भी दबाव या धोखाधड़ी से बना साबित करने में पूरी तरह असफल रहे, जिसके चलते अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।