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Kangra News: जायके और सेहत के साथ आजीविका का आधार बना पहाड़ का हरा सोना

Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 15 May 2026 06:24 AM IST
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Green gold of the mountains becomes the basis of livelihood along with taste and health.
शाहपुर के बोह की रहने वाली कांता देवी और गुडो देवी लुंगड़ू बेचते हुए। डीपीआर
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धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश की दुर्गम पहाड़ियों और धौलाधार की वादियों के आंचल में इन दिनों हरा सोना चमक रहा है। यह सोना कोई धातु नहीं, बल्कि प्रकृति का अनमोल उपहार लुंगड़ू है। अप्रैल की पहली फुहार के साथ सितंबर तक उगने वाला यह जंगली पौधा केवल औषधीय गुणों से भरपूर एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि देवभूमि की संस्कृति, परंपरा और पहाड़ की महिलाओं की आजीविका का मुख्य आधार बन चुका है।
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वैज्ञानिक रूप से डिप्लाजियम मैक्सिमम कहलाने वाला लुंगड़ू औषधीय गुणों की खान है। विटामिन-ए, बी-कॉम्प्लेक्स, आयरन और फोलिक एसिड से भरपूर यह सब्जी एनीमिया और पेट की बीमारियों के लिए रामबाण मानी जाती है। इसमें मौजूद हाई फाइबर इसे आधुनिक डाइट का हिस्सा बनाते हैं। स्वाद में हल्का कसैला दिखने वाला यह पौधा उबलने के बाद जब मसालों के साथ मिलता है तो इसका जायका मांसाहार को भी मात देता है।
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पहाड़ की नारी शक्ति के लिए लुंगड़ू मेहनत और स्वावलंबन का प्रतीक है। शाहपुर के धारकंडी, करेरी, सल्ली और बोह में यह प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। इन क्षेत्रों की महिलाएं सीजन शुरू होने पर सूर्योदय से पहले ही मीलों दूर जंगलों की ओर निकल पड़ती हैं। दिनभर इसे तोड़कर एकत्रित करती हैं। इसके बाद जंगली रास्तों के बीच 10 से 15 किलो का भार पीठ पर उठाकर ये महिलाएं घर पहुंचती हैं और दूसरे दिन बाजारों में। कभी अनाज के बदले बिकने वाला लुंगड़ू आज बाजार में अच्छी कीमत पर बिक रहा है, जिससे ग्रामीण परिवारों को आर्थिक संबल मिल रहा है।
अप्रैल में तैयार होने वाला लुगड़ूं कांगड़ा और चंबा की परंपरिक धामों में भी शामिल हो गया है। लुंगड़ू का मदरा कांगड़ी धाम की शान बन चुका है। इसके अलावा स्वयं सहायता समूहों ने इसके अचार को डिब्बाबंद कर शहरों तक पहुंचा दिया है। धर्मशाला, बैजनाथ, पालमपुर और बरोट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से निकलने वाला यह उत्पाद अब केवल गांव की रसोई तक सीमित नहीं, बल्कि हिमाचल की ऑर्गेनिक पहचान बन चुका है।

कठिन है डगर, पर इसी से चलता है घर
जंगलों से लुंगड़ू इकट्ठा कर बाजार तक पहुंचाने वाली महिलाओं का संघर्ष और उनकी सफलता किसी प्रेरणा से कम नहीं है। बोह की कांता देवी और गुडो देवी कहती हैं कि हम सूरज निकलने से पहले ही जंगल की ओर निकल जाते हैं। कई किलोमीटर की सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है और घने जंगलों में जाना पड़ता है। जब शाम को 15-20 किलो लुंगड़ू इकट्ठा कर घर लौटते हैं तो थकान के बावजूद हमें संतोष होता है। पहले गांव के लोगों को अनाज के बदले लुंगड़ू देते थे, अब बाजार में अच्छी कीमत मिलने से पैसा मिल रहा है। शहरों के लोग खास तौर पर इसे ढूंढते हैं। आज कांगड़ी धाम और बड़े होटलों में लुंगड़ू का मदरा बनने लगा है। मेहनत बहुत है पर आजीविका के लिए हम हर चुनौती को पार करती हैं।
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