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Kangra News: पूर्व वितरक के 5.36 लाख लौटाएगी हाउसवेयर कंपनी, कोर्ट ने दिए आदेश
Mon, 13 Jul 2026 07:17 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 13 Jul 2026 07:17 AM IST
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धर्मशाला। एक हाउसवेयर कंपनी को अपने पूर्व वितरक के बकाया 5.36 लाख रुपये लौटाने होंगे। सिविल जज-2 धर्मशाला डॉ. पार्थ जैन की अदालत ने कंपनी के खिलाफ वसूली का दावा आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 5,36,226.15 रुपये की अदायगी के साथ वाद दायर किए जाने की तिथि से भुगतान होने तक नौ फीसदी वार्षिक ब्याज और वाद व्यय देने के आदेश दिए हैं।
धर्मशाला निवासी वादी ने अदालत को बताया कि वह वर्ष 2014 से जिला कांगड़ा में इस कंपनी का वितरक था। वर्ष 2019 में कंपनी ने बिना सूचना दिए उसके व्यावसायिक क्षेत्र के भीतर दूसरा वितरक नियुक्त कर दिया। विरोध करने पर कंपनी ने उसे कार्य बंद करने और स्टॉक वापस करने को कहा। वर्ष 2021 में कंपनी ने स्टॉक तो वापस ले लिया, लेकिन भुगतान नहीं किया।
इस पर वादी ने 12 फीसदी ब्याज के साथ वसूली का मामला दायर किया था। अदालत ने पाया कि वादी ने तीन कर चालानों के माध्यम से 5,36,226.15 रुपये के स्टॉक का दावा प्रमाणित किया है, जबकि अतिरिक्त 21,254.75 रुपये के डेबिट नोट का कोई साक्ष्य नहीं मिला। मामले की सुनवाई के दौरान नोटिस के बावजूद कंपनी अदालत में उपस्थित नहीं हुई, जिसके चलते उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्रवाई की गई। अदालत ने 12 फीसदी ब्याज की मांग को अनुचित मानते हुए 9 फीसदी वार्षिक ब्याज को न्यायोचित माना और वादी के पक्ष में डिक्री पारित कर दी।
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धर्मशाला निवासी वादी ने अदालत को बताया कि वह वर्ष 2014 से जिला कांगड़ा में इस कंपनी का वितरक था। वर्ष 2019 में कंपनी ने बिना सूचना दिए उसके व्यावसायिक क्षेत्र के भीतर दूसरा वितरक नियुक्त कर दिया। विरोध करने पर कंपनी ने उसे कार्य बंद करने और स्टॉक वापस करने को कहा। वर्ष 2021 में कंपनी ने स्टॉक तो वापस ले लिया, लेकिन भुगतान नहीं किया।
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इस पर वादी ने 12 फीसदी ब्याज के साथ वसूली का मामला दायर किया था। अदालत ने पाया कि वादी ने तीन कर चालानों के माध्यम से 5,36,226.15 रुपये के स्टॉक का दावा प्रमाणित किया है, जबकि अतिरिक्त 21,254.75 रुपये के डेबिट नोट का कोई साक्ष्य नहीं मिला। मामले की सुनवाई के दौरान नोटिस के बावजूद कंपनी अदालत में उपस्थित नहीं हुई, जिसके चलते उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्रवाई की गई। अदालत ने 12 फीसदी ब्याज की मांग को अनुचित मानते हुए 9 फीसदी वार्षिक ब्याज को न्यायोचित माना और वादी के पक्ष में डिक्री पारित कर दी।
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