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Mandi News: एनएचएआई की याचिका खारिज, मुआवजा बढ़ाने का आदेश बरकरार
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मंडी। जिला न्यायाधीश मंडी की अदालत ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की भूमि अधिग्रहण मुआवजा से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में भूमि अधिग्रहण से संबंधित बढ़े हुए मुआवजे को चुनौती दी गई थी। अदालत ने मध्यस्थ के आदेश को सही ठहराते हुए भूमि मालिकों के पक्ष में दिए गए मुआवजे को बरकरार रखा।
मामले के तथ्यों के अनुसार यह मामला राष्ट्रीय राजमार्ग-21 के बिलासपुर से नेरचौक खंड के चौड़ीकरण से जुड़ा है। मंडी जिले के सुंदरनगर क्षेत्र के गांव भरजवानू में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी। अधिग्रहण के बाद सक्षम प्राधिकारी ने 2 मई 2016 को पुरस्कार पारित करते हुए भूमि मालिकों को 36 लाख रुपये प्रति बीघा मुआवजा तय किया था। इससे असंतुष्ट भूमि मालिकों ने मध्यस्थ के समक्ष मुआवजा बढ़ाने की मांग की। सुनवाई के बाद मध्यस्थ ने 19 जून 2023 को मुआवजा बढ़ाकर 44.20 लाख रुपये प्रति बीघा निर्धारित किया। साथ ही भूमि मालिकों को सभी वैधानिक लाभ तथा पहले वर्ष 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया।
एनएचएआई ने इस आदेश को जिला न्यायालय में चुनौती दी थी। अदालत ने सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि धारा 34 के तहत अदालत की भूमिका सीमित है और वह तथ्यों की पुनः समीक्षा नहीं कर सकती। न्यायालय ने माना कि मध्यस्थ ने कानून के दायरे में रहते हुए उचित और तर्कसंगत आदेश पारित किया है। इसी आधार पर एनएचएआई की याचिका खारिज कर दी गई। संवाद
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मामले के तथ्यों के अनुसार यह मामला राष्ट्रीय राजमार्ग-21 के बिलासपुर से नेरचौक खंड के चौड़ीकरण से जुड़ा है। मंडी जिले के सुंदरनगर क्षेत्र के गांव भरजवानू में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी। अधिग्रहण के बाद सक्षम प्राधिकारी ने 2 मई 2016 को पुरस्कार पारित करते हुए भूमि मालिकों को 36 लाख रुपये प्रति बीघा मुआवजा तय किया था। इससे असंतुष्ट भूमि मालिकों ने मध्यस्थ के समक्ष मुआवजा बढ़ाने की मांग की। सुनवाई के बाद मध्यस्थ ने 19 जून 2023 को मुआवजा बढ़ाकर 44.20 लाख रुपये प्रति बीघा निर्धारित किया। साथ ही भूमि मालिकों को सभी वैधानिक लाभ तथा पहले वर्ष 9 प्रतिशत और उसके बाद 15 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया।
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एनएचएआई ने इस आदेश को जिला न्यायालय में चुनौती दी थी। अदालत ने सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि धारा 34 के तहत अदालत की भूमिका सीमित है और वह तथ्यों की पुनः समीक्षा नहीं कर सकती। न्यायालय ने माना कि मध्यस्थ ने कानून के दायरे में रहते हुए उचित और तर्कसंगत आदेश पारित किया है। इसी आधार पर एनएचएआई की याचिका खारिज कर दी गई। संवाद