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Sirmour News: अदालत ,
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निचली अदालत का आदेश पलटा, झूठे
अपहरण केस में हर्जाने की मांग खारिज
- 2008 में दर्ज हुआ था अपहरण का मामला, जिला जज ने महिला की अपील मंजूर करते हुए 5 लाख का दावा किया खारिज
- 2015 में आरोपी हुआ था बरी, 18 साल चले मुकदमे के बाद बरी हुए व्यक्ति को नहीं मिला मुआवजा
- जिला अदालत ने कहा : सिर्फ बरी होना प्रमाण नहीं, हर्जाने के लिए ठोस सबूत जरूरी
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। जिला न्यायालय ने झूठे आपराधिक मुकदमे के आधार पर मांगे गए 5 लाख रुपये के हर्जाने के दावे को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बरी हो जाना ही “दुर्भावनापूर्ण अभियोजन” साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हर्जाने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
करीब 18 साल पुराने इस मामले में वर्ष 2008 में अपहरण का केस दर्ज किया गया था। जांच के दौरान कथित पीड़िता ने पुलिस के सामने बयान दिया कि घटना हुई ही नहीं थी। पुलिस जांच में मामला संदिग्ध पाया गया और कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर दी गई, लेकिन विरोध के चलते आरोपी को लंबा ट्रायल झेलना पड़ा। 31 दिसंबर 2015 को अदालत ने उसे बरी कर दिया। इसके बाद आरोपी ने अपनी प्रतिष्ठा और आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए 5 लाख रुपये हर्जाने की मांग की थी। इसे 29 मार्च 2025 को निचली अदालत ने स्वीकार कर लिया था। हालांकि, इस फैसले को चुनौती देते हुए नाहन निवासी सुनीता देवी ने अपील दायर की।
जिला न्यायाधीश योगेश जसवाल ने फैसले में कहा कि हर्जाना पाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मुकदमा बिना उचित कारण और दुर्भावना से दर्ज किया गया था। केवल यह तथ्य कि मुकदमा अंत में खत्म हो गया या आरोपी बरी हो गया, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के पास उस समय ऐसी परिस्थितियां थीं, जिनसे उसे संदेह हो सकता था। ऐसे में पुलिस में शिकायत दर्ज कराना पूरी तरह से अनुचित नहीं कहा जा सकता। फैसले में कहा गया कि वादी (हर्जाना मांगने वाले) यह साबित नहीं कर सका कि आरोप जानबूझकर झूठे और दुर्भावना से लगाए गए थे। न तो स्वतंत्र साक्ष्य पेश किया गया और न ही यह साबित हुआ कि शिकायतकर्ताओं का उद्देश्य केवल बदनाम करना था।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने अपील मंजूर कर निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए हर्जाने का दावा खारिज कर दिया।
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अपहरण केस में हर्जाने की मांग खारिज
- 2008 में दर्ज हुआ था अपहरण का मामला, जिला जज ने महिला की अपील मंजूर करते हुए 5 लाख का दावा किया खारिज
- 2015 में आरोपी हुआ था बरी, 18 साल चले मुकदमे के बाद बरी हुए व्यक्ति को नहीं मिला मुआवजा
- जिला अदालत ने कहा : सिर्फ बरी होना प्रमाण नहीं, हर्जाने के लिए ठोस सबूत जरूरी
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। जिला न्यायालय ने झूठे आपराधिक मुकदमे के आधार पर मांगे गए 5 लाख रुपये के हर्जाने के दावे को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बरी हो जाना ही “दुर्भावनापूर्ण अभियोजन” साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हर्जाने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
करीब 18 साल पुराने इस मामले में वर्ष 2008 में अपहरण का केस दर्ज किया गया था। जांच के दौरान कथित पीड़िता ने पुलिस के सामने बयान दिया कि घटना हुई ही नहीं थी। पुलिस जांच में मामला संदिग्ध पाया गया और कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर दी गई, लेकिन विरोध के चलते आरोपी को लंबा ट्रायल झेलना पड़ा। 31 दिसंबर 2015 को अदालत ने उसे बरी कर दिया। इसके बाद आरोपी ने अपनी प्रतिष्ठा और आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए 5 लाख रुपये हर्जाने की मांग की थी। इसे 29 मार्च 2025 को निचली अदालत ने स्वीकार कर लिया था। हालांकि, इस फैसले को चुनौती देते हुए नाहन निवासी सुनीता देवी ने अपील दायर की।
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जिला न्यायाधीश योगेश जसवाल ने फैसले में कहा कि हर्जाना पाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मुकदमा बिना उचित कारण और दुर्भावना से दर्ज किया गया था। केवल यह तथ्य कि मुकदमा अंत में खत्म हो गया या आरोपी बरी हो गया, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के पास उस समय ऐसी परिस्थितियां थीं, जिनसे उसे संदेह हो सकता था। ऐसे में पुलिस में शिकायत दर्ज कराना पूरी तरह से अनुचित नहीं कहा जा सकता। फैसले में कहा गया कि वादी (हर्जाना मांगने वाले) यह साबित नहीं कर सका कि आरोप जानबूझकर झूठे और दुर्भावना से लगाए गए थे। न तो स्वतंत्र साक्ष्य पेश किया गया और न ही यह साबित हुआ कि शिकायतकर्ताओं का उद्देश्य केवल बदनाम करना था।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने अपील मंजूर कर निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए हर्जाने का दावा खारिज कर दिया।
