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Sirmour News: अदालत 4
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पति को नहीं देना होगा पत्नी को भरण-पोषण, बेटी के लिए 5 हजार तय
- घरेलू हिंसा मामले में जेएमएफसी का फैसला, अलग रहने के लिए 3,000 किराया भी देना होगा
- आवेदन आंशिक रूप से मंजूर, बेटी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी तय
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। शिलाई क्षेत्र में घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए पति को पत्नी के बजाय बेटी के लिए भरण-पोषण देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने पति को दोनों के लिए अलग मकान के लिए 3 हजार रुपये प्रतिमाह किराया देने का भी आदेश दिया गया। जेएमएफसी विकास कपूर की अदालत ने माना कि महिला वर्तमान में अपने मायके में रह रही है। उसे अपने माता-पिता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
यह मामला मनीषा बनाम आदित्य के बीच का है। मामले में पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी ने अदालत में याचिका दायर कर 10 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण और रहने के लिए घर की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि विवाह के बाद महिला को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी गई और उसे घर से निकाल दिया गया। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि महिला एक निजी संस्था में कार्यरत है और उसे करीब 8 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है।
अदालत ने पाया कि इस आय की जानकारी शुरू में याचिका में नहीं दी गई थी, बल्कि बाद में दस्तावेजों से सामने आई। वहीं, पति की आय या संपत्ति के स्पष्ट प्रमाण अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने कहा कि भले ही पति की आय स्पष्ट न हो, लेकिन पिता होने के नाते वह बेटी के पालन-पोषण का जिम्मेदार है। ऐसे में अदालत ने नाबालिग बेटी के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण तय किया। अदालत ने अंतरिम संरक्षण आदेश देने से इन्कार करते हुए आवेदन को आंशिक रूप से मंजूर किया और मामले को मुख्य केस के साथ जोड़ने के निर्देश दिए।
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- आवेदन आंशिक रूप से मंजूर, बेटी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी तय
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। शिलाई क्षेत्र में घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए पति को पत्नी के बजाय बेटी के लिए भरण-पोषण देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने पति को दोनों के लिए अलग मकान के लिए 3 हजार रुपये प्रतिमाह किराया देने का भी आदेश दिया गया। जेएमएफसी विकास कपूर की अदालत ने माना कि महिला वर्तमान में अपने मायके में रह रही है। उसे अपने माता-पिता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
यह मामला मनीषा बनाम आदित्य के बीच का है। मामले में पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी ने अदालत में याचिका दायर कर 10 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण और रहने के लिए घर की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि विवाह के बाद महिला को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी गई और उसे घर से निकाल दिया गया। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि महिला एक निजी संस्था में कार्यरत है और उसे करीब 8 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है।
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अदालत ने पाया कि इस आय की जानकारी शुरू में याचिका में नहीं दी गई थी, बल्कि बाद में दस्तावेजों से सामने आई। वहीं, पति की आय या संपत्ति के स्पष्ट प्रमाण अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अदालत ने कहा कि भले ही पति की आय स्पष्ट न हो, लेकिन पिता होने के नाते वह बेटी के पालन-पोषण का जिम्मेदार है। ऐसे में अदालत ने नाबालिग बेटी के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण तय किया। अदालत ने अंतरिम संरक्षण आदेश देने से इन्कार करते हुए आवेदन को आंशिक रूप से मंजूर किया और मामले को मुख्य केस के साथ जोड़ने के निर्देश दिए।
