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Sirmour News: अदालत,
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एससी/एसटी एक्ट केस में जीएम बरी
गवाहों के बयान और देरी बनी वजह
- 10 साल पुराने मामले में सबूत नहीं जुटा पाई पुलिस, एक साल देरी से दर्ज एफआईआर पर भी उठे सवाल
- साल 2016 को पांवटा साहिब का मामला, गवाहों के बयान में विरोधाभास, स्वतंत्र साक्ष्य का अभाव
- कंपनी के एक श्रमिक ने जनरल मैनेजर पर लगाए थे जातिसूचक और धमकी देने के आरोप
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। करीब एक दशक पुराने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में विशेष अदालत ने फैसला सुनाते हुए आरोपी कंपनी के जनरल मैनेजर राजीव महाजन को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामला वर्ष 2016 का है। एक श्रमिक ने आरोप लगाया था कि फैक्ट्री परिसर में उसके साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और उसे धमकाया गया। इस शिकायत पर करीब एक साल बाद 24 दिसंबर 2017 में पांवटा साहिब थाने में एफआईआर दर्ज हुई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे 12 नवंबर 2016 को फैक्ट्री गेट पर बुलाकर सहकर्मियों के सामने अपमानित किया गया। साथ ही जातिसूचक शब्द कहे गए और विरोध करने पर थप्पड़ मारकर नौकरी छोड़ने को कहा गया।
विशेष न्यायाधीश योगेश जसवाल की अदालत ने फैसले में कई अहम बिंदुओं पर ध्यान दिया। इसमें घटना के करीब एक साल बाद एफआईआर दर्ज होना, मुख्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास, स्वतंत्र गवाहों का समर्थन न मिलना और शिकायतकर्ता की पहले की शिकायतों में जातीय अपमान का जिक्र न होना शामिल हैं। कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में आरोपों की पुष्टि नहीं होती। अदालत ने कहा कि जब तक आरोप ठोस सबूतों से सिद्ध न हों, तब तक सजा नहीं दी जा सकती। इन परिस्थितियों में संदेह का लाभ उत्तराखंड के जिला देहरादून निवासी राजीव महाजन को दिया जाना चाहिए।
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धमकी से “डर” साबित नहीं, धारा 506 भी नहीं बनी
कोर्ट ने यह भी पाया कि कथित धमकी से शिकायतकर्ता को डर या खतरा होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जो आईपीसी की धारा 506 के तहत जरूरी तत्व है। इसके चलते आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
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गवाहों के बयान और देरी बनी वजह
- 10 साल पुराने मामले में सबूत नहीं जुटा पाई पुलिस, एक साल देरी से दर्ज एफआईआर पर भी उठे सवाल
- साल 2016 को पांवटा साहिब का मामला, गवाहों के बयान में विरोधाभास, स्वतंत्र साक्ष्य का अभाव
- कंपनी के एक श्रमिक ने जनरल मैनेजर पर लगाए थे जातिसूचक और धमकी देने के आरोप
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। करीब एक दशक पुराने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में विशेष अदालत ने फैसला सुनाते हुए आरोपी कंपनी के जनरल मैनेजर राजीव महाजन को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामला वर्ष 2016 का है। एक श्रमिक ने आरोप लगाया था कि फैक्ट्री परिसर में उसके साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और उसे धमकाया गया। इस शिकायत पर करीब एक साल बाद 24 दिसंबर 2017 में पांवटा साहिब थाने में एफआईआर दर्ज हुई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे 12 नवंबर 2016 को फैक्ट्री गेट पर बुलाकर सहकर्मियों के सामने अपमानित किया गया। साथ ही जातिसूचक शब्द कहे गए और विरोध करने पर थप्पड़ मारकर नौकरी छोड़ने को कहा गया।
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विशेष न्यायाधीश योगेश जसवाल की अदालत ने फैसले में कई अहम बिंदुओं पर ध्यान दिया। इसमें घटना के करीब एक साल बाद एफआईआर दर्ज होना, मुख्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास, स्वतंत्र गवाहों का समर्थन न मिलना और शिकायतकर्ता की पहले की शिकायतों में जातीय अपमान का जिक्र न होना शामिल हैं। कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में आरोपों की पुष्टि नहीं होती। अदालत ने कहा कि जब तक आरोप ठोस सबूतों से सिद्ध न हों, तब तक सजा नहीं दी जा सकती। इन परिस्थितियों में संदेह का लाभ उत्तराखंड के जिला देहरादून निवासी राजीव महाजन को दिया जाना चाहिए।
धमकी से “डर” साबित नहीं, धारा 506 भी नहीं बनी
कोर्ट ने यह भी पाया कि कथित धमकी से शिकायतकर्ता को डर या खतरा होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जो आईपीसी की धारा 506 के तहत जरूरी तत्व है। इसके चलते आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
