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हिमाचल प्रदेश: शादी में शराब परोसने पर प्रतिबंध, डीजे एक दिन बजेगा, काम करने वालों के लिए नहीं कटेगा बकरा

संवाद न्यूज एजेंसी, नघेता (सिरमौर)। Published by: अंकेश डोगरा Updated Tue, 13 Jan 2026 06:00 AM IST
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सार

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र के टौरू गांव के लोगों ने बच्चे के जन्म, शादी, मृत्यु भोज जैसे आयोजनों में खर्च कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। पढ़ें पूरी खबर...

Himachal Sirmour Ban on serving alcohol at weddings DJ will play one day goat will not be cut for workers
आंज भोज के टौरू गांव में आयोजित बैठक में भाग लेते ग्रामीण। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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बदलते समय में शादियों और अन्य सामाजिक आयोजनों में बढ़ती दिखावे की प्रवृत्ति आम लोगों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। कई परिवार इन आयोजनों के लिए कर्ज लेने या जमीन बेचने तक को मजबूर हो जाते हैं। इसी समस्या को देखते हुए सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र के टौरू गांव के लोगों ने बच्चे के जन्म, शादी, मृत्यु भोज जैसे आयोजनों में खर्च कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन फैसलों में शादी में शराब परोसने पर प्रतिबंध, डीजे एक दिन ही बजाने समेत काम करने वालों के लिए बकरा नहीं काटना मुख्य हैं।

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गिरिपार क्षेत्र के टौरू गांव के अतर सिंह तोमर, उदय राम तोमर, गंगा सिंह तोमर ने बताया कि ऐसे फैसले लेने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना और अनावश्यक खर्च रोकना है। उन्होंने बताया कि गांव में होने वाली पलटोज पार्टी (शादी के बाद लड़की पक्ष की पार्टी) को सीमित किया जाएगा। अब सिर्फ अपने बेड़े (केवल अपना परिवार और साथ लगते घर) और गांव के प्रमुख लोगों को ही कार्यक्रम में बुलाया जाएगा। गांव में करीब 450 घर हैं, जिसमें अपने गांव से शादी कर गई लड़की उनके बच्चों को मिलाकर तकरीबन 1,000 लोग हो जाते थे। बाहर से मेहमान को अगर जोड़ दें तो संख्या 1,500 से अधिक हो जाती थी।

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यहां शादी पांच दिन तक चलती है। पहले दिन मामा स्वागत, दूसरे दिन बरात, रात को मुख्य भोज, तीसरे दिन नेवदा रस्म, चौथे दिन पलटोज, पांचवें दिन टोलुवा (जो लोग शादी में हेला प्रथा के तहत निशुल्क काम करते हैं) के लिए भी अलग से भोज दिया जाता है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आयोजन बड़ा खर्चीला पड़ता है। ऐसे में कर्ज तक की नौबत आ जाती है। निर्णय लिया गया कि प्रचलित दसूठन (बच्चे के जन्म के बाद होने वाले कार्यक्रम) की परंपरा अब केवल बड़े पुत्र के जन्म पर ही की जाएगी। जन्म लेने वाले पुत्र या पुत्री के अवसर पर मात्र चार-पांच निकटतम परिवारों को आमंत्रित किया जाएगा। शादी-विवाह में शराब नहीं पिलाई जाएगी।

गांव में शराब की बिक्री पर भी पूर्ण रोक रहेगी। महिलाओं को दिए जाने वाले घी, शक्कर, चीनी, सिक्के, कपड़े, बर्तन या किसी भी प्रकार के उपहार पूर्णतः बंद किए गए हैं। महिलाओं एवं पुरुषों को दिए जाने वाले दिन के टोलूवा का बकरा देने की प्रथा समाप्त की गई है। डीजे एक दिन ही बजेगा। गांव में किसी की भी मृत्यु के बाद शोक एवं बरसी के कार्यक्रम केवल बेड़े तक सीमित रहेंगे। 13 दिन का शोक रखने वाले परिवार के अतिरिक्त बेड़े से केवल दो–तीन लोगों को ही आमंत्रित किया जाएगा।इसके पहले शिलाई तहसील के द्राबिल गांव में भी इसी तरह की शुरुआत की गई थी। वहां भी भोज एक दिन का ही किया गया है।

एक साल में बचेंगे एक करोड़ रुपये से अधिक
ग्रामीणों की मानें तो यहां एक शादी पर 400 परिवारों को बुलाने और पांच दिनों तक कार्यक्रम चलने पर अमुमन 10 से 15 लाख तक खर्च आ जाता है। यदि एक साल में 10 ही शादियां हों तब भी डेढ़ करोड़ का खर्च आता है। नए निर्णयों के बाद शादी का खर्च घटकर 5 लाख तक रह जाएगा। ऐसे में सीधे एक करोड़ के करीब बचेंगे।
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