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नाहन कोर्ट की सख्त टिप्पणी: 10 साल के रिश्ते को माना सहमति का मामला, दुष्कर्म का केस नहीं; जानें विस्तार से

दीपक मेहता, नाहन (सिरमौर)। Published by: अंकेश डोगरा Updated Sat, 24 Jan 2026 06:00 AM IST
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सार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि केवल विवाह न होने के आधार पर लंबे समय तक चले संबंधों (रिश्तों) को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वहीं, अदालत ने आरोपी को सशर्त जमानत दे दी। पढ़ें पूरी खबर...

Nahan court observation A 10-year relationship considered a consensual matter not a case of misdeed
कोर्ट का आदेश  - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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विवाह का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोप से जुड़े एक मामले में जिला न्यायालय ने अहम टिप्पणी करते हुए आरोपी को सशर्त जमानत दे दी। विशेष न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल विवाह न होने के आधार पर लंबे समय तक चले संबंधों (रिश्तों) को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने माना कि दोनों पक्षों के बीच 10 साल तक संबंध रहे और शिकायतकर्ता बालिग थी। इस स्तर पर मामला सहमति का प्रतीत होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब तक की जांच में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि संबंध धोखाधड़ी या दबाव में बनाए गए थे।

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यह मामला 26 अक्तूबर 2025 को माजरा थाना में पंजीकृत किया गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि पांवटा साहिब निवासी खेम सिंह ने विवाह का भरोसा देकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इन्कार कर दिया। दलील दी गई कि यह न केवल उसके आत्मसम्मान का उल्लंघन है, बल्कि उसके मानसिक जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। अदालत ने आदेश में कहा कि विवाह न होने के आधार पर इस स्तर पर इसे दुष्कर्म की श्रेणी में रखना उचित नहीं माना जा सकता। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को जमानत देते हुए जांच में सहयोग करने, गवाहों को प्रभावित न करने और अदालत में नियमित पेशी की शर्तें लगाई। साथ ही आरोपी को थाना प्रभारी माजरा को सूचना दिए बिना लगातार सात दिनों तक वर्तमान पते से बाहर न जाने के निर्देश दिए हैं। शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में जमानत रद्द की जा सकेंगी।

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आरोपी की जमानत दो बार हो चुकी थी खारिज
इससे पहले 7 नवंबर 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) और 20 नवंबर 2025 को उच्च न्यायालय ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर चुके हैं। पुलिस मामले की जांच आईपीसी की धारा 64(1), 351(2), 352, 3(5) के साथ एससी/एसटी एक्ट 3(1),(r)(s) के तहत कर रही है।
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