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Una News: बिनौला खल के दाम 5000 रुपये प्रति क्विंटल पार
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Mon, 06 Apr 2026 05:47 AM IST
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टकारला से पशुपालक वनीत शर्मा
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एक माह में 500 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ गए दाम
कम पैदावार और असमय बारिश से कपास की फसल को हुआ नुकसान
विजय कपिला
बडूही (ऊना)। क्षेत्र में बिनौला खल (कॉटनसीड खल) के दामों ने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बाजार में इसकी कीमत 5000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गई है, जिससे पशुपालकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
हालात ऐसे हैं कि अब पशुओं को बिनौला खल डालना कई पशुपालकों के लिए मुश्किल हो गया है। पिछले महीने इसके भाव करीब 4500 रुपये प्रति क्विंटल थे, लेकिन एक महीने में 500 रुपये से अधिक की बढ़ोतरी ने पशुपालकों की आय पर सीधा असर डाला है।
जानकारों के अनुसार बिनौला खल की कीमतों में इस भारी उछाल के कई कारण हैं। इस वर्ष कम पैदावार और असमय बारिश के कारण कपास की फसल को काफी नुकसान हुआ, जिससे आपूर्ति घट गई। वहीं, खाड़ी देशों में तनावपूर्ण हालात के चलते वैश्विक स्तर पर तेल और तिलहन की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर स्थानीय बाजारों पर भी पड़ा है।
इसके अलावा माल ढुलाई (ट्रांसपोर्ट) के खर्च में बढ़ोतरी और उर्वरकों के महंगे होने से उत्पादन लागत भी बढ़ी है। भारत में डेयरी उद्योग की बढ़ती मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतों में और तेजी आई है।
कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते अब पशुपालक गेहूं का दर्ड, सरसों खल और अन्य पशु आहार का उपयोग कर रहे हैं। इससे बाजार में बिनोला खल की मांग और बिक्री में भी कमी दर्ज की जा रही है।
बिनोला खल, कपास (कॉटन) के बीज से तैयार किया जाता है। भारत में कपास का उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में होता है।
पशु चिकित्सालय चूरूडू से डॉ. मोहित कुमार का कहना है की दुधारू पशुओं के लिए खल बहुत जरूरी होती है लेकिन अगर पशुपालक अपने घर में मोटा अनाज गेहूं, मक्की , चौकर, थोड़ी मात्रा में खल, गुड़ आदि का संतुलित मिक्सर बनाकर पशुओं को दें तो काफ़ी हद तक पशुपालकों को राहत मिल सकती है ।
बाक्स
पहले वे नियमित रूप से पशुओं को बिनौला खल देते थे, लेकिन अब दाम इतने ज्यादा हो गए हैं कि इसे खरीदना मुश्किल हो गया है। इसलिए अब पशुओं को कम मात्रा में खल दी जा रही है। -संदीप ठाकुर, चूरूडू से किसान व डेयरी संचालक
बाक्स
उन्होंने बिनौला खल की जगह गेहूं का दर्ड और अन्य पशु आहार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। मजबूरी में विकल्प ढूंढने पड़ रहे हैं, क्योंकि खर्च लगातार बढ़ रहा है। -वनीत शर्मा, टकारला के पशुपालक
बाक्स
पहले बिनौला खल की बिक्री अच्छी रहती थी, लेकिन अब ग्राहक कम हो गए हैं। लोग या तो कम मात्रा में खरीद रहे हैं या फिर पूरी तरह विकल्पों की ओर जा रहे हैं। - सतीश महता, स्थानीय दुकानदार
इस बार सप्लाई काफी कम है और ट्रांसपोर्ट और आयात खर्च भी बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय हालातों का सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है, इसलिए दाम बढ़ना स्वाभाविक है। -कमलजीत सिंह, खन्ना (पंजाब) के थोक विक्रेता
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कम पैदावार और असमय बारिश से कपास की फसल को हुआ नुकसान
विजय कपिला
बडूही (ऊना)। क्षेत्र में बिनौला खल (कॉटनसीड खल) के दामों ने इस बार सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बाजार में इसकी कीमत 5000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गई है, जिससे पशुपालकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
हालात ऐसे हैं कि अब पशुओं को बिनौला खल डालना कई पशुपालकों के लिए मुश्किल हो गया है। पिछले महीने इसके भाव करीब 4500 रुपये प्रति क्विंटल थे, लेकिन एक महीने में 500 रुपये से अधिक की बढ़ोतरी ने पशुपालकों की आय पर सीधा असर डाला है।
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जानकारों के अनुसार बिनौला खल की कीमतों में इस भारी उछाल के कई कारण हैं। इस वर्ष कम पैदावार और असमय बारिश के कारण कपास की फसल को काफी नुकसान हुआ, जिससे आपूर्ति घट गई। वहीं, खाड़ी देशों में तनावपूर्ण हालात के चलते वैश्विक स्तर पर तेल और तिलहन की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर स्थानीय बाजारों पर भी पड़ा है।
इसके अलावा माल ढुलाई (ट्रांसपोर्ट) के खर्च में बढ़ोतरी और उर्वरकों के महंगे होने से उत्पादन लागत भी बढ़ी है। भारत में डेयरी उद्योग की बढ़ती मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतों में और तेजी आई है।
कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते अब पशुपालक गेहूं का दर्ड, सरसों खल और अन्य पशु आहार का उपयोग कर रहे हैं। इससे बाजार में बिनोला खल की मांग और बिक्री में भी कमी दर्ज की जा रही है।
बिनोला खल, कपास (कॉटन) के बीज से तैयार किया जाता है। भारत में कपास का उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में होता है।
पशु चिकित्सालय चूरूडू से डॉ. मोहित कुमार का कहना है की दुधारू पशुओं के लिए खल बहुत जरूरी होती है लेकिन अगर पशुपालक अपने घर में मोटा अनाज गेहूं, मक्की , चौकर, थोड़ी मात्रा में खल, गुड़ आदि का संतुलित मिक्सर बनाकर पशुओं को दें तो काफ़ी हद तक पशुपालकों को राहत मिल सकती है ।
बाक्स
पहले वे नियमित रूप से पशुओं को बिनौला खल देते थे, लेकिन अब दाम इतने ज्यादा हो गए हैं कि इसे खरीदना मुश्किल हो गया है। इसलिए अब पशुओं को कम मात्रा में खल दी जा रही है। -संदीप ठाकुर, चूरूडू से किसान व डेयरी संचालक
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उन्होंने बिनौला खल की जगह गेहूं का दर्ड और अन्य पशु आहार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। मजबूरी में विकल्प ढूंढने पड़ रहे हैं, क्योंकि खर्च लगातार बढ़ रहा है। -वनीत शर्मा, टकारला के पशुपालक
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पहले बिनौला खल की बिक्री अच्छी रहती थी, लेकिन अब ग्राहक कम हो गए हैं। लोग या तो कम मात्रा में खरीद रहे हैं या फिर पूरी तरह विकल्पों की ओर जा रहे हैं। - सतीश महता, स्थानीय दुकानदार
इस बार सप्लाई काफी कम है और ट्रांसपोर्ट और आयात खर्च भी बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय हालातों का सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है, इसलिए दाम बढ़ना स्वाभाविक है। -कमलजीत सिंह, खन्ना (पंजाब) के थोक विक्रेता

टकारला से पशुपालक वनीत शर्मा