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CRPF: पदोन्नति के इंतजार में 6000 इंस्पेक्टर, सहायक कमांडेंट बनने में लगेंगे 200 साल, हाईकोर्ट पहुंचा मामला
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सार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में विभिन्न रैंकों पर पदोन्नति मिलने का इंतजार लंबा होता जा रहा है। सीआरपीएफ में ग्रुप ए के कैडर अधिकारियों की पदोन्नति का मुद्दा अभी तक सुलझा नहीं है।
CRPF
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में विभिन्न रैंकों पर पदोन्नति मिलने का इंतजार लंबा होता जा रहा है। सीआरपीएफ में ग्रुप ए के कैडर अधिकारियों की पदोन्नति का मुद्दा अभी तक सुलझा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के बाद अब यह मामला बतौर 'केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) बिल, 2026', संसद में पहुंच चुका है। दूसरी तरफ ग्रुप बी में शामिल इंस्पेक्टर भी अब पदोन्नति में हो रही देरी को लेकर मुखर होने लगे हैं। पदोन्नति के इंतजार में बैठे सीआरपीएफ के 6000 इंस्पेक्टरों को सहायक कमांडेंट बनने में 200 साल से ज्यादा वक्त लगेगा। फिलहाल यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंच गया है।
कैसे होगी 22000 कार्मिकों की पदोन्नति ...
सीआरपीएफ में सहायक कमांडेंट (एसी) की पदोन्नति की फीडर पोस्ट एसआई और इंस्पेक्टर हैं। बल में लगभग 6000 इंस्पेक्टर और 16000 एसआई हैं। सवाल है कि अब 22000 कार्मिकों को पदोन्नति कब मिलेगी। पहले बल की एक कंपनी में एक 'एसी' और एक 'इंस्पेक्टर' होता था।
2019 में जब ग्रुप बी का कैडर रिव्यू हुआ तो एक कंपनी में तीन इंस्पेक्टर कर दिए गए, जबकि एसी एक ही रह गया। इससे पदोन्नति में तीन गुणा ज्यादा ठहराव आ गया। पहले पांच साल में इंस्पेक्टर से एसी बनते थे। अब 17 साल में ज्यादा समय लग रहा है। यह इंतजार साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। 2009 के इंस्पेक्टर अब भी इंस्पेक्टर हैं। हर साल 30-40 एसी बनते हैं। अभी 6000 इंस्पेक्टर कतार में हैं। पदोन्नति की यही गति रही तो यह इंतजार 200 साल के पार पहुंच जाएगा।
याचिकाकर्ताओं ने मजबूती से रखा पक्ष ...
न्याय के लिए मुखर सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों (जीडी) का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंचा है। केस की पहली सुनवाई हाल ही में हुई है। यह मामला सप्लीमेंट्री कॉज लिस्ट में सूचीबद्ध था। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल की पीठ के समक्ष जब यह मामला आया तो प्रारंभिक स्तर पर अदालत ने याचिका वापस लेने का सुझाव दिया। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष को मजबूती से रखते हुए भर्ती और पदोन्नति प्रणाली में व्याप्त खामियों को विस्तार से अदालत के समक्ष रखा। सुनवाई के बाद न्यायालय ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दे दी। केस की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
इस नियम को दी गई चुनौती ...
याचिका में मुख्य रूप से सीआरपीएफ के ग्रुप 'ए' अधिकारी भर्ती नियम, 2010 को चुनौती दी गई है। इसमें विशेषकर सहायक कमांडेंट (जीडी) के पद पर 50 प्रतिशत सीधी भर्ती का प्रावधान शामिल है। याचिकाकर्ता, जो वर्ष 2005 में सब-इंस्पेक्टर के रूप में भर्ती हुए और 2009 में इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नत हुए, उनका कहना है कि वे पिछले 16–17 वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत हैं। यूपीएससी के माध्यम से होने वाली बड़ी मात्रा में सीधी भर्ती ने उनके पदोन्नति के अवसरों को लगभग समाप्त कर दिया है। यह भी कहा गया है कि भर्ती प्रक्रिया, निर्धारित सीमा से अधिक हो रही है। विभागीय पदोन्नति को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह डीओपीटी के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है, जो समानता और सरकारी रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं।
17 वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत ...
इंस्पेक्टरों के मुताबिक, यह विवाद तब और गहरा गया, जब 2026 में ग्रुप 'ए' अधिकारियों के प्रस्तावित कैडर रिव्यू में सहायक कमांडेंट पदों में कटौती की बात सामने आई। साथ ही यूपीएससी द्वारा 100 से अधिक पदों पर सीधी भर्ती की अधिसूचना जारी की गई। इससे यह आशंका और प्रबल हो गई कि भविष्य में पदोन्नति के अवसर और भी सीमित हो जाएंगे। जमीनी स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। कई अधिकारी सारी योग्यताएं पूरी करते हुए भी 17 वर्षों से बिना पदोन्नति के एक ही पद पर कार्यरत हैं। उच्च जोखिम वाले आतंकवाद विरोधी अभियानों, नक्सल ऑपरेशनों और कानून-व्यवस्था ड्यूटी में अग्रिम पंक्ति में रहने के बावजूद उन्हें करियर वृद्धि के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे। न केवल पदोन्नति में ठहराव है, बल्कि भूमिकाओं में भी कोई सार्थक परिवर्तन नहीं हुआ है। ग्रुप 'बी' कैडर समीक्षा के दौरान भी निरीक्षकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला, बल्कि कुछ मामलों में उनकी भूमिकाओं का दायरा भी सीमित कर दिया गया।
सीआईएसएफ सहित दूसरे बलों में भी ठहराव ...
सीआरपीएफ के अलावा सीआईएसएफ सहित दूसरे केंद्रीय बलों में भी एसआई और इंस्पेक्टर, लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं। विभागीय पदोन्नति की प्रक्रिया लगभग ठप पड़ चुकी है। एक तरफ पदोन्नति का इंतजार तो वहीं दूसरी ओर यूपीएससी के माध्यम से सहायक कमांडेंट पदों पर बढ़ती सीधी भर्ती ने इस समस्या को गंभीर बना दिया है। पदोन्नति में लंबे ठहराव का प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय स्तर पर भी पड़ता है। अधिकारियों में मानसिक तनाव, पेशेवर असंतोष, आर्थिक अनिश्चितता और पारिवारिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। अनुभवी और जमीनी स्तर पर कार्यरत अधिकारियों का मनोबल लगातार गिर रहा है, जो किसी भी सुरक्षा बल के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
यूं हो सकता है समस्या का समाधान ...
इस समस्या के समाधान के लिए याचिकाकर्ताओं ने कई सुझाव दिए हैं। इनमें सीधी भर्ती और विभागीय पदोन्नति के बीच संतुलन स्थापित करना, सहायक कमांडेंट के अतिरिक्त पद सृजित करना, कैडर समीक्षा में ग्रुप 'ए' पदों की संख्या सुरक्षित रखना, बैकलॉग रिक्तियों को विभागीय पदोन्नति से भरना तथा लंबे समय से कार्यरत निरीक्षकों को प्राथमिकता देना शामिल है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा इस मामले में नोटिस जारी किया जाना, हजारों कर्मियों के लिए उम्मीद की एक किरण है। आने वाले समय में इस मामले का निर्णय न केवल सीआरपीएफ, बल्कि देश के अन्य अर्धसैनिक बलों की भर्ती और पदोन्नति नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है। यह केवल सेवा नियमों का प्रश्न नहीं है, बल्कि उन अग्रिम पंक्ति के अधिकारियों के सम्मान, मनोबल और भविष्य का सवाल है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ हैं।
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कैसे होगी 22000 कार्मिकों की पदोन्नति ...
सीआरपीएफ में सहायक कमांडेंट (एसी) की पदोन्नति की फीडर पोस्ट एसआई और इंस्पेक्टर हैं। बल में लगभग 6000 इंस्पेक्टर और 16000 एसआई हैं। सवाल है कि अब 22000 कार्मिकों को पदोन्नति कब मिलेगी। पहले बल की एक कंपनी में एक 'एसी' और एक 'इंस्पेक्टर' होता था।
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2019 में जब ग्रुप बी का कैडर रिव्यू हुआ तो एक कंपनी में तीन इंस्पेक्टर कर दिए गए, जबकि एसी एक ही रह गया। इससे पदोन्नति में तीन गुणा ज्यादा ठहराव आ गया। पहले पांच साल में इंस्पेक्टर से एसी बनते थे। अब 17 साल में ज्यादा समय लग रहा है। यह इंतजार साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। 2009 के इंस्पेक्टर अब भी इंस्पेक्टर हैं। हर साल 30-40 एसी बनते हैं। अभी 6000 इंस्पेक्टर कतार में हैं। पदोन्नति की यही गति रही तो यह इंतजार 200 साल के पार पहुंच जाएगा।
याचिकाकर्ताओं ने मजबूती से रखा पक्ष ...
न्याय के लिए मुखर सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों (जीडी) का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंचा है। केस की पहली सुनवाई हाल ही में हुई है। यह मामला सप्लीमेंट्री कॉज लिस्ट में सूचीबद्ध था। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल की पीठ के समक्ष जब यह मामला आया तो प्रारंभिक स्तर पर अदालत ने याचिका वापस लेने का सुझाव दिया। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष को मजबूती से रखते हुए भर्ती और पदोन्नति प्रणाली में व्याप्त खामियों को विस्तार से अदालत के समक्ष रखा। सुनवाई के बाद न्यायालय ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दे दी। केस की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
इस नियम को दी गई चुनौती ...
याचिका में मुख्य रूप से सीआरपीएफ के ग्रुप 'ए' अधिकारी भर्ती नियम, 2010 को चुनौती दी गई है। इसमें विशेषकर सहायक कमांडेंट (जीडी) के पद पर 50 प्रतिशत सीधी भर्ती का प्रावधान शामिल है। याचिकाकर्ता, जो वर्ष 2005 में सब-इंस्पेक्टर के रूप में भर्ती हुए और 2009 में इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नत हुए, उनका कहना है कि वे पिछले 16–17 वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत हैं। यूपीएससी के माध्यम से होने वाली बड़ी मात्रा में सीधी भर्ती ने उनके पदोन्नति के अवसरों को लगभग समाप्त कर दिया है। यह भी कहा गया है कि भर्ती प्रक्रिया, निर्धारित सीमा से अधिक हो रही है। विभागीय पदोन्नति को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह डीओपीटी के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है, जो समानता और सरकारी रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं।
17 वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत ...
इंस्पेक्टरों के मुताबिक, यह विवाद तब और गहरा गया, जब 2026 में ग्रुप 'ए' अधिकारियों के प्रस्तावित कैडर रिव्यू में सहायक कमांडेंट पदों में कटौती की बात सामने आई। साथ ही यूपीएससी द्वारा 100 से अधिक पदों पर सीधी भर्ती की अधिसूचना जारी की गई। इससे यह आशंका और प्रबल हो गई कि भविष्य में पदोन्नति के अवसर और भी सीमित हो जाएंगे। जमीनी स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। कई अधिकारी सारी योग्यताएं पूरी करते हुए भी 17 वर्षों से बिना पदोन्नति के एक ही पद पर कार्यरत हैं। उच्च जोखिम वाले आतंकवाद विरोधी अभियानों, नक्सल ऑपरेशनों और कानून-व्यवस्था ड्यूटी में अग्रिम पंक्ति में रहने के बावजूद उन्हें करियर वृद्धि के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे। न केवल पदोन्नति में ठहराव है, बल्कि भूमिकाओं में भी कोई सार्थक परिवर्तन नहीं हुआ है। ग्रुप 'बी' कैडर समीक्षा के दौरान भी निरीक्षकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला, बल्कि कुछ मामलों में उनकी भूमिकाओं का दायरा भी सीमित कर दिया गया।
सीआईएसएफ सहित दूसरे बलों में भी ठहराव ...
सीआरपीएफ के अलावा सीआईएसएफ सहित दूसरे केंद्रीय बलों में भी एसआई और इंस्पेक्टर, लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं। विभागीय पदोन्नति की प्रक्रिया लगभग ठप पड़ चुकी है। एक तरफ पदोन्नति का इंतजार तो वहीं दूसरी ओर यूपीएससी के माध्यम से सहायक कमांडेंट पदों पर बढ़ती सीधी भर्ती ने इस समस्या को गंभीर बना दिया है। पदोन्नति में लंबे ठहराव का प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय स्तर पर भी पड़ता है। अधिकारियों में मानसिक तनाव, पेशेवर असंतोष, आर्थिक अनिश्चितता और पारिवारिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। अनुभवी और जमीनी स्तर पर कार्यरत अधिकारियों का मनोबल लगातार गिर रहा है, जो किसी भी सुरक्षा बल के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
यूं हो सकता है समस्या का समाधान ...
इस समस्या के समाधान के लिए याचिकाकर्ताओं ने कई सुझाव दिए हैं। इनमें सीधी भर्ती और विभागीय पदोन्नति के बीच संतुलन स्थापित करना, सहायक कमांडेंट के अतिरिक्त पद सृजित करना, कैडर समीक्षा में ग्रुप 'ए' पदों की संख्या सुरक्षित रखना, बैकलॉग रिक्तियों को विभागीय पदोन्नति से भरना तथा लंबे समय से कार्यरत निरीक्षकों को प्राथमिकता देना शामिल है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा इस मामले में नोटिस जारी किया जाना, हजारों कर्मियों के लिए उम्मीद की एक किरण है। आने वाले समय में इस मामले का निर्णय न केवल सीआरपीएफ, बल्कि देश के अन्य अर्धसैनिक बलों की भर्ती और पदोन्नति नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है। यह केवल सेवा नियमों का प्रश्न नहीं है, बल्कि उन अग्रिम पंक्ति के अधिकारियों के सम्मान, मनोबल और भविष्य का सवाल है, जो देश की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ हैं।