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EU-India: अमेरिका-चीन ने खड़ी की समस्या, यूरोप से मिलेगा समाधान! भारत के लिए क्यों जरूरी है ये समझौता?

Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 23 Jan 2026 01:44 PM IST
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सार

भारत और यूरोपीय यूनियन के उच्चाधिकारियों की एक शीर्ष बैठक 27 जनवरी को नई दिल्ली में होनी है। इसमें भारत के साथ व्यायापार को बढ़ाने पर बात हो सकती है, जिससे चीन और अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सकती है। 

A meeting between senior officials from India and the European Union on January 27
यूरोपीय यूनियन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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अमेरिका के द्वारा लगाए गए टैरिफ का भारत ने सफलतापूर्वक सामना किया है। इस टैरिफ के बाद भी भारत 2025-26 में तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनने में सफल रहा है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिकी टैरिफ ने भारत के व्यापार को प्रभावित किया है। यदि अमेरिकी अड़ंगा न होता तो भारत इससे भी बेहतर बढ़त हासिल करने में सफल हो सकता था। इसी तरह चीन ने भी 'रेयर अर्थ मेटल' की सप्लाई रोककर भारत सहित पूरी दुनिया के सामने संकट खड़ा कर दिया था। लेकिन भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच होने जा रहे समझौते से अमेरिका-चीन की समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान मिल सकता है। यदि भारत-यूरोपीय यूनियन के बीच डील सही तरीके से अपने अंजाम पर पहुंची तो इससे अमेरिका पर भी दबाव पड़ने की संभावना है।   

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27 जनवरी को उच्च स्तरीय बैठक

भारत और यूरोपीय यूनियन के उच्चाधिकारियों की एक शीर्ष बैठक 27 जनवरी को नई दिल्ली में होगी। इस बैठक में भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिस्सा लेंगे। यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर येलेन इसमें हिस्सा लेंगे। ये दोनों मेहमान गणतंत्र दिवस समारोह पर मुख्य अतिथि भी होंगे। उर्सुला ने यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच होने वाले व्यापार समझौते को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा है। इससे यह संकेत मिलते हैं कि दोनों व्यापारिक साझेदार बड़े व्यापारिक समझौते कर सकते हैं जो दोनों पक्षों के हित में होंगे। 

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हालांकि, केवल इसी दौरे में सब कुछ हो जाएगा, इस तरह की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। उर्सुला वॉन डेर येलेन ने कहा है कि दोनों देशों के बीच समझौते में अभी भी कई अहम उपाय किए जाने शेष हैं, लेकिन एक बेहतर समझौते तक पहुंचने में यह बैठक मील का पत्थर साबित हो सकती है।  

यूरोपीय यूनियन कितना मजबूत

यूरोपियन यूनियन में 27 देश हैं। 2026 में इन सभी देशों की संयुक्त जीडीपी 22.52 ट्रिलियन डॉलर होने का अनुमान है। इसमें जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन का योगदान सबसे अधिक (करीब 60 प्रतिशत) होता है। इस यूनियन से अलग भी भारत के इन सभी देशों से बेहतर व्यापारिक संबंध हैं। अमेरिका भी भारत के साथ व्यापार समझौते में आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी डील अभी भी संदेह के घेरे में है, जबकि यूरोपीय यूनियन ने भारत के साथ आगे बढ़ने को लेकर बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। यह यूनियन अमेरिका के बाद दूसरी सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था मानी जाती है। ऐसे में यदि यूरोपीय यूनियन-भारत के बीच बड़े समझौते होते हैं तो इससे दोनों पक्षों को अच्छा लाभ होगा। 

भारत को यूरोपीय यूनियन से क्या मिलने की उम्मीद

भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच 2024-25 में 11.8 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था। मोटे तौर पर यह व्यापार थोड़ा भारत के पक्ष में झुका हुआ, लेकिन संतुलन भरा रहा था। यदि भारत बेहतर डील हासिल करे तो भारत को इससे अधिक लाभ हो सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि भारत ने टैक्स रहित व्यापार के लिए यूरोपीय यूनियन की अनुमति हासिल कर ली तो उसका व्यापार 136 अरब डॉलर से 200 अरब डॉलर पर पहुंच सकता है। 

यूरोपियन यूनियन के देश विश्व में सबसे ज्यादा तैयार वस्तुओं का व्यापार करते हैं। इसके साथ ही सेवाओं का विक्रय उनकी बड़ी आर्थिक शक्ति है। भारत यूरोपीय यूनियन से तैयार मशीनरी के सस्ते आयात, वाहनों, सौर ऊर्जा उपकरणों, लिथियम ऑयन बैटरियों के निर्माण, उच्च क्षमता के वाहन इंजनों के निर्माण की तकनीक और अन्य कल-पुर्जों के आयात में कर मुक्त व्यापार की उम्मीद कर सकता है। 

भारत लड़ाकू विमानों और यात्री विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है। यूरोपीय यूनियन का देश फ्रांस इसमें हमारी सहायता कर सकता है। इसी तरह जर्मनी वाहन इंजनों के निर्माण और अत्याधुनिक रेल इंजन, यात्री डिब्बों के निर्माण का कुशल खिलाड़ी है। वह भारत को इन क्षेत्रों में बड़ी मदद कर सकता है।   

भारत के निर्यात को मिलेगा बड़ा क्षेत्र

भारत पूरे विश्व के साथ-साथ यूरोपीय देशों के लिए तैयार कृषि उत्पादों का बड़ा सप्लायर है। भारत में तैयार हुए फल-फूल, सब्जी के साथ-साथ अनाज और प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए यूरोपीय देश बड़े बाजार हैं। इसके अलावा भारत इन देशों को पेट्रोलियम उत्पाद, कपड़े, आभूषण और दवाइयां भी निर्यात करता है। यदि यूरोपीय यूनियन भारतीय उत्पादों पर कम टैक्स लगाने को सहमत हो जाते हैं तो इससे यूरोपीय देशों में भारतीय उत्पाद सस्ते और अधिक लोकप्रिय हो सकते हैं। इससे भारत और भारतीय कृषि उत्पादकों को लाभ होगा। इससे रोजगार के क्षेत्र में भी प्रगति होगी।      

अमेरिका ने खड़ी की समस्या 

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि अमेरिका ने टैरिफ वॉर के साथ-साथ वीजा नियमों को कड़ा कर भारत के कामगरों के लिए कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिका ने अपने यहां लोगों को रोजगार देने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने पर भी कड़े नियम लगा दिए हैं। इससे भारत के उन लोगों को बड़ा नुकसान हो रहा है जो अमेरिका में नौकरी कर अपना जीवन बेहतर बनाना चाहते हैं। 

यूरोपीय यूनियन से मिलेगा समाधान

लेकिन अमेरिका के द्वारा खड़ी की गई इस समस्या का समाधान यूरोपीय देशों में मिल सकता है। यदि यूरोपीय यूनियन के देश भारतीयों के लिए आसान वीजा उपलब्ध कराते हैं, और अपने यहां काम करने को प्रोत्साहित करते हैं तो इससे दक्ष भारतीयों को नौकरियों के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि यूरोपीय यूनियन की सबसे बड़ी ताकत सर्विस सेक्टर के निर्यात की है। यदि भारतीय कामगार यूरोपीय कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करते हैं तो यह दोनों के लिए लाभ का सौदा साबित हो सकता है। 

चीन के खतरे का भी विकल्प मिलेगा

चीन भारत के साथ व्यापार आगे बढ़ाने के लिए काफी उत्सुकता के साथ काम कर रहा है, लेकिन उसका इतिहास बताता है कि उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। चीन ने जिस तरह रेयर अर्थ मटेरियल का इस्तेमाल किया है, रणनीतिक उत्पादों के लिए भारत उस पर भरोसा नहीं कर सकता। लेकिन भारत सौर ऊर्जा उपकरणों, दवा क्षेत्र के उत्पादों के कच्चे माल और अन्य अहम वस्तुओं के लिए लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर है। यदि चीन इन वस्तुओं का निर्यात रोक दे तो भारत के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। 

लेकिन यूरोपीय यूनियन के देश इन वस्तुओं के उत्पादन में महारत हासिल कर चुके हैं। ऐसे में यदि भारत इन देशों से सौर ऊर्जा उपकरणों, सोलर पैनल के निर्माण में सहयोग प्राप्त कर लेता है तो इससे उसे वैकल्पिक मार्ग मिलने और आत्मनिर्भरता हासिल करने में सहायता मिल सकती है।

अमेरिका पर भी पड़ेगा दबाव

यदि यूरोपीय यूनियन और भारत में बेहतर समझौता होता है तो इससे अमेरिका पर भी दबाव पड़ेगा। ट्रंप अपने टैरिफ को कम करने और भारत से एक बेहतर समझौते के लिए प्रेरित हो सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ लगाकर भारत को दबाव में लाकर भारत-रूस का तेल व्यापार प्रभावित किया है। इससे दोनों देशों को नुकसान हो रहा है। 

टैरिफ वॉर के बाद भी भारत ने 2025-26 में बेहतर जीडीपी बढ़त हासिल की है, लेकिन टैरिफ के कारण भारत का कुछ क्षेत्रों में व्यापार प्रभावित हुआ है। यदि भारत को टैरिफ का सामना न करना पड़ता तो उसकी जीडीपी बढ़त और बेहतर हो सकती थी। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि टैरिफ वॉर समाप्त न हुआ तो आने वाले समय में इसके अधिक नुकसानदायक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। भारत का इसके सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार अमेरिका को होने वाला व्यापार कई क्षेत्रों में प्रभावित हो सकता है। यूरोपीय यूनियन से समझौते जैसे अहम कदमों से भारत टैरिफ से हुए नुकसान को सीमित करने में सफल साबित हो सकता है।

भारत करेगा बेहतर आर्थिक प्रगति- भाजपा

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने अमर उजाला से कहा कि आईएमएफ, संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक एजेंसियों ने यह अनुमान लगाया है कि भारत 2026 में बेहतर आर्थिक प्रगति हासिल करेगा। कई एजेंसियों ने स्वयं अपने ही पहले के अनुमान को बेहतर करते हुए भारत के और बेहतर प्रगति करने का अनुमान जताया है।      

शहजाद पूनावाला ने कहा कि केंद्र सरकार आने वाले बजट में भी ऐसे प्रावधान करेगी जिससे देश के मध्य वर्ग को ताकत मिलेगी। उन्होंने कहा कि पिछले 12 साल से केंद्र सरकार लगातार श्रमिकों, किसानों, व्यापारियों को आगे बढ़ाने और उनकी आर्थिक शक्ति को मजबूत करने के लिए अहम उपाय सुझाए हैं। टैक्स दरों में बदलाव के साथ-साथ सस्ता कर्ज देकर उन्हें प्रगति करने के अवसर दिए गए हैं। आगामी बजट में भी केंद्र सरकार इसी तरह के उपाय कर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के कदम उठा सकती है। 

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