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झारखंड के CIP घोटाले में एक्शन: पूर्व डायरेक्टर दयाराम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज; सरेंडर करने का आदेश
Wed, 12 Aug 2026 06:59 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Wed, 12 Aug 2026 06:59 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (CIP) के पूर्व डायरेक्टर दया राम को कथित भर्ती घोटाले के मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इस मामले में 16 अप्रैल को झारखंड हाई कोर्ट ने भी दया राम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को झारखंड के रांची जिले के कांके स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री के पूर्व डायरेक्टर दया राम को कथित भर्ती घोटाले में अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी और उन्हें दो सप्ताह में ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने को कहा है। मामला 2021 में CIP में हुई विभिन्न पदों की भर्तियों में कथित हेरफेर से जुड़ा है, जिसकी जांच CBI कर रही है।
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कोर्ट ने क्या कहा और दया राम को क्या निर्देश दिया?
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने दया राम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उन्हें दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने दया राम की ओर से पेश वकील से कहा कि आप पर लगे आरोप बहुत गंभीर हैं। हम अग्रिम जमानत खारिज करने के झारखंड हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने के पक्ष में नहीं हैं। बेंच ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता पर लगे आरोपों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए, हम याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से पहले जमानत (अग्रिम जमानत) की सुविधा देने के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए, स्पेशल लीव पिटिशन खारिज की जाती है।
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क्या दया राम को नियमित जमानत के लिए रास्ता खुला है?
सुप्रीम कोर्ट ने दया राम को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने और नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर वह नियमित जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो उस पर कानून के मुताबिक और मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला किया जाएगा। बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता को दो हफ्ते के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने और रेगुलर जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी जाती है। अगर ऐसा आवेदन किया जाता है, तो उस पर कानून के अनुसार और उसके गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाएगा।
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दया राम के वकील ने क्या दलील दी?
दया राम की ओर से पेश वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी कथित अपराधों में, जिनमें प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत दर्ज आरोप भी शामिल हैं, अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान है। उन्होंने यह भी कहा कि मामले से जुड़े दस्तावेज पहले ही जब्त किए जा चुके हैं, इसलिए दया राम से हिरासत में पूछताछ की कोई जरूरत नहीं है। वकील ने यह भी दलील दी कि ज्यादातर आरोप उस अवधि से जुड़े नहीं हैं, जब दया राम CIP, कांके, रांची के डायरेक्टर के तौर पर संस्थान का कामकाज देख रहे थे। उनके मुताबिक, मामले के आरोप मुख्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में हुई विभिन्न भर्तियों में कथित अनियमितताओं से संबंधित हैं।
किन लोगों के साथ मिलकर अनियमितता करने का आरोप है?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि दया राम पर कथित तौर पर सह-आरोपी निर्मल्या चक्रवर्ती और नदीम अहमद के साथ मिलकर भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं में शामिल होने का आरोप है। इस मामले में 16 अप्रैल को झारखंड हाई कोर्ट ने भी दया राम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच के अधीन है।
मामला आखिर शुरू कैसे हुआ?
कोर्ट के सामने रखे गए रिकॉर्ड के मुताबिक, CIP के डायरेक्टर तरुण कुमार की लिखित शिकायत के आधार पर 2 जनवरी को दया राम, वासुदेव दास, निर्मल्या चक्रवर्ती (सीनियर नर्सिंग ऑफिसर), नदीम अहमद (हेड क्लर्क) और अन्य लोगों के खिलाफ नियमित मामला दर्ज किया गया था। उस समय दया राम डायरेक्टर-प्रोफेसर के पद पर थे।
2021 की भर्ती प्रक्रिया में क्या गड़बड़ी सामने आई?
झारखंड हाई कोर्ट ने दया राम के खिलाफ लगे आरोपों पर गौर करते हुए कहा था कि शिकायत में CIP, रांची के अधिकारियों पर कुछ अज्ञात निजी लोगों के साथ मिलकर वर्ष 2021 में नर्सिंग ऑफिसर समेत कई पदों की भर्ती प्रक्रिया में हेरफेर करने का आरोप लगाया गया था। आरोप है कि कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने के लिए भर्ती के तय नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया। जांच में भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए।
चुने गए उम्मीदवारों को लेकर क्यों उठे सवाल?
हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया कि चयनित उम्मीदवारों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिनका संबंध CIP के मौजूदा या सेवानिवृत्त कर्मचारियों अथवा संस्थान में काम करने वाले निजी ठेकेदारों से था। इस वजह से पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और ईमानदारी पर संदेह पैदा हुआ।
CIP और दया राम की भूमिका क्या रही है?
सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (CIP) देश के प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में शामिल है और यह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन काम करता है। सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर गौर किया कि दया राम ने वर्ष 2000 से जनवरी 2013 तक CIP, कांके में प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर काम किया। इसके बाद जनवरी 2013 से 14 फरवरी 2021 तक वह संस्थान के डायरेक्टर रहे। वह जनवरी 2024 में सेवानिवृत्त हुए।
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अब दया राम के सामने क्या विकल्प है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दया राम को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद वह नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, नियमित जमानत दी जाएगी या नहीं, इसका फैसला ट्रायल कोर्ट मामले के तथ्यों, आरोपों और कानून के आधार पर करेगा।