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Agnipath Row in Nepal: पाक-चीन की चाल से बेखबर नहीं हैं गोरखा, ये भरोसा मिला तो बन जाएंगे 'अग्निवीर'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 06 Sep 2022 06:36 PM IST
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सार

Agnipath Row in Nepal: भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे, रविवार को अपने पांच दिवसीय दौरे पर नेपाल पहुंचे हैं। उनका प्रयास है कि नेपाल के राजनीतिक दलों, सामान्य जन और सेना भर्ती की तैयारी में जुटे युवाओं का भ्रम दूर किया जाए...

Agnipath Row in Nepal: Gurkhas want the assurance during General Manoj Pande visit
Agnipath Row in Nepal: राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी जनरल मनोज पांडे को मानद जनरल का पद देती हुईं - फोटो : Agency
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विस्तार

नेपाल के गोरखा, जिनकी बहादुरी को लेकर भारतीय सेना के भूतपूर्व थल सेनाध्यक्ष, फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ ने कहा था, "अगर कोई ये कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, या तो वह झूठ बोल रहा है, या फिर वह गोरखा है।" मानेकशॉ के इन शब्दों पर 'गोरखा' आज भी खरे उतरते हैं। भारतीय सेना में भर्ती के लिए शुरू की गई 'अग्निपथ' स्कीम पर नेपाल, भरोसा नहीं कर पा रहा है। उसे चिंता है कि चार साल बाद गोरखाओं का क्या होगा। दो पड़ोसी मुल्क, चीन और पाकिस्तान ऐसी साजिशों में लगे हैं कि नेपाल के गोरखा, इंडियन आर्मी का मोह त्याग दें। हालांकि पड़ोसियों की चाल से 'गोरखा' बेखबर नहीं हैं। भारतीय सेना प्रमुख मनोज पांडे अपनी पांच दिवसीय यात्रा पर नेपाल में हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि वे 'अग्निपथ' पर नेपाल की तमाम शंकाओं का निवारण करेंगे। अगर नेपाल को यह भरोसा मिल जाता है कि चार साल के बाद गोरखाओं को किसी भी दूसरी सरकारी सेवा में नियमित किया जाएगा तो वे 'अग्निवीर' बनने के लिए तैयार हो सकते हैं।

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नेपाल को चाहिए यह गारंटी

भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है, नेपाल के गोरखाओं में अग्निपथ को लेकर अमूमन वैसे ही सवाल उठ रहे हैं, जैसे शुरुआत में भारतीय युवाओं के जेहन में उठे थे। नेपाल में गोरखा, इस मामले में उतने चिंतित नहीं हैं, जितना कि वहां के राजनीतिक दल। सैन्य मामलों के विशेषज्ञ और एक्स-सर्विसमैन ग्रीवांस सेल के अध्यक्ष साधू सिंह कहते हैं, भारत सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखानी होगी। केंद्र सरकार ने जब अग्निपथ योजना का खाका तैयार किया तो उसकी भनक तक नेपाल को नहीं लगने दी। बेहतर होता कि नेपाल से एक बार विचार विमर्श कर लिया जाता। उस मामले में भारत से चूक हुई है। नेपाल के गोरखाओं को अग्निपथ से वापस आने के बाद उनका 'करियर सेटल' होने की गारंटी चाहिए। यदि 25 फीसदी अग्निवीरों को नियमित होने का मौका मिलेगा, तो उसमें नेपाल के गोरखा पिछड़ जाएंगे। सभी गोरखा नियमित होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अब तो पेंशन भी नहीं है। बतौर संधू, भारत सरकार को इस बाबत नेपाल को भरोसा देना चाहिए। अगर अग्निपथ योजना में बदलाव संभव नहीं है तो कम से कम, गोरखाओं को चार साल के बाद किसी दूसरी नौकरी में स्थायित्व की गारंटी देना तो बनता है।

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भारतीय सेना में 43 गोरखा बटालियनें

नेपाल में 'अग्निपथ' को 1947 के समझौते की भावना के खिलाफ बताया जा रहा है। गोरखा, भारतीय सेना का हिस्सा रहे हैं। इसके पीछे केवल, समझौता है, ये कहना भी ठीक नहीं होगा। गोरखाओं को भारतीय सेना में अच्छा वेतन और आकर्षक पेंशन मिलती रही है। इतना ही नहीं, सेना से आने के बाद उन्हें दूसरे सरकारी महकमों में भी जॉब मिल जाती है। इन सबके चलते ही गोरखा, भारत व ब्रिटेन की सेना में शामिल होते हैं। गोरखाओं ने अपने शौर्य को साबित किया है। उन्हें जहां भी भेजा जाता है, वे वहां से विजयी हुए बिना वापस नहीं लौटते। भारतीय सेना में इनकी वफादारी, निष्ठा और ईमानदारी के चर्चे सुने जा सकते हैं। भारतीय सेना में 43 गोरखा बटालियनें हैं, ये कोई छोटी संख्या नहीं है। अगर ये भारतीय सेना का हिस्सा नहीं रहती तो उसका असर देखने को मिलेगा।


भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे, रविवार को अपने पांच दिवसीय दौरे पर नेपाल पहुंचे हैं। उनका प्रयास है कि नेपाल के राजनीतिक दलों, सामान्य जन और सेना भर्ती की तैयारी में जुटे युवाओं का भ्रम दूर किया जाए। नेपाल सेना प्रमुख प्रभु राम शर्मा के निमंत्रण पर नेपाल पहुंचे मनोज पांडे का राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी और प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा सहित कई प्रमुख लोगों से मुलाकात का कार्यक्रम तय है। उन्हें नेपाली सेना के मानद जनरल रैंक से नवाजा जाएगा। जनरल मनोज पांडे का नेपाल दौरा उस वक्त हो रहा है, जब नेपाल ने पिछले दिनों बुटावल और धारन में गोरखा सैनिकों की भर्ती को स्थगित कर दिया था। नेपाल के राजनीतिक दलों का कहना है कि वे भारत से अग्निपथ को लेकर कुछ बातों में स्पष्टता चाहते हैं।

क्या गोरखा भर्ती के लिए इच्छुक नहीं है सरकार?

नेपाल, ब्रिटेन और भारत के बीच, त्रिपक्षीय समझौता है। उसी समझौते के तहत सेना भर्ती होनी चाहिए। चार साल के बाद अगर गोरखाओं को दूसरी जॉब नहीं मिली तो क्या होगा। भारत को इस पर गौर करना चाहिए। ये ठीक है कि गोरखाओं की भावना, भारतीय सेना के साथ जुड़ी है। वे चीन या पाकिस्तान के बहकावे में नहीं आएंगे। ये अलग बात है कि चार साल के बाद, अगर गोरखाओं को काम की तलाश करनी पड़ी तो उनका दुरुपयोग संभव है। वह सुरक्षा बलों और देश के खिलाफ भी हो सकता है। नेपाल में रह रहे पूर्व सैनिकों की इस बात का समर्थन, साधू सिंह भी करते हैं। वे कहते हैं कि पता नहीं ऐसा क्यों लगने लगा है कि जैसे भारत सरकार, गोरखा भर्ती को लेकर ज्यादा परेशान नजर नहीं आ रही। बतौर साधू सिंह, मौजूदा हालात कुछ इस ओर भी इशारा करते हैं कि भारत सरकार, खुद इस भर्ती से हाथ पीछे खींचना चाह रही है। साधू सिंह यह भी कहते हैं कि जनरल मनोज पांडे की नेपाल यात्रा सार्थक रहेगी। वे कोई न कोई न समाधान निकालने में कामयाब होंगे।

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