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ड्रोन-मिसाइल के साथ पारंपरिक ताकत भी जरूरी: एयर मार्शल दीक्षित बोले- युद्ध में संतुलित रणनीति ही कारगर
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Thu, 30 Apr 2026 03:33 PM IST
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सार
एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित का कहना है कि आधुनिक लड़ाइयों में ड्रोन्स और मिसाइलों की अहमियत बहुत बढ़ी है, लेकिन पारंपरिक हथियार भी उतने ही अहम हैं। उन्होंने युद्ध की रणनीति में संतुलन की वकालत की।
मौजूदा परिदृश्य में देश की रणनीति कैसी हो, वायुसेना अधिकारी आशुतोष दीक्षित ने गिनाए अहम बिंदु
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान इस्राइल युद्ध के चलते साफ हो गया है कि ड्रोन-मिसाइलें आधुनिक लड़ाइयों में बेहद अहम हो गई हैं। हालांकि भारतीय वायुसेना के चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ आशुतोष दीक्षित का मानना है कि ड्रोन-मिसाइलों के साथ पारंपरिक ताकत भी जरूरी है। गुरुवार को एएनआई नेशनल सिक्योरिटी समिट 2.0 को संबोधित करते हुए एयर मार्शल दीक्षित ने कहा आधुनिक युद्ध में ड्रोन और मिसाइल भले सस्ते विकल्प लगें, लेकिन दीर्घकालिक रणनीति के लिहाज से पारंपरिक हथियार प्रणालियों के साथ संतुलित मिश्रण जरूरी है।
संतुलित रणनीति ज्यादा कारगर
ड्रोन और मिसाइलों पर निर्भरता के सवाल पर एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि केवल लागत नहीं, बल्कि प्रभाव और लचीलापन भी अहम हैं। उन्होंने कहा, 'अगर आप किसी एयरफील्ड को निशाना बनाते हैं, तो उसे जल्दी ठीक किया जा सकता है। ऐसे में बार-बार हमले की लागत और असर का संतुलन देखना होगा'। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक विमान 24 घंटे में कई शॉर्टीज कर सकता है और उससे दागे जाने वाले हथियार, मिसाइलों की तुलना में सस्ते पड़ते हैं, जिससे लंबे समय में विमान अधिक किफायती साबित होते हैं।
स्वदेशी प्रणालियों का जिक्र करते हुए उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइल महंगी है, ऐसे में अगर पिनाका जैसे मिसाइल सिस्टम को राफेल लड़ाकू विमान पर तैनात किया जाए, तो लागत-प्रभाव अनुपात बेहतर हो सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध योजना में कमांडर के पास हर तरह के विकल्प होने चाहिए, जिनमें महंगे, सस्ते, सटीक और कम सटीक सभी प्रकार के हथियार शामिल हैं।
युद्ध के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग अहम
युद्ध के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग और उसका लोगों के मनोविज्ञान पर पड़ने वाले असर पर बात करते हुए उन्होंने कहा, 'जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ, तब मीडिया में, दो विमान गिर गए, तीन गिर गए, जैसी खबरों की बाढ़ आ गई। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध होता है। जबकि हकीकत यह है कि युद्ध में विमान खोना असामान्य बात नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा पैटर्न वैश्विक स्तर पर भी देखा गया है और पश्चिम एशिया युद्ध में अमेरिका को भी विमानों का नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि अमेरिका के विमान गिरने पर भारत जैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखी।
उन्नत ड्रोन्स के लिए हुए अहम रक्षा समझौते
सम्मेलन में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और डीआरडीओ अध्यक्ष समीर वी कामत भी मौजूद रहे। कार्यक्रम का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 2047 तक वायुसेना में 66 स्क्वाड्रन की जरूरत के सवाल पर कहा कि इस पर शीर्ष स्तर पर अभी चर्चा नहीं हुई है। फिलहाल लड़ाकू विमानों, रिफ्यूलर्स और AWACS जैसी क्षमताओं की कमी दूर करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत ने अमेरिका की जनरल एटोमिक्स के साथ समझौता किया है, जिसके तहत तीनों सेनाओं के लिए उन्नत HALE श्रेणी के ड्रोन हासिल किए जाएंगे। वहीं, डीआरडीओ प्रमुख समीर वी. कामत ने 'घातक' कार्यक्रम के तहत विकसित हो रहे स्वदेशी UCAV को स्टील्थ फाइटर के जैसा बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षमताओं में हल्के लड़ाकू विमान जैसा होगा।
रक्षा अनुसंधान पर कामत ने कहा कि भारत अपने रक्षा बजट का लगभग 5-5.5% ही रिसर्च और डेवलेपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन 10-12% और अमेरिका करीब 15% खर्च करता है। उन्होंने निजी क्षेत्र और पीएसयू की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सरकार अगले पांच वर्षों में रक्षा अनुसंधान बजट दोगुना करने की दिशा में काम कर रही है।
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संतुलित रणनीति ज्यादा कारगर
ड्रोन और मिसाइलों पर निर्भरता के सवाल पर एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि केवल लागत नहीं, बल्कि प्रभाव और लचीलापन भी अहम हैं। उन्होंने कहा, 'अगर आप किसी एयरफील्ड को निशाना बनाते हैं, तो उसे जल्दी ठीक किया जा सकता है। ऐसे में बार-बार हमले की लागत और असर का संतुलन देखना होगा'। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक विमान 24 घंटे में कई शॉर्टीज कर सकता है और उससे दागे जाने वाले हथियार, मिसाइलों की तुलना में सस्ते पड़ते हैं, जिससे लंबे समय में विमान अधिक किफायती साबित होते हैं।
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स्वदेशी प्रणालियों का जिक्र करते हुए उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइल महंगी है, ऐसे में अगर पिनाका जैसे मिसाइल सिस्टम को राफेल लड़ाकू विमान पर तैनात किया जाए, तो लागत-प्रभाव अनुपात बेहतर हो सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध योजना में कमांडर के पास हर तरह के विकल्प होने चाहिए, जिनमें महंगे, सस्ते, सटीक और कम सटीक सभी प्रकार के हथियार शामिल हैं।
युद्ध के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग अहम
युद्ध के दौरान मीडिया रिपोर्टिंग और उसका लोगों के मनोविज्ञान पर पड़ने वाले असर पर बात करते हुए उन्होंने कहा, 'जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ, तब मीडिया में, दो विमान गिर गए, तीन गिर गए, जैसी खबरों की बाढ़ आ गई। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध होता है। जबकि हकीकत यह है कि युद्ध में विमान खोना असामान्य बात नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा पैटर्न वैश्विक स्तर पर भी देखा गया है और पश्चिम एशिया युद्ध में अमेरिका को भी विमानों का नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि अमेरिका के विमान गिरने पर भारत जैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखी।
उन्नत ड्रोन्स के लिए हुए अहम रक्षा समझौते
सम्मेलन में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और डीआरडीओ अध्यक्ष समीर वी कामत भी मौजूद रहे। कार्यक्रम का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 2047 तक वायुसेना में 66 स्क्वाड्रन की जरूरत के सवाल पर कहा कि इस पर शीर्ष स्तर पर अभी चर्चा नहीं हुई है। फिलहाल लड़ाकू विमानों, रिफ्यूलर्स और AWACS जैसी क्षमताओं की कमी दूर करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत ने अमेरिका की जनरल एटोमिक्स के साथ समझौता किया है, जिसके तहत तीनों सेनाओं के लिए उन्नत HALE श्रेणी के ड्रोन हासिल किए जाएंगे। वहीं, डीआरडीओ प्रमुख समीर वी. कामत ने 'घातक' कार्यक्रम के तहत विकसित हो रहे स्वदेशी UCAV को स्टील्थ फाइटर के जैसा बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षमताओं में हल्के लड़ाकू विमान जैसा होगा।
रक्षा अनुसंधान पर कामत ने कहा कि भारत अपने रक्षा बजट का लगभग 5-5.5% ही रिसर्च और डेवलेपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन 10-12% और अमेरिका करीब 15% खर्च करता है। उन्होंने निजी क्षेत्र और पीएसयू की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सरकार अगले पांच वर्षों में रक्षा अनुसंधान बजट दोगुना करने की दिशा में काम कर रही है।
