इथेनॉल उत्पादन की भारी कीमत: एक लीटर निगल रहा दस हजार लीटर पानी, जानिए ग्रीन फ्यूल को बढ़ावा कितनी बड़ी चुनौती
सरकार पेट्रोल में ज्यादा से ज्यादा इथेनॉल मिलाकर ग्रीन फ्यूल को बढ़ावा दे रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच में टिकाऊ है? जब एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 10,790 लीटर पानी लगता है, तो क्या यह नीति जल संकट को और नहीं बढ़ाएगी? नीति आयोग की चेतावनी के मुताबिक देश के करोड़ों लोग पहले से पानी की कमी झेल रहे हैं, ऐसे में क्या पानी-आधारित ईंधन सही दिशा है?
विस्तार
भारत सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग को ऊर्जा सुरक्षा और प्रदूषण कम करने के बड़े समाधान के तौर पर पेश कर रही है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने और किसानों की आय बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार ने साल 2025 में ही पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने (E20) का बड़ा लक्ष्य हासिल कर लिया है।
अब सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने 'केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989' में संशोधन का एक ड्राफ्ट जारी किया है। इस नए ड्राफ्ट का उद्देश्य E85 और E100 जैसे आधुनिक फ्यूल को शामिल करना है। E85 फ्यूल का अर्थ है एक ऐसा मिश्रण जिसमें 85% इथेनॉल और सिर्फ 15% पेट्रोल होगा। वहीं, भविष्य की सबसे बड़ी तैयारी E100 फ्यूल को लेकर है, जिसका सीधा मतलब 100% शुद्ध इथेनॉल है। इसके लिए उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ाई जा रही है। गन्ना, चावल और मक्का जैसे कच्चे माल से बड़े पैमाने पर इथेनॉल तैयार किया जा रहा है, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां इसे पेट्रोल में मिलाकर बाजार में बेच रही हैं।
लेकिन इस पूरी नीति के बीच एक बड़ा सवाल पानी को लेकर खड़ा हो रहा है। इथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया में भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। खाद्य सचिव संजीव चोपरा के मुताबिक, चावल से एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 10,790 लीटर पानी खर्च होता है। इस आंकड़े में खेती के दौरान सिंचाई से लेकर प्रोसेसिंग तक की पूरी जल खपत शामिल है। ऐसे में जिस ईंधन को पर्यावरण के अनुकूल बताया जा रहा है, वह वास्तव में जल संसाधनों पर बड़ा दबाव डाल सकता है।
इथेनॉल वाली फसलों में इस्तेमाल होता है ज्यादा पानी
स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि इथेनॉल जिन फसलों से बनता है, वे पहले से ही देश में सबसे ज्यादा पानी लेने वाली फसलें हैं। गन्ना, चावल और मक्का भारत के सीमित जल संसाधनों का बड़ा हिस्सा खपत करते हैं। अब इन्हीं फसलों को ईंधन उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से जल संकट और गहरा होने की आशंका बढ़ गई है।
इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद्य नीति में बदलाव
सरकार ने इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद्य नीति में भी बदलाव शुरू कर दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दिए जाने वाले अनाज में टूटे हुए चावल की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। इस कदम से हर साल लगभग 90 लाख टन टूटे हुए चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए उपलब्ध हो सकेंगे। अतिरिक्त चावल को नीलामी के जरिए इथेनॉल कंपनियों और अन्य उद्योगों को दिया जाएगा। आगे की योजना में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के स्टॉक से साबुत चावल की सप्लाई बंद कर टूटे हुए चावल को स्थायी कच्चा माल बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इथेनॉल उद्योग को सालभर आपूर्ति मिलती रहे।
2000 करोड़ लीटर तक पहुंची उत्पादन क्षमता
इथेनॉल उत्पादन क्षमता में भी तेजी से वृद्धि हुई है। जहां 2013-14 में उत्पादन क्षमता करीब 420 करोड़ लीटर थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 2000 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है। मौजूदा समय में करीब 40 प्रतिशत इथेनॉल अनाज आधारित स्रोतों, खासकर मक्का से तैयार किया जा रहा है। सरकार मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए नई किस्मों और क्लस्टर आधारित खेती को भी बढ़ावा दे रही है।
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क्या कहती है नीति आयोग की रिपोर्ट?
वहीं नीति आयोग की 2019 की 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट' देश में जल संकट की गंभीर तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ तक पहुंच जाएगी और घरेलू पानी की मांग दोगुनी हो सकती है। अनुमान है कि उस समय पानी की मांग और आपूर्ति के बीच लगभग 50 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) का अंतर होगा। भारत के 12 प्रमुख नदी बेसिनों में करीब 82 करोड़ (820 मिलियन) लोग उच्च से अत्यधिक जल संकट की स्थिति में जी रहे हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा जल संकट झेल रहे 20 बड़े शहरों में से पांच भारत में हैं और कई शहरों में अभी भी 24 घंटे पानी की आपूर्ति उपलब्ध नहीं है। केवल 35 प्रतिशत शहरी घरों में पाइप से पानी की सुविधा है, जबकि बाकी लोग ट्यूबवेल, सार्वजनिक नलों या अन्य स्रोतों पर निर्भर हैं।
देश के कई बड़े शहरों में गहराता जा रहा जल संकट
रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां पानी का इस्तेमाल उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले बहुत ज्यादा हो चुका है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में पानी पर दबाव बेहद ज्यादा है। इसके अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्से भी गंभीर जल संकट की श्रेणी में आते हैं। इन इलाकों में भूजल तेजी से घट रहा है और पानी के स्रोतों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
इसका मतलब है कि इन राज्यों में पानी का इस्तेमाल इतना ज्यादा हो रहा है कि भविष्य में पानी की कमी और गंभीर हो सकती है। खेती, उद्योग और शहरों की जरूरतों के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि प्राकृतिक रूप से पानी की भरपाई उतनी तेजी से नहीं हो पा रही है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, वहां सबसे पहले पीने के पानी का संकट पैदा होता है। इसके बाद खेती पर असर पड़ता है और धीरे-धीरे उद्योग भी प्रभावित होने लगते हैं।
जल संकट के बीच इथेनॉल ब्लेंडिगं नीति
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि आने वाले समय में पानी की कमी के कारण शहरों में जीवन स्तर प्रभावित हो सकता है, उद्योगों को अपने संचालन स्थल बदलने पड़ सकते हैं और राज्यों को पानी की राशनिंग तक करनी पड़ सकती है। बढ़ती आबादी और कमजोर जल ढांचे के बीच यह संकट और गहराने की आशंका है।
ऐसे में इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति और जल संकट के बीच सीधा टकराव दिखाई देने लगा है। एक तरफ सरकार इसे ग्रीन फ्यूल और आत्मनिर्भरता का रास्ता बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञ इसे पानी-आधारित और दीर्घकाल में अस्थिर मॉडल मान रहे हैं। यह बहस अब केवल 'खाद्य बनाम ईंधन' तक सीमित नहीं रही, बल्कि पानी बनाम ईंधन का रूप लेती जा रही है।
सरकार का तर्क है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से तेल आयात कम होगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों को फायदा मिलेगा और कार्बन उत्सर्जन घटेगा। सरकार भविष्य में ज्यादा ब्लेंडिंग, डीजल में इथेनॉल मिलाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने पर भी विचार कर रही है। लेकिन मौजूदा हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे जल संकट से जूझ रहे देश में इतनी पानी-आधारित ईंधन नीति टिकाऊ साबित होगी। ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यही आने वाले समय की सबसे बड़ी नीति चुनौती बनती दिख रही है।
