होली आने से पहले ही बाजार रंगों से भर जाते हैं। सुरक्षित होली खेलने के लिए अधिकतर लोग हर्बल और ऑर्गेनिक रंगों की मांग करते हैं। ये रंग ना केवल सुरक्षित होते हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि जो हर्बल गुलाल आप खरीद रहे हैं, जरूरी नहीं है कि उसमें केमिकल टॉक्सिक ना मिला हो। इन रंगों का दाम सिंथेटिक रंगों (केमिकल युक्त रंग) से तीन गुना अधिक होता है।
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एक नजीओ का कहना है कि अंतर पता लगाने का केवल एक तरीका है और वह है टेस्ट करना। ठीक होगा कि रंग एक अच्छे बाजार से खरीदा जाए और वहां से ना खरीदें जहां खुले में बिकते हैं।
दुकानदारों का कहना है कि बाजार में हर्बल रंगों की मांग बढ़ गई है। जिसे देखते हुए वह भी अधिक मात्रा में इन्हें बेचने के लिए लेकर आए हैं। लेकिन ये हर्बल रंग भी सदर बाजार जैसी मार्केट से खरीदे गए हैं, ऐसे में नहीं कहा जा सकता कि हर्बल रंग कितना ठीक है।
एक अन्य दुकानदार का कहना है कि व्यापार के लिए सिंथेटिक रंग काफी अच्छा होता है। इसका दाम भी बेहद कम होता है। जहां आम गुलाल 30-40 रुपये प्रति किलो मिलता है, वहीं हर्बल रंग का दाम 200 रुपये प्रति किलो है। वहीं अगर स्प्रे की बात करें तो वो अधिकतर चीन से ही आते हैं। इसके साथ ही खुला रंग पश्चिमी उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि से आता है।
वहीं बाल विकास से संबंधित एक एनजीओ खुद ही ऑर्गेनिक कलर बनाता है। इन रंगों को ये एनजीओ 600 रुपये प्रति किलो की कीमत पर बेचता है। इन ऑर्गेनिक रंगों को फूलों आदि से बनाया जाता है। दिवयांग बच्चे मंदिरों से फूलों को एकत्रित करते हैं। इन फूलों से गुलाबी, पीला, संतरी और हरा रंग बनाया जाता है।
सिंथेटिक रंग और ऑर्गेनिक रंग में अंतर उनकी चमक को देखकर पता लगाया जा सकता है। गुलाब के फूल से गुलाबी रंग भी बनाया जा सकता है, हालांकि वह लाल की तरह चमकदार नहीं होता। हर्बल रंग बनाने के लिए ना केवल फूलों बल्कि पेड़ की पत्तियों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
सिंथेटिक रंगों का बेस सिलिका का होता है और इसमें भारी मात्रा में जहरीले वैरिएंट मिले होते हैं। जिसके कारण कई दिनों तक इनका निशान नहीं जाता। ये रंग भी सदर में आसानी से उपलब्ध हैं।
सिलवर और गोल्ड रंग के जैल भी बाजार में मिल रहे हैं। इसके अलावा छोटे दवाई जैसे कैप्सूल भी मिलते हैं। जैल की कीमत 40 रुपये होती है जबकि कैप्सूल 20 रुपये में ही मिल जाता है। केवल एक कैप्सूल ही एक बाल्टी पानी के लिए काफी होता है। इनके निशान भी हफ्तों तक नहीं जाते।
सिंथेटिक कलर में कई खतरनाक धातु मिली होती हैं जैसे, लीड, क्रोमियम, कैडमिअम, निकेल, मर्करी, जिंक और लोहा। गुलाल में धातु मिलाई गई है या नहीं इसे एक टेस्ट के माध्यम से जाना जाता है।
कई जांच में पता चला है कि लाल रंग में अधिक मात्रा में मर्करी मिला होता है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है। कॉपर नीले रंग में मिला होता है, जो आंख, त्वचा, लीवर और श्वसन प्रणाली के लिए नुकसानदायक होता है। इन धातुओं के अलावा रंगों में सिलिका और एसबेस्टस भी मिला होता है, जो शरीर के टीशू को प्रभावित करते हैं।