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Amar Ujala Batras: 'एक आरोप और...', सजा देने में कानून पर कैसे भारी सोशल मीडिया, देखें पॉडकास्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 31 Jan 2026 08:05 PM IST
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अमर उजाला बतरस।
- फोटो : Amar Ujala
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आधुनिक समय में सोशल मीडिया एक मनोरंजन के साधन से ज्यादा एक जरूरत का संसाधन बन चुका है। यह मानवीय पहलू का कितना अहम हिस्सा बन चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज के समय में लोग अपनों के बारे में जितनी जानकारी सोशल पोस्ट्स के जरिए जुटा सकते हैं, वह निजी संपर्क में रहकर हासिल करना मुश्किल है। हालांकि, सोशल मीडिया की यही खासियतें आम लोगों के लिए खतरनाक भी होती जा रही हैं। खासकर इसके जरिए मिलने वाली प्रचार-प्रसार की ताकत। आलम यह है कि आए दिन सोशल मीडिया पर वायरल हुए पोस्ट्स की वजह से आत्महत्या की खबरें सामने आती रहती हैं। अमर उजाला बतरस पर लोकप्रिय एंकर और पत्रकार नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते इसी मुद्दे पर बात की और जाना कि आखिर सोशल मीडिया कैसे लोगों के लिए परेशानी का सबब भी बना है।
इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
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इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें दिल्ली पुलिस के पूर्व अस्टिटेंट कमिश्नर वेद भूषण और सामाजिक कार्यकर्ता बरखा त्रेहान शामिल रहीं। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- कैसे सोशल मीडिया भारतीय कानून से ऊपर आम लोगों को सजा सुनाने वाला मंच बन गया है? कैसे इस पर वायरल पोस्ट्स और ट्रोल्स 'जज' बन कर फैसला दे रहे हैं? महिला अधिकारों के गलत इस्तेमाल का कैसा असर पड़ सकता है? क्या पुरुषों को भी सशक्त करने के लिए नियम-कानून होने चाहिए?
बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि यह भी बताया कि मौजूदा समय में जब पुलिस भी जानती हो कि मामला फेक है तो कैसे इसको हैंडल किया जाता है। पुरुषों के लिए नियम न होने का क्या असर हुआ है। सोशल मीडिया वाले न्याय पर किस तरह रोक लग सकती है। अन्याय सहने वाले पुरुष क्या करें जिससे उनकी बात सुनी जाए। साथ ही पुरुषों के लिए पुलिस और न्याय व्यवस्था में क्या-क्या बदलाव होने चाहिए।
बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि यह भी बताया कि मौजूदा समय में जब पुलिस भी जानती हो कि मामला फेक है तो कैसे इसको हैंडल किया जाता है। पुरुषों के लिए नियम न होने का क्या असर हुआ है। सोशल मीडिया वाले न्याय पर किस तरह रोक लग सकती है। अन्याय सहने वाले पुरुष क्या करें जिससे उनकी बात सुनी जाए। साथ ही पुरुषों के लिए पुलिस और न्याय व्यवस्था में क्या-क्या बदलाव होने चाहिए।
