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Andheri East bypoll: ...तो इसलिए BJP ने शिवसेना के लिए छोड़ी अंधेरी सीट! बड़ी दूर का लगाया है दांव

Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Tue, 18 Oct 2022 06:33 PM IST
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सार

Andheri East bypoll: राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा ने इस सीट से मुरजी पटेल को प्रत्याशी बनाया था। भाजपा ने मुरजी पटेल को प्रत्याशी बनाकर यहां पर गलत दांव चला था। पटेल गुजराती हैं और इस अंधेरी पूर्व विधानसभा में गुजराती वोटर उतने ज्यादा नहीं हैं...

Andheri East bypoll: here is the reason, why BJP left this seat for Shiv Sena
Andheri East bypoll: BJP's Murji Patel and Shiv Sena's Rutuja Latke - फोटो : Agency
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विस्तार

मुंबई के अंधेरी पूर्व सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशी का नामांकन वापस करा कर राजनीतिक हलकों में बड़ी हलचल पैदा करा दी। सियासी जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा करके एक कदम पीछे तो खींचा है, लेकिन यह दांव उसे दस कदम आगे ले जा सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा फैसला आने वाले मुंबई के महानगर पालिका चुनावों के मद्देनजर लिया है। क्योंकि इस उपचुनाव का परिणाम अगर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं आता है, तो महानगरपालिका के होने वाले चुनावो में असर पड़ना तय माना जा रहा था। सियासी जानकार बताते हैं कि मुंबई के इस उपचुनाव में पूरी लड़ाई भावनात्मक तौर पर सहानुभूति के चलते एकतरफा मानी जा रही थी।

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भाजपा के लिए जीतना कठिन हो जाता

मुंबई की अंधेरी पूर्व सीट पर होने वाले उपचुनाव में अचानक एक बड़ा फेरबदल हुआ। भाजपा ने अपने प्रत्याशी का नामांकन होने के बाद उसका नाम वापस ले लिया। महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से समझने वाले हिमांशु शितोले कहते हैं कि इस राजनीतिक घटनाक्रम को दरअसल कई अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि क्योंकि अगले कुछ महीने के भीतर ही मुंबई में महानगरपलिका का चुनाव होना है। महानगर पालिका के चुनाव से पहले होने वाले उपचुनाव के परिणाम निश्चित तौर पर पालिका के चुनावों को प्रभावित भी करते रहे हैं। क्योंकि मुंबई के अंधेरी पूर्व सीट पर होने वाला चुनाव वहां के स्थानीय विधायक की मृत्यु के बाद हो रहा है। यह चुनाव विधायक की पत्नी लड़ रहीं हैं। ऐसे में भावनात्मक तौर पर इस विधानसभा सीट से सहानुभूति मिलती हुई दिख रही थी।

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शितोले कहते हैं कि ऐसी दशा में किसी भी पार्टी के लिए चुनाव जीतना निश्चित तौर पर कठिन हो जाता है। उनका कहना है कि स्थितियां तब और विपरीत हो जाती हैं, जब ऐसे उपचुनाव के तुरंत बाद एक बड़ा महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला हो। क्योंकि इस उपचुनाव के नतीजे आने वाले बड़े चुनावों पर असर डालते हैं। हिमांशु कहते हैं कि राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं इस बात की हो रही है कि भाजपा ने बहुत कुछ सोच समझ कर ही अपने प्रत्याशी का नामांकन वापस कराया है। हालांकि यह बात अलग है कि नामांकन वापसी से पहले तमाम तरह की राजनीतिक उठापटक, घटनाक्रम और चिट्ठीबाजी भी हुई है। यही नहीं नामांकन वापसी के बाद भाजपा प्रत्याशी के समर्थकों ने राज ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ नाराजगी भी जताई है।

गुजराती को बनाया था प्रत्याशी

भाजपा प्रत्याशी का नामांकन होने के वापस लेने के पीछे कई और कारण भी माने जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा ने इस सीट से मुरजी पटेल को प्रत्याशी बनाया था। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पूरन पाटिल कहते हैं कि दरअसल भाजपा ने मुरजी पटेल को प्रत्याशी बनाकर यहां पर गलत दांव चला था। पाटिल का कहना है कि पटेल गुजराती हैं और इस अंधेरी पूर्व विधानसभा में गुजराती वोटर उतने ज्यादा नहीं हैं। वह कहते हैं कि एक तो यहां पर पहले ही सहानुभूति के चलते पूर्व विधायक रमेश लटके की पत्नी ऋतुजा लटके की स्थिति मजबूत बनी हुई थी। ऊपर से डर इस बात का था कि कहीं मराठी वोटों के ध्रुवीकरण से यह सीट भाजपा के लिए खटाई में न पड़ जाए। वह बताते हैं कि यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी को इस सीट से हारने का खतरा बना हुआ था।

50 हजार वोटों से हार रही थी भाजपा

भाजपा पर हमलावर होते हुए शिवसेना (उद्धव बाला साहब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने अदालत में पेशी पर आने के दौरान बातचीत में आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा अंधेरी पूर्व से करीब पचास हजार वोटों से हार रही थी। राउत ने कहा कि यह बात भाजपा के अपने अंदरूनी सर्वे में भी सामने आई थी। यही वजह है कि भाजपा ने हार के डर से अपने प्रत्याशी का नामांकन वापस ले लिया। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार चंद्रेश वाडवलकर कहते हैं कि महाराष्ट्र में हाल के दिनों में जिस तरीके का बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम और उठापटक हुई है, उससे अभी यह कहा नहीं जा सकता है कि भाजपा और एकनाथ शिंदे के बीच की केमिस्ट्री जनता कितनी पसंद करेगी। उनका कहना है कि भाजपा और एकनाथ शिंदे को जनता की स्वीकार्यता तभी मिलेगी, जब बड़े स्तर पर चुनाव होंगे और उनके परिणाम आएंगे। उनका कहना है कि भाजपा के नेता और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के नेता इस बात को भलीभांति समझते हैं। शायद यही बड़ी वजह है कि वह कम कार्यकाल वाले उपचुनाव में नहीं जाना चाहते थे।

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