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CAPF: नया कानून लागू होते ही अर्धसैनिक बलों में IPS-DIG तैनात, सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे पूर्व अफसर; पूछे सवाल

Jitendra Bhardwaj Jitendra Bhardwaj
Updated Sat, 11 Apr 2026 07:44 PM IST
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सार

CAPF में नए कानून लागू होने के बाद डीआईजी पद पर आईपीएस नियुक्तियों से विवाद खड़ा हो गया है। कैडर अफसरों का कहना है कि इससे उनके प्रमोशन के अवसर घटेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उलट बदलाव होने का आरोप है। कई अफसर कमांडेंट बनकर रिटायर होने की आशंका जता रहे हैं।

CAPF IPS DIGs Deployed in Paramilitary Forces Immediately Implementation of New Law  Promotions Cadre Officers
सीएपीएफ के नियमों में बदलाव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026' को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 9 अप्रैल को मंजूरी दे दी है। इसके बाद केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में नया कानून लागू हो गया है। नए कानून के लागू होने के अगले ही दिन केंद्रीय बलों में दो आईपीएस डीआईजी की तैनाती कर दी गई। खास बात है कि नए कानून में आईपीएस डीआईजी की केंद्र में प्रतिनियुक्ति के पद रिजर्व नहीं किए गए हैं। डीआईजी की नियुक्ति पर कैडर अफसर हैरान हैं। नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे पूर्व कैडर अफसरों ने सवाल किया है कि यूपीएससी से सीधी भर्ती के द्वारा इन बलों में सहायक कमांडेंट के पद पर आने वाले अधिकारी क्या कमांडेंट बनकर ही रिटायर हो जाएंगे। 
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तब भी 24 घंटे पहले तक होती रही नियुक्तियां
बता दें कि आदर्श सिद्धू, आईपीएस (राजस्थान: 2012) को प्रतिनियुक्ति आधार पर बीएसएफ में डीआईजी नियुक्त किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 10 अप्रैल को राजस्थान के मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा गया है कि तुरंत प्रभाव से आदर्श सिद्धू को रिलीव किया जाए, ताकि वे अपनी नई जिम्मेदारी संभाल सकें। दीपक बर्नवाल, आईपीएस (बिहार: 2010) को भी प्रतिनियुक्ति आधार पर एसएसबी में डीआईजी नियुक्त किया गया है। इन्हें भी तत्काल प्रभाव से रिलीव करने की बात कही गई है। जब यह बिल राज्यसभा में पेश किया गया तो उससे 24 घंटे पहले तक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में प्रतिनियुक्ति पर आईपीएस डीआईजी की नियुक्तियां की गई थीं। 24 मार्च को अंकित गोयल, आईपीएस (एमएच-2010) को बीएसएफ में प्रतिनियुक्ति पर डीआईजी लगाए जाने के आदेश जारी किए गए। उसी दिन नवीन चंद्र झा, आईपीएस (बीएच-2009) को आईटीबीपी में डीआईजी लगाया गया। 
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नए कानून में डीआईजी की प्रतिनियुक्ति का जिक्र नहीं
सीएपीएफ के नए कानून में डीआईजी स्तर पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति का कोई जिक्र नहीं है। आईजी स्तर पर 50 प्रतिशत आईपीएस प्रतिनियुक्ति के पद, एडीजी स्तर पर 67 प्रतिशत प्रतिनियुक्ति और स्पेशल डीजी व डीजी के पदों पर 100 प्रतिशत आईपीएस प्रतिनियुक्ति रहेगी। नए कानून से पहले सीएपीएफ में डीआईजी स्तर पर 20 प्रतिशत पद आईपीएस के लिए रिजर्व थे। अब नए कानून में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। राज्यसभा में बिल पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा था कि अब सहायक कमांडेंट, डीआईजी स्तर तक पहुंचेंगे। डीआईजी के पद पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को खत्म कर दिया गया है। दूसरी तरफ चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि फिलहाल कैडर अफसरों को चार पदोन्नति मिल रही हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लगभग 13 हजार कैडर अधिकारियों को संगठित सेवा का दर्जा देने और उनके दूसरे हितों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में एक अहम फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया कि इन बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) सही मायने में लागू होगा। सीएपीएफ में केवल एनएफएफयू  (नॉन फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन) के लिए नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए 'ओजीएएस पैटर्न' लागू होगा। इसके लिए छह माह की समय-सीमा तय की गई। 'कैडर रिव्यू' करना, यह भी इसी अवधि में शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने आईजी स्तर पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को दो वर्ष में चरणबद्ध तरीके से कम करने की बात कही थी। अब सरकार ने नए कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पलट दिया। 

कमांडेंट बनकर ही रिटायर होंगे कैडर अफसर
मौजूदा समय में बीएसएफ और सीआरपीएफ की बात करें तो 2016 से इन बलों में कैडर रिव्यू ही नहीं हो सका है। यूपीएससी से सेवा में आए कैडर अधिकारियों को 15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं मिल रही। डीओपीटी का नियम है कि हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू होना चाहिए। पूर्व एडीजी बीएसएफ एसके सूद बताते हैं कि सरकार ने नया कानून बनाकर कैडर अफसरों के हितों पर कुठाराघात किया है। जब 16 साल में पहली पदोन्नति मिल रही है तो फिर बाकी सेवा में उन्हें किस तरह तेजी से पदोन्नति मिलेगी। सहायक कमांडेंट को डिप्टी कमांडेंट, टूआईसी और कमांडेंट बनने के बाद ही डीआईजी की पदोन्नति मिलेगी। अंदाजा लगा लें कि सभी सहायक कमांडेंट, डीआईजी तक कैसे पहुंचेंगे। वे कमांडेंट बनकर ही रिटायर हो जाएंगे। 

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटने का मकसद
सूद बताते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में अहम फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया कि सीएपीएफ में संयुक्त सचिव यानी महानिरीक्षक स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को 'धीरे-धीरे' कम किया जाए। सीएपीएफ कैडर के अधिकारियों को उस स्तर तक के सभी पदों पर आसीन होने की अनुमति दी गई। इससे कैडर अधिकारियों के कुछ हद तक ही सही, पदोन्नति के अवसर बढ़ जाते। साथ ही उन्हें गैर-कार्यात्मक उन्नयन का लाभ भी मिलता। कैडर अधिकारियों को अपने-अपने पेशेवर क्षेत्र में व्यापक अनुभव का उच्च पर्यवेक्षण और नीति निर्माण के स्तरों पर उपयोग करने में काफी मदद मिलती। वे इन बलों की नीतियों को परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सक्षम बना सकते थे। सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026, बिना किसी ठोस आधार का उल्लेख किए बिना ही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलट देता है।

यह किसी भी कानूनी खामी को दूर नहीं करता
नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि विधायिका, न्यायालय के निर्णयों को रद्द नहीं कर सकती, लेकिन संशोधनों के माध्यम से कानूनी खामियों को दूर कर सकती है। अब सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। पूर्व कैडर अफसर, इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। वजह, यह किसी भी कानूनी खामी को दूर नहीं करता है। कैडर अधिकारियों ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जीत हासिल की थी। उन्हें उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्रियान्वयन होगा। इससे डेढ़ दो दशक से चल रहा उनका संघर्ष समाप्त हो जाएगा। बतौर एसके सूद, ऐसा नहीं हुआ। उन्हें न्याय पाने के लिए कुछ और साल इंतजार करना पड़ेगा। सीएपीएफ के कैडर अफसरों को सुप्रीम कोर्ट के न्याय पर पूरा भरोसा है।

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