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असम विधानसभा चुनाव 2026: परिसीमन के बाद 40 से ज्यादा सीटों का बदल गया गणित, पुराने गढ़ भी असुरक्षित
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सार
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 75 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं। लेकिन परिसीमन के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 40 से 45 सीटों पर मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है।
असम विधानसभा चुनाव 2026
- फोटो : ANI
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विस्तार
असम में परिसीमन के बाद पहली बार हो रहे विधानसभा चुनाव की जंग राजनीतिक भूगोल पर लड़ी जा रही है। यहां सिर्फ सत्ता की जंग नहीं, बल्कि बदले हुए सियासी नक्शे की पहली बड़ी परीक्षा है। राज्य की 126 सीटों का गणित नए सिरे से लिखा गया है, जहां सीमाएं बदली हैं, मतदाता बदले हैं और साथ ही जीत-हार के पुराने समीकरण भी बिखर गए हैं।
40 से अधिक सीटों का पूरा गुणा-गणित ही बदल गया है। ऐसे में यह चुनाव तय करेगा कि बदली जमीन पर किसकी राजनीति सबसे ज्यादा असरदार साबित होती है। यहां हर सीट नई कहानी कह रही है और हर नतीजा भविष्य की दिशा तय करेगा। यही वजह है कि राज्य में सत्ताधारी भाजपा ने पुराने चेहरों पर भरोसा जताया है तो नए प्रयोगों से बदले सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश भी की है।
परिसीमन के बाद सबसे बड़ा बदलाव सीटों के आरक्षण और सीमाओं में देखने को मिला है। जहां पहले एससी के लिए 8 सीटें आरक्षित थीं, अब 9 हो गई हैं। एसटी की सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गई हैं। सामान्य सीटें 102 से घटकर 98 रह गई हैं। यह बदलाव सीधे तौर पर राजनीतिक ताकत के संतुलन को प्रभावित करता है। जनजातीय और आरक्षित वर्ग का प्रभाव बढ़ने से उन इलाकों में मुकाबला पूरी तरह नया हो गया है, जहां एकतरफा स्थिति मानी जाती थी। सीमाओं में बदलाव सबसे बड़ी कहानी है। अनुमान है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत सीटों की सीमाएं बदली गई हैं। कई सीटों पर नए इलाके जोड़ने और अलग करने से मतदाताओं का सामाजिक और धार्मिक संतुलन बदल गया, जिसका असर सभी प्रमुख दलों के वोट बैंक पर पड़ा है।
एक तिहाई सीटों पर बदले समीकरण
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 75 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं। लेकिन परिसीमन के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 40 से 45 सीटों पर मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है। इनमें से 20 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां परिणाम पूरी तरह नए समीकरणों पर निर्भर करेंगे।
सुरक्षित सीट की अवधारणा बदली
अपर असम में जनजातीय आबादी के बढ़ने से भाजपा को संभावित लाभ माना जा रहा है। वहीं, लोअर असम में बदले धार्मिक और जातीय संतुलन से कांग्रेस को कुछ क्षेत्रों में मजबूती मिल सकती है। बराक घाटी में बदलाव सीमित हैं, लेकिन यहां भी कुछ सीटों पर नई प्रतिस्पर्धा उभर रही है। सबसे अहम बदलाव सुरक्षित सीट की अवधारणा में आया है। कई ऐसी सीटें, जो पहले किसी एक दल का गढ़ मानी जाती थीं, अब पूरी तरह खुली हो गई हैं। इस पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय समीकरण पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।
जालुकबारी सीट गुवाहाटी का शहरी इलाका होने से भाजपा के लिए सुरक्षित सीट थी। परिसीमन से जातीय और स्थानीय समीकरण बदल गए हैं। सीएम हिमंत की यह सीट अब भी मजबूत है, लेकिन मार्जिन में अंतर पड़ सकता है। धेमाजी में पहले जनजातीय प्रभाव सीमित था। परिसीमन के बाद एसटी आबादी का प्रतिशत बढ़ने से सामाजिक समीकरण बदल गया है। मंत्री रनोज पेगु यहां से विधायक हैं।
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40 से अधिक सीटों का पूरा गुणा-गणित ही बदल गया है। ऐसे में यह चुनाव तय करेगा कि बदली जमीन पर किसकी राजनीति सबसे ज्यादा असरदार साबित होती है। यहां हर सीट नई कहानी कह रही है और हर नतीजा भविष्य की दिशा तय करेगा। यही वजह है कि राज्य में सत्ताधारी भाजपा ने पुराने चेहरों पर भरोसा जताया है तो नए प्रयोगों से बदले सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश भी की है।
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परिसीमन के बाद सबसे बड़ा बदलाव सीटों के आरक्षण और सीमाओं में देखने को मिला है। जहां पहले एससी के लिए 8 सीटें आरक्षित थीं, अब 9 हो गई हैं। एसटी की सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गई हैं। सामान्य सीटें 102 से घटकर 98 रह गई हैं। यह बदलाव सीधे तौर पर राजनीतिक ताकत के संतुलन को प्रभावित करता है। जनजातीय और आरक्षित वर्ग का प्रभाव बढ़ने से उन इलाकों में मुकाबला पूरी तरह नया हो गया है, जहां एकतरफा स्थिति मानी जाती थी। सीमाओं में बदलाव सबसे बड़ी कहानी है। अनुमान है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत सीटों की सीमाएं बदली गई हैं। कई सीटों पर नए इलाके जोड़ने और अलग करने से मतदाताओं का सामाजिक और धार्मिक संतुलन बदल गया, जिसका असर सभी प्रमुख दलों के वोट बैंक पर पड़ा है।
एक तिहाई सीटों पर बदले समीकरण
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 75 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं। लेकिन परिसीमन के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 40 से 45 सीटों पर मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है। इनमें से 20 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां परिणाम पूरी तरह नए समीकरणों पर निर्भर करेंगे।
सुरक्षित सीट की अवधारणा बदली
अपर असम में जनजातीय आबादी के बढ़ने से भाजपा को संभावित लाभ माना जा रहा है। वहीं, लोअर असम में बदले धार्मिक और जातीय संतुलन से कांग्रेस को कुछ क्षेत्रों में मजबूती मिल सकती है। बराक घाटी में बदलाव सीमित हैं, लेकिन यहां भी कुछ सीटों पर नई प्रतिस्पर्धा उभर रही है। सबसे अहम बदलाव सुरक्षित सीट की अवधारणा में आया है। कई ऐसी सीटें, जो पहले किसी एक दल का गढ़ मानी जाती थीं, अब पूरी तरह खुली हो गई हैं। इस पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय समीकरण पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।
जालुकबारी सीट गुवाहाटी का शहरी इलाका होने से भाजपा के लिए सुरक्षित सीट थी। परिसीमन से जातीय और स्थानीय समीकरण बदल गए हैं। सीएम हिमंत की यह सीट अब भी मजबूत है, लेकिन मार्जिन में अंतर पड़ सकता है। धेमाजी में पहले जनजातीय प्रभाव सीमित था। परिसीमन के बाद एसटी आबादी का प्रतिशत बढ़ने से सामाजिक समीकरण बदल गया है। मंत्री रनोज पेगु यहां से विधायक हैं।
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