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खरगे के बयान पर गरमाई सियासत: चुनाव आयोग पहुंची भाजपा; कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग
पीटीआई, कोलकाता
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Tue, 21 Apr 2026 09:12 PM IST
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सार
भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ दिए गए बयान को लेकर चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया है। भाजपा ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए खरगे से माफी मांगने, उन पर चुनावी प्रतिबंध लगाने और भारतीय न्याय संहिता के तहत केस दर्ज करने की मांग की है। आइए, विस्तार से मामले को जानते हैं।
नरेंद्र मोदी, मल्लिकार्जुन खरगे
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
देश के चुनावी माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिए गए हालिया बयान ने एक नया राजनीतिक विवाद पैदा कर दिया है। दरअसल तमिलनाडु में एक रैली को दौरान उन्होंने पीएम की तुलनी आतंकवादी से कर दी थी। भाजपा ने इस बयान को न केवल अपमानजनक बताया है, बल्कि इसे चुनावी आचार संहिता का सीधा उल्लंघन करार दिया है।
भाजपा की ओर से चुनाव आयोग को लिखी गई चिट्ठी ने यह साफ कर दिया है कि वे इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष को घेरने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। भाजपा ने इस पूरे मामले को प्रधानमंत्री पद की गरिमा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता से जोड़ दिया है।
क्या भाजपा ने चुनाव आयोग से क्या मांग की?
भाजपा ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को एक औपचारिक पत्र लिखकर मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर तत्काल संज्ञान लेने का अनुरोध किया है। भाजपा का तर्क है कि खरगे का बयान प्रथम दृष्टया आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन है।
पार्टी ने मांग की है कि चुनाव आयोग खरगे को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने या अपना बयान वापस लेने का निर्देश दे। इसके साथ ही, भाजपा ने आयोग से यह भी अपील की है कि कानून और चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार खरगे पर चुनावी अभियान से जुड़े उचित प्रतिबंध लगाए जाएं या अन्य सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि चुनावी मर्यादा बनी रहे।
ये भी पढ़ें- Politics: बंगाल की राजनीति में झालमुड़ी के बाद मछली का तड़का, CM ममता बोलीं- पीएम मोदी के लिए खुद पकाऊंगी
कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग
भाजपा केवल चुनावी प्रतिबंधों तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने खरगे के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है। आयोग को भेजे गए पत्र में भाजपा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं का जिक्र किया है। भाजपा ने मांग की है कि खरगे के खिलाफ धारा 175, 171/174 और 356(1) के साथ-साथ अन्य लागू होने वाली कानूनी धाराओं के तहत दंडात्मक और नियामक कार्यवाही शुरू की जाए। भाजपा चाहती है कि जांच के दौरान जो भी अपराध पाए जाएं, उनके आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को कानूनी अंजाम भुगतना पड़े।
बयान के प्रचार पर रोक लगवाने की भी उठाई मांग
भाजपा ने चुनाव आयोग से यह भी अनुरोध किया है कि खरगे के इस विवादित बयान के प्रचार-प्रसार पर तुरंत रोक लगाई जाए। भाजपा की मांग है कि चुनाव अभियान सामग्री और डिजिटल प्रचार से इस बयान को हटाया जाए। साथ ही, उन्होंने आयोग से आग्रह किया है कि वह मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को इस बयान को अपने मंचों से हटाने का निर्देश दें। भाजपा का मानना है कि इस बयान का निरंतर प्रसार मतदाताओं को गुमराह कर सकता है और चुनावी माहौल को खराब कर सकता है, इसलिए इसे डिजिटल दुनिया से पूरी तरह गायब करना जरूरी है।
खरगे ने मामले में क्या सफाई दी?
विवादों में घिरने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने बयान पर सफाई देते हुए स्पष्ट किया कि उनका इरादा प्रधानमंत्री को 'आतंकवादी' कहना नहीं था, बल्कि वे उनकी कार्यशैली पर प्रहार कर रहे थे। खरगे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ताक़त का इस्तेमाल लोगों और राजनीतिक दलों को डराने-धमकाने के लिए करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी, आयकर विभाग और सीबीआई जैसी सरकारी संस्थाएं पूरी तरह से प्रधानमंत्री के नियंत्रण में हैं और इनका उपयोग विरोधियों को दबाने के लिए किया जा रहा है। खरगे के अनुसार, उनकी टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री द्वारा संस्थानों के माध्यम से पैदा किए गए 'डर के माहौल' को उजागर करना था, न कि उन पर कोई व्यक्तिगत हमला करना।
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भाजपा की ओर से चुनाव आयोग को लिखी गई चिट्ठी ने यह साफ कर दिया है कि वे इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष को घेरने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। भाजपा ने इस पूरे मामले को प्रधानमंत्री पद की गरिमा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता से जोड़ दिया है।
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क्या भाजपा ने चुनाव आयोग से क्या मांग की?
भाजपा ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को एक औपचारिक पत्र लिखकर मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर तत्काल संज्ञान लेने का अनुरोध किया है। भाजपा का तर्क है कि खरगे का बयान प्रथम दृष्टया आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन है।
पार्टी ने मांग की है कि चुनाव आयोग खरगे को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने या अपना बयान वापस लेने का निर्देश दे। इसके साथ ही, भाजपा ने आयोग से यह भी अपील की है कि कानून और चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार खरगे पर चुनावी अभियान से जुड़े उचित प्रतिबंध लगाए जाएं या अन्य सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि चुनावी मर्यादा बनी रहे।
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कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग
भाजपा केवल चुनावी प्रतिबंधों तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने खरगे के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है। आयोग को भेजे गए पत्र में भाजपा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं का जिक्र किया है। भाजपा ने मांग की है कि खरगे के खिलाफ धारा 175, 171/174 और 356(1) के साथ-साथ अन्य लागू होने वाली कानूनी धाराओं के तहत दंडात्मक और नियामक कार्यवाही शुरू की जाए। भाजपा चाहती है कि जांच के दौरान जो भी अपराध पाए जाएं, उनके आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को कानूनी अंजाम भुगतना पड़े।
बयान के प्रचार पर रोक लगवाने की भी उठाई मांग
भाजपा ने चुनाव आयोग से यह भी अनुरोध किया है कि खरगे के इस विवादित बयान के प्रचार-प्रसार पर तुरंत रोक लगाई जाए। भाजपा की मांग है कि चुनाव अभियान सामग्री और डिजिटल प्रचार से इस बयान को हटाया जाए। साथ ही, उन्होंने आयोग से आग्रह किया है कि वह मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को इस बयान को अपने मंचों से हटाने का निर्देश दें। भाजपा का मानना है कि इस बयान का निरंतर प्रसार मतदाताओं को गुमराह कर सकता है और चुनावी माहौल को खराब कर सकता है, इसलिए इसे डिजिटल दुनिया से पूरी तरह गायब करना जरूरी है।
खरगे ने मामले में क्या सफाई दी?
विवादों में घिरने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने बयान पर सफाई देते हुए स्पष्ट किया कि उनका इरादा प्रधानमंत्री को 'आतंकवादी' कहना नहीं था, बल्कि वे उनकी कार्यशैली पर प्रहार कर रहे थे। खरगे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ताक़त का इस्तेमाल लोगों और राजनीतिक दलों को डराने-धमकाने के लिए करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी, आयकर विभाग और सीबीआई जैसी सरकारी संस्थाएं पूरी तरह से प्रधानमंत्री के नियंत्रण में हैं और इनका उपयोग विरोधियों को दबाने के लिए किया जा रहा है। खरगे के अनुसार, उनकी टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री द्वारा संस्थानों के माध्यम से पैदा किए गए 'डर के माहौल' को उजागर करना था, न कि उन पर कोई व्यक्तिगत हमला करना।

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