जलवायु परिवर्तन से बढ़ा बड़ा खतरा: दुनिया में पैर पसार रहा ब्रेन ईटिंग अमीबा, नए इलाकों में फैला संक्रमण
जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी के कारण ब्रेन ईटिंग अमीबा का खतरा बढ़ रहा है। यह जानलेवा अमीबा अब उन क्षेत्रों में भी फैल रहा है, जहां पहले इसका अस्तित्व नहीं था।
विस्तार
बढ़ती वैश्विक गर्मी और तेजी से बदलते पर्यावरण ने दुनिया के सामने एक नया और गंभीर स्वास्थ्य संकट खड़ा कर दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जानलेवा ब्रेन ईटिंग अमीबा अब उन इलाकों तक फैलने लगा है, जहां पहले इसका नाम भी नहीं सुना गया था। कमजोर जल-आपूर्ति प्रणालियां और अपर्याप्त निगरानी इस खतरे को और बढ़ा रही हैं। जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम के असामान्य उतार चढ़ाव तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार धरती के लगातार गर्म होने से ऐसे सूक्ष्मजीवों को नए क्षेत्रों में पनपने का अवसर मिल रहा है, जो पहले सीमित इलाकों तक ही पाए जाते थे। जल, मिट्टी और नमी भरे वातावरण में रहने वाले फ्री-लिविंग अमीबा, जिन्हें आम बोलचाल में ‘दिमाग खाने वाले अमीबा’ कहा जाता है, अब वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक उभरता हुआ खतरा बनते जा रहे हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ पुराना होता जल-आपूर्ति ढांचा और कमजोर निगरानी व्यवस्था इन खतरनाक सूक्ष्मजीवों के फैलाव को तेज कर रही है।
गर्म होती धरती व फैलता दायरा
वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे गर्म पानी पसंद करने वाले अमीबा उन इलाकों तक पहुंच रहे हैं, जहां पहले वे दुर्लभ माने जाते थे। हाल के वर्षों में कई देशों में मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाले जलाशयों में इससे जुड़े संक्रमण के मामले सामने आए हैं, जिससे आम लोगों की चिंता बढ़ी है और जल-सुरक्षा पर नए सवाल खड़े हुए हैं।
सहनशक्ति व जीवित रहने की क्षमता
जर्नल बायोकंटैमिनेंट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार इन अमीबा की सबसे बड़ी ताकत उनकी असाधारण सहनशक्ति है। ये ऐसे हालात में भी जीवित रह सकते हैं जहां अन्य कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। भीषण गर्मी, क्लोरीन जैसे कीटाणुनाशक और यहां तक कि सुरक्षित मानी जाने वाली पानी की पाइपलाइन भी इन्हें खत्म नहीं कर पातीं। यही वजह है कि ये जल-आपूर्ति प्रणालियों में लंबे समय तक टिके रह सकते हैं और पहचान से बचे रहते हैं। अमीबा मिट्टी और पानी में पाए जाने वाले एकल-कोशिकीय जीव होते हैं। जहां इंसान के शरीर में लगभग 30 से 40 लाख करोड़ कोशिकाएं होती हैं, वहीं अमीबा में केवल एक ही कोशिका होती है। इसी एक कोशिका के सहारे यह जीव भोजन खोजता है, उसे ग्रहण करता है, पचाता है और फिर अपशिष्ट के रूप में बाहर निकाल देता है।
समाधान की दिशा
इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिक वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दे रहे हैं। इस दृष्टिकोण में मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण विज्ञान और जल प्रबंधन को एक साथ जोड़कर देखा जाता है।
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