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बीएमसी चुनाव के नतीजों के क्या मायने?: खत्म हुआ 1996 से चल रहा 'ठाकरे' राज, जानें BJP ने कैसे भेदा अभेद्य किला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 16 Jan 2026 04:52 PM IST
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सार
बीएमसी में हुए चुनाव के मौजूदा रुझान क्या हैं? बीते चुनावों में क्या नतीजे रहे हैं और ठाकरे परिवार की ताकत कितनी रही? क्यों अब मुंबई से लेकर महाराष्ट्र और पूरे देश की नजरें इस महानगरपालिका पर जमी हैं? बृहन्मुंबई महानगरपालिका क्या जिम्मेदारियां निभाती है? इसका बजट और फंड्स कहां से आता है?
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बृहन्मुंबई महानगरपालिका, जिसे बीएमसी के तौर पर भी जाना जाता है, के चुनाव तय समय से करीब चार साल के अंतराल के बाद कराए गए हैं। 15 जनवरी (गुरुवार) को बीएमसी चुनाव के लिए मतदान हुआ और अब जो रुझान सामने आ रहे हैं, उसके मुताबिक बीएमसी में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती दिख रही है। अगर यह रुझान नतीजों में बदलते हैं तो 25 साल में यह पहली बार होगा, जब ठाकरे परिवार का मुंबई महानगरपालिका पर शासन से ही बाहर हो जाएगा।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बीएमसी में हुए चुनाव के मौजूदा रुझान क्या हैं? बीते चुनावों में क्या नतीजे रहे हैं और ठाकरे परिवार की ताकत कितनी रही? क्यों अब मुंबई से लेकर महाराष्ट्र और पूरे देश की नजरें इस महानगरपालिका पर जमी हैं? बृहन्मुंबई महानगरपालिका क्या जिम्मेदारियां निभाती है? इसका बजट और फंड्स कहां से आता है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बीएमसी में हुए चुनाव के मौजूदा रुझान क्या हैं? बीते चुनावों में क्या नतीजे रहे हैं और ठाकरे परिवार की ताकत कितनी रही? क्यों अब मुंबई से लेकर महाराष्ट्र और पूरे देश की नजरें इस महानगरपालिका पर जमी हैं? बृहन्मुंबई महानगरपालिका क्या जिम्मेदारियां निभाती है? इसका बजट और फंड्स कहां से आता है? आइये जानते हैं...
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बीएमसी के मौजूदा रुझान क्या हैं?
बीते चुनावों से बीएमसी की सत्ता पर कैसे काबिज ठाकरे परिवार?
शिवसेना के लिए बृहन्मुंबई महानगरपालिका का चुनावी इतिहास 1971 से शुरू होता है। तब पार्टी के हेमचंद्र गुप्ते यहां से महापौर बने। हालांकि, शिवसेना और ठाकरे परिवार का बीएमसी में वर्चस्व 1985 के बाद शुरू हुआ, जब 5 अप्रैल को 170 सीटों के लिए चुनाव हुए और नया नगर निगम 10 मई से अस्तित्व में आया। 1992 तक शिवसेना ने बीएमसी पर शासन किया। इसके बाद आरपीआई और कांग्रेस ने यहां 1996 तक शासन संभाला।शिवसेना की 1996 के चुनाव में जबरदस्त वापसी हुई और तब से लेकर अब तक मुंबई की कमान ठाकरे परिवार के हाथ में आ गई। इसके बाद लगातार 2022 तक पार्टी ने यहां जीत हासिल की और लगातार 25 साल अपने महापौर के जरिए शासन किया। हालांकि, 2022 के बाद से ही यहां चुनाव नहीं हुए हैं।
अब जानें- बीएमसी चुनाव नतीजों के मायने क्या?
महाराष्ट्र के राजनीतिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे ने भाजपा की रणनीति और जीत के कारणों पर बात की। उन्होंने भाजपा गठबंधन की जीत के पीछे मुख्यतः चार कारण बताए, वहीं बीएमसी में ठाकरे परिवार की हार को लेकर भी मुद्दों का जिक्र किया।भाजपा ने क्या रखा बीएमसी के लिए एजेंडा, जीती कैसे?
1. विकास का मुद्दा: भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में मुख्य रूप से विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया। पार्टी ने कोस्टल रोड, मेट्रो और अन्य विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश किया। भाजपा ने मतदाताओं को यह समझाने पर जोर दिया कि उन्होंने मुंबई के लिए क्या-क्या काम किए हैं।2. महायुति गठबंधन: देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के एक साथ आने से उनकी ताकत बढ़ गई। शिवसेना के दो हिस्सों में बंटने और शिंदे गुट के भाजपा के साथ आने से गठबंधन की स्थिति मजबूत हुई। दूसरी तरफ शिवसेना, जो अपने मूल स्वरूप में चुनाव जीतती थी, उसकी ताकत बंट गई।
3. संगठनात्मक मजबूती और सत्ता का लाभ: भाजपा की ताकत वार्ड स्तर और हर बूथ पर बढ़ गई थी, क्योंकि उनके पास कई विधायक चुनकर आए थे। सत्ता में होने की वजह से उन्हें सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और संसाधनों का लाभ मिला, जिससे वे मतदाताओं को अधिक सुविधाएं और आश्वासन दे पाए।
4. पिछली तैयारियों का आधार: पिछले बीएमसी चुनाव में भी भाजपा की सीटें शिवसेना से केवल दो कम थीं। उस समय से ही भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी थी।
4. पिछली तैयारियों का आधार: पिछले बीएमसी चुनाव में भी भाजपा की सीटें शिवसेना से केवल दो कम थीं। उस समय से ही भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी थी।
ठाकरे बंधुओं की हार के मुख्य कारण?
1. पार्टी में विभाजन और कमजोर नींव: चंद्रकांत शिंदे के मुताबिक, शिवसेना के दो फाड़ होने के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी की नींव हिल गई थी। उनके कई विधायक और नगर सेवक उन्हें छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए, जिससे पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हुआ।2. पुराने मुद्दों पर अत्यधिक निर्भरता: उद्धव ठाकरे ने 'मराठी मानुष' और 'मुंबई को तोड़ने की साजिश' जैसे पारंपरिक मुद्दों को आगे बढ़ाया। इससे मुंबई की जनता ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक फायदे के लिए इन मुद्दों का इस्तेमाल किया गया, जबकि मराठी लोगों के लिए पर्याप्त काम नहीं किया गया।
3. विकास कार्यों का विरोध: उद्धव ठाकरे और शिवसेना की तरफ से मेट्रो (आरे मेट्रो) जैसे प्रोजेक्ट्स का विरोध किया गया और इसके चलते ये परियोजनाएं देरी से पूरी हुईं। मुंबई की जनता जो लंबे समय से ट्रैफिक से जुड़ी समस्याओं जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा क्योंकि जनता विकास देख रही थी।
4. भीड़ बनाम वोट: शिंदे के मुताबिक, ठाकरे भाइयों की सभाओं में भीड़ तो होती थी, लेकिन वह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो पाई। इसका खामियाजा शिवसेना (यूबीटी) और मनसे दोनों को भुगतना पड़ा।
मुंबई, महाराष्ट्र और देश की नजरें इस महानगरपालिका पर क्यों?
- बीएमसी की स्थापना 1865 को ब्रिटिश शासन के दौरान हुई, हालांकि कुछ स्रोतों के हवाले से दावा किया जाता है कि इसकी स्थापना 1873 में हुई थी। इस लिहाज से यह देश का सबसे पुराना नगर निकाय है।
- मुंबई के 24 वॉर्ड्स के लिए जिम्मेदार बृहन्मुंबई नगर निगम दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अमीर नगर निगम भी है। इसका बजट कई राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों के कुल बजट से ज्यादा है।
बीएमसी की अहमियत मुंबई के निवासियों के लिहाज से काफी अहम है, जिनमें उद्योगपतियों से लेकर बॉलीवुड सेलिब्रिटीज और महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक हस्तियां शामिल हैं। इसके चलते बीएमसी का शहर के विकास पर सीधा प्रभाव है।
- बुनियादी सेवाओं के लिए रखरखाव की जिम्मेदारी: यह शहर के 2,050 किमी लंबे सड़क नेटवर्क के निर्माण और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा, यह सात झीलों के माध्यम से पूरे मुंबई को पीने के पानी की आपूर्ति करता है और जल निकासी (सीवेज) का प्रबंधन करता है।
- बुनियादी ढांचा और अपशिष्ट प्रबंधन की निगरानी: शहर की बड़ी परियोजनाओं, जैसे मुंबई कोस्टल रोड, फ्लाईओवर और पुलों का निर्माण भी बीएमसी की ही जिम्मेदारी है। मुंबई में हर दिन 8,000 से 10,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा करता है, जिसे इकट्ठा करने और इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी बीएमसी की है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा: बीएमसी देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में से एक का संचालन करता है। इसमें चार मेडिकल कॉलेज अस्पताल, 16 सामान्य अस्पताल और कई छोटे-बड़े औषधालय शामिल हैं। इसके अलावा यह 1100 से अधिक नगर निगम स्कूल भी चलाता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को शिक्षा देने के लिए हैं।
सार्वजनिक परिवहन और रखरखाव: बीएमसी बेस्ट (बसों) के रखरखाव के लिए मूल संस्था है। यह शहर के 800 से ज्यादा उद्यानों और खुले स्थानों का रखरखाव करती है।
राजनीतिक महत्व: बीएमसी के चुनाव न केवल शहर के लिए बल्कि राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि ये शहरी रुझानों का संकेत देते हैं।
ये भी पढ़ें: BMC Election Results 2026 Live: बीएमसी के रुझानों में BJP+ को बहुमत, 130 सीटों पर बढ़त; AIMIM का भी खुला खाता
सार्वजनिक परिवहन और रखरखाव: बीएमसी बेस्ट (बसों) के रखरखाव के लिए मूल संस्था है। यह शहर के 800 से ज्यादा उद्यानों और खुले स्थानों का रखरखाव करती है।
राजनीतिक महत्व: बीएमसी के चुनाव न केवल शहर के लिए बल्कि राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि ये शहरी रुझानों का संकेत देते हैं।
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इसका बजट और फंड्स कहां से आता है?
बृहन्मुंबई नगर निगम का बजट लगभग 74,000 करोड़ रुपये है। इसकी आय और फंडिंग मुख्य तौर पर संपत्ति पर लगने वाले करों और सेवा शुल्कों के जरिए आता है।संपत्ति कर: यह बीएमसी की आय का सबसे मुख्य और बड़ा स्रोत है। यह कर मुंबई की आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक संपत्तियों पर लगाया जाता है।
सेवा शुल्क: नागरिक सुविधाओं के बदले में निगम शुल्क वसूलता है, जिसमें पानी का शुल्क और सीवेज शुल्क शामिल हैं।
प्रशासनिक शुल्क और जुर्माने: अलग-अलग अनुमतियों और नियमों के उल्लंघन पर लगने वाले शुल्क भी इसकी कमाई का हिस्सा हैं। भवन निर्माण की अनुमति से मिलने वाली फीस भी शामिल है। इसके अलावा पार्किंग शुल्क और जुर्माने भी फंडिंग का हिस्सा हैं।
विकास-विज्ञापन शुल्क: शहर में होने वाले विकास कार्यों के लिए बिल्डरों की तरफ से बीएमसी को विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्जेस) और विज्ञापनों से मिलने वाली फीस भी राजस्व का एक बड़ा हिस्सा है।
सरकारी अनुदान: बीएमसी का राजस्व आधार जबरदस्त तौर पर मजबूत है और उसके अधिकतर खर्च के फंड्स इनसे ही निकल आते हैं। इस लिहाज से वह बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए राज्य सरकार पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। फिर भी उसे राज्य सरकार से अनुदान मिलते हैं।
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