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नमामि गंगे: 40 साल, हजारों करोड़ और फिर भी मैली रह गई गंगा; सीएजी ने किन कमियों पर की सख्त टिप्पणी?
Thu, 16 Jul 2026 05:31 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 16 Jul 2026 05:31 AM IST
सार
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ऑडिट रिपोर्ट में उत्तराखंड में नमामि गंगे परियोजना के क्रियान्वयन में कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट गंदे पानी को प्रभावी ढंग से रोकने में विफल रहे, जबकि कुछ संयंत्र क्षमता से अधिक और कुछ बेहद कम क्षमता पर संचालित हो रहे हैं। कई स्थानों पर सीवर नेटवर्क घरों तक नहीं पहुंच पाया, जिससे गंदा पानी सीधे नदी तंत्र में जा रहा है।
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नमामि गंगे परियोजना
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/प्रिंट
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विस्तार
गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए करीब चार दशक से चल रहे सरकारी अभियानों और हजारों करोड़ रुपए के खर्च के बावजूद नदी को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य अधूरा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने उत्तराखंड में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना के क्रियान्वयन में गंभीर कमियों का खुलासा किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के एक-तिहाई से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) गंगा और उसकी सहायक नदियों में बिना शोधित सीवेज जाने से रोकने में विफल रहे हैं। कई संयंत्र क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे हैं, कई का रखरखाव नहीं हो रहा है और कई स्थानों पर जहरीला स्लज किसानों के खेतों तक पहुंच गया।
सीएजी ने वर्ष 2018 से 2023 के दौरान उत्तराखंड में नमामि गंगे के तहत संचालित परियोजनाओं का परफॉर्मेंस ऑडिट किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017-18 की पिछली ऑडिट के बाद भी योजना निर्माण, क्रियान्वयन, संचालन और रखरखाव में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इससे राज्य सरकार गंगा में बिना शोधित सीवेज के प्रवाह को रोकने के अपने प्रमुख उद्देश्य को हासिल नहीं कर सकी।
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करोड़ों खर्च, लेकिन घरों तक नहीं पहुंचे सीवर कनेक्शन
ऑडिट में सात कस्बों में बनाए गए 21 एसटीपी को लगभग सांकेतिक परियोजनाएं बताया गया है, क्योंकि वे एक भी घर के सीवरेज नेटवर्क से नहीं जुड़े। जोशीमठ में करोड़ों खर्च कर तैयार की गई सीवरेज व्यवस्था के बावजूद किसी भी घर को कनेक्शन नहीं मिला। कई शहरों में हजारों घर अब भी सीवर नेटवर्क से बाहर हैं, जिससे गंदा पानी सीधे नालों और अंततः गंगा तक पहुंच रहा है।
कहीं क्षमता से अधिक दबाव, कहीं खाली पड़े संयंत्र
रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार का 68 एमएलडी क्षमता वाला एसटीपी पहले ही अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक सीवेज का उपचार कर रहा है, जबकि ऋषिकेश का पांच एमएलडी संयंत्र अपनी क्षमता से कई गुना अधिक भार झेल रहा था। इसके विपरीत देवप्रयाग का एसटीपी अपनी क्षमता के केवल तीन से चार प्रतिशत पर संचालित हो रहा था। इससे योजना निर्माण और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
योजना निर्माण और स्थानीय भागीदारी का अभाव
सीएजी ने पाया कि राज्य स्तर पर नदी बेसिन प्रबंधन योजना वर्षों बाद भी तैयार नहीं की गई। जिला स्तर पर भी ऐसी कोई समग्र योजना मौजूद नहीं थी। स्थानीय लोगों को योजना निर्माण और क्रियान्वयन में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण कई परियोजनाएं स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकसित नहीं हो सकीं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से गंगा तटीय कस्बों में स्वच्छता ढांचे के विकास के लिए कोई उल्लेखनीय निवेश नहीं किया।
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रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के एक-तिहाई से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) गंगा और उसकी सहायक नदियों में बिना शोधित सीवेज जाने से रोकने में विफल रहे हैं। कई संयंत्र क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे हैं, कई का रखरखाव नहीं हो रहा है और कई स्थानों पर जहरीला स्लज किसानों के खेतों तक पहुंच गया।
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सीएजी ने वर्ष 2018 से 2023 के दौरान उत्तराखंड में नमामि गंगे के तहत संचालित परियोजनाओं का परफॉर्मेंस ऑडिट किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017-18 की पिछली ऑडिट के बाद भी योजना निर्माण, क्रियान्वयन, संचालन और रखरखाव में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इससे राज्य सरकार गंगा में बिना शोधित सीवेज के प्रवाह को रोकने के अपने प्रमुख उद्देश्य को हासिल नहीं कर सकी।
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करोड़ों खर्च, लेकिन घरों तक नहीं पहुंचे सीवर कनेक्शन
ऑडिट में सात कस्बों में बनाए गए 21 एसटीपी को लगभग सांकेतिक परियोजनाएं बताया गया है, क्योंकि वे एक भी घर के सीवरेज नेटवर्क से नहीं जुड़े। जोशीमठ में करोड़ों खर्च कर तैयार की गई सीवरेज व्यवस्था के बावजूद किसी भी घर को कनेक्शन नहीं मिला। कई शहरों में हजारों घर अब भी सीवर नेटवर्क से बाहर हैं, जिससे गंदा पानी सीधे नालों और अंततः गंगा तक पहुंच रहा है।
कहीं क्षमता से अधिक दबाव, कहीं खाली पड़े संयंत्र
रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार का 68 एमएलडी क्षमता वाला एसटीपी पहले ही अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक सीवेज का उपचार कर रहा है, जबकि ऋषिकेश का पांच एमएलडी संयंत्र अपनी क्षमता से कई गुना अधिक भार झेल रहा था। इसके विपरीत देवप्रयाग का एसटीपी अपनी क्षमता के केवल तीन से चार प्रतिशत पर संचालित हो रहा था। इससे योजना निर्माण और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
योजना निर्माण और स्थानीय भागीदारी का अभाव
सीएजी ने पाया कि राज्य स्तर पर नदी बेसिन प्रबंधन योजना वर्षों बाद भी तैयार नहीं की गई। जिला स्तर पर भी ऐसी कोई समग्र योजना मौजूद नहीं थी। स्थानीय लोगों को योजना निर्माण और क्रियान्वयन में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण कई परियोजनाएं स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकसित नहीं हो सकीं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से गंगा तटीय कस्बों में स्वच्छता ढांचे के विकास के लिए कोई उल्लेखनीय निवेश नहीं किया।