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CAG Report: बंगाल की पूर्व ममता सरकार में आदिवासियों को नहीं मिला हक; कैसे करोड़ों के मुआवजे से वंचित रहे लोग?
Thu, 06 Aug 2026 01:55 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Thu, 06 Aug 2026 01:55 PM IST
सार
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार पर आरोप लगाया गया है कि उसने खनन परियोजनाओं के लिए आदिवासियों की जमीन खरीद के दौरान उनके हितों की रक्षा नहीं की। रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार मूल्य से काफी कम मुआवजा दिया गया, कानून के तहत मिलने वाले अतिरिक्त लाभ भी नहीं दिए गए और पुनर्वास प्रक्रिया में गंभीर खामियां रहीं।
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ममता बनर्जी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने पश्चिम बंगाल सरकार की उस कथित विफलता को उजागर किया है, जिसमें खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के दौरान आदिवासी समुदाय के हितों की समुचित रक्षा नहीं की गई। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच, जब राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार थी, तब आदिवासी भूमि के बदले उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला और पुनर्वास प्रक्रिया भी गंभीर खामियों से घिरी रही।
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किन परियोजनाओं और किन इलाकों की हुई जांच?
CAG ने आदिवासी क्षेत्रों में भूमि प्रबंधन की ऑडिट के दौरान वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच भूमि अधिग्रहण के 66 मामलों की जांच की। इनमें ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) के सालानपुर, श्रीपुर, कुनुस्तोरिया और परबेलिया क्षेत्र तथा भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के बाराकर क्षेत्र की परियोजनाएं शामिल थीं।
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मुआवजे में कितनी बड़ी कमी सामने आई?
रिपोर्ट के मुताबिक, आदिवासी जमीनों का बाजार मूल्य 17.79 करोड़ रुपये आंका गया था, लेकिन ECL और BCCL ने प्रत्यक्ष खरीद के जरिए केवल 2.55 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इस तरह आदिवासियों को 15.25 करोड़ रुपये यानी बाजार मूल्य का करीब 85.68 प्रतिशत कम मुआवजा मिला।
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कानून के तहत मिलने वाले कौन-कौन से लाभ नहीं दिए गए?
CAG ने बताया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत मिलने वाला 100 प्रतिशत सोलैटियम (अतिरिक्त मुआवजा) भी आदिवासियों को नहीं दिया गया। इससे उन्हें लगभग 17.80 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाजार मूल्य पर प्रतिवर्ष 12 प्रतिशत की दर से मिलने वाला अतिरिक्त मुआवजा भी किसी भी जांचे गए मामले में नहीं दिया गया।
जमीन की कीमतों में कितना बड़ा अंतर मिला?
CAG ने ECL द्वारा भुगतान की गई भूमि कीमतों में भारी असमानता का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासियों को उनकी एक एकड़ जमीन के बदले 2.50 लाख रुपये से 12.63 लाख रुपये तक का भुगतान किया गया, जबकि सरकार को इसी क्षेत्र में प्रति एकड़ 19.77 लाख रुपये से लेकर 1.25 करोड़ रुपये तक का मुआवजा दिया गया।
जिला प्रशासन की क्या भूमिका रही?
रिपोर्ट के अनुसार, जिला प्रशासन यह सुनिश्चित करने में विफल रहा कि आदिवासी भूमि मालिकों को उनकी जमीन का उचित बाजार मूल्य मिले। जबकि कोल इंडिया की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2012 में इसके स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। कैग ने कहा कि जिला स्तर के अधिकारियों, जैसे राजस्व अधिकारी, जिला कलेक्टर और अन्य संबंधित अधिकारियों की निष्क्रियता और पर्याप्त भागीदारी न होने के कारण आदिवासी परिवारों को मुआवजे और पुनर्वास दोनों में नुकसान उठाना पड़ा।
ECL अधिकारियों ने क्या सफाई दी?
भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़े ECL अधिकारियों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में कोयला खनन परियोजनाओं के लिए अधिकांश भूमि का अधिग्रहण अनिवार्य अधिग्रहण के बजाय सीधे खरीद के माध्यम से पंजीकृत बिक्री विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) के जरिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि आदिवासी भूमि खरीदने के लिए पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955 के तहत राजस्व अधिकारी की अनुमति अनिवार्य होती है। परियोजना अधिकारी-सह-जिला कल्याण अधिकारी, राज्य के पंजीकरण एवं स्टांप राजस्व निदेशालय द्वारा निर्धारित बाजार मूल्य के आधार पर भूमि हस्तांतरण की कीमत तय करते हैं। अधिकारियों के अनुसार, ये अनुमतियां समयबद्ध होती हैं और ECL को पंजीकृत लेन-देन का प्रमाण जिला प्रशासन को देना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वीकृत भूमि मूल्य के अलावा कंपनी हर दो एकड़ जमीन खरीदने पर प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार भी उपलब्ध कराती है, ताकि आजीविका के नुकसान की भरपाई हो सके।
पुनर्वास व्यवस्था में क्या-क्या कमियां मिलीं?
CAG ने पुनर्वास व्यवस्था में भी गंभीर खामियां पाईं। रिपोर्ट के अनुसार, ECL के कुनुस्तोरिया और परबेलिया क्षेत्रों में भूमि खरीद से पहले न तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराया गया और न ही सामाजिक प्रभाव आकलन किया गया, जबकि यह परियोजना से प्रभावित लोगों की पहचान और पुनर्वास कार्ययोजना तैयार करने के लिए अनिवार्य था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई मामलों में पुनर्वास कार्ययोजना बनाई ही नहीं गई या फिर जिला प्रशासन को इसमें शामिल नहीं किया गया, जो कोल इंडिया की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के विपरीत है।
कंपनियों ने क्या दलील दी और CAG ने क्या कहा?
ECL-कुनुस्तोरिया ने कहा कि चूंकि जमीन प्रत्यक्ष खरीद के जरिए ली गई थी, इसलिए जिला कलेक्टर की भागीदारी आवश्यक नहीं थी। वहीं BCCL-बाराकर का कहना था कि मुआवजा भूमि मालिकों के साथ आपसी सहमति से तय किया गया। हालांकि CAG ने दोनों दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि ये कोल इंडिया की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति तथा 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुरूप नहीं हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि ECL के सालानपुर, श्रीपुर और परबेलिया क्षेत्रों से इस संबंध में कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
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CAG ने क्या सिफारिशें कीं?
CAG ने राज्य सरकार को सिफारिश की है कि ECL और BCCL द्वारा किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में जिला कलेक्टर की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। साथ ही कोल इंडिया से कहा गया है कि वह आदिवासी प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन की निगरानी के लिए परियोजना समूह (Project Groups) गठित करे, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं को रोका जा सके।