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Congress: वोट चोर... SIR के बाद अब मनरेगा, कांग्रेस की खोई पकड़ वापसी की कोशिश; क्या मिलेगी संजीवनी?
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सार
कांग्रेस इस आंदोलन के बहाने ग्रामीण इलाकों में अपने पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ना चाहती है, लेकिन जमीनी हकीकत पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि कई बड़े राज्यों में पार्टी का संगठन कमजोर है।
'मनरेगा बचाओ संग्राम'
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कांग्रेस फिर से ग्रामीण भारत में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को मजबूत करने की तैयारी में जुट गई है। संसद में जीरामजी कानून के विरोध के बाद पार्टी अब सीधे सड़कों और गांवों तक उतरने की रणनीति पर काम कर रही है। नए कानून की वापसी की मांग को लेकर 10 जनवरी से 25 फरवरी तक 'मनरेगा बचाओ संग्राम' चलाया जाएगा। पार्टी नेतृत्व इस आंदोलन को ग्रामीण भारत में कमजोर होती सियासी पकड़ को फिर से मजबूत करने और पारंपरिक वोट बैंक को साधने के मौके के तौर पर देख रहा है। यही वजह है कि अभियान की सफलता का पूरा दारोमदार राज्य इकाइयों पर डालते हुए उनकी सक्रियता की सीधी जवाबदेही कांग्रेस महासचिवों और राज्यों के प्रभारियों को सौंपी गई है।
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दरअसल, कांग्रेस इस आंदोलन के बहाने ग्रामीण इलाकों में अपने पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ना चाहती है, लेकिन जमीनी हकीकत पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के अलावा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, गुजरात, दिल्ली,महाराष्ट्र जैसे राज्यों में संगठन कमजोर है। राजस्थान में कांग्रेस अंदरूनी सियासी संघर्षों से जूझती नजर आ रही है। दक्षिण भारत में केरल, कर्नाटक और तेलंगाना में पार्टी की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में ठीक है लेकिन चुनावी राज्य तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में संगठन पहले के मुकाबले काफी कमजोर हो चुका है। चुनावी राज्य असम में भी पार्टी फिर से संगठन मजबूत करने में जुटी है।
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पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस ने वोट चोरी और एसआईआर जैसे मुद्दों को लेकर देशव्यापी सियासी मुहिम चलाने की कोशिश की थी, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर यह धारणा बनी कि ऐसे मुद्दे ज़मीनी स्तर पर ज्यादा असर नहीं छोड़ पाए। कांग्रेस नेतृत्व को महसूस हुआ कि जनता से सीधा संवाद बनाने के लिए किसी ऐसे विषय की जरूरत है, जो रोजमर्रा की जिंदगी और रोजी रोटी से सीधे जुड़ा हो। इसी तलाश में मनरेगा को सबसे प्रभावी मुद्दा माना गया, जिसे केंद्र में रखकर कांग्रेस अब नया राजनीतिक अभियान खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि ग्रामीण रोजगार से जुड़ा यह मुद्दा न सिर्फ सरकार को घेरने का मौका देगा, बल्कि कांग्रेस को अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से दोबारा जोड़ने का जरिया भी बन सकता है। मनरेगा बचाओ संग्राम को इसी रणनीति का अहम औजार माना जा रहा है, जिसके जरिए कांग्रेस गांव-गांव अपनी सियासी मौजूदगी फिर से दर्ज कराने की कोशिश में है।
मनरेगा के माध्यम से नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि, 2009 में केंद्र में कांग्रेस की सत्ता में वापसी में मनरेगा की भूमिका निर्णायक रही थी। अब पार्टी उसी सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय करना चाहती है। खासकर उत्तर भारत के उन राज्यों में जहां पार्टी लंबे समय से कमजोर रही है। इसलिए मनरेगा के माध्यम से नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है। अब कांग्रेस के लिए 'मनरेगा बचाओ संग्राम' अभियान नई राजनीतिक संजीवनी साबित होगा या एक और अधूरी कोशिश यह समय ही बताएगा। लेकिन अगर पार्टी प्रभावी ढंग से मजदूरों और ग्रामीणों के बीच जाकर उनकी समस्याओं, अनुभवों और आशंकाओं को आंदोलन का केंद्र बनाती है, तो यह अभियान उसे ग्रामीण भारत में फिर से प्रासंगिक और दिखने योग्य राजनीतिक विकल्प बन सकता है।
नाम न छापने के अनुरोध पर वरिष्ठ कांग्रेस और पूर्व राज्यसभा सांसद ने बताया कि, कांग्रेस कई राज्यों में लंबे वक्त से संगठन की कमजोरियों से जूझ रही है। 2029 के चुनावी परिणाम में भी इसका असर साफ दिखा है। पिछले साल अप्रैल में अहमदाबाद में हुए कांग्रेस अधिवेशन में पार्टी ने एक साल को संगठन सृजन वर्ष घोषित किया था। इसमें बूथ से लेकर ब्लॉक, जिला, राज्य और शीर्ष स्तर तक संगठन को मजबूत करने का संकल्प लिया था। इसके तहत पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में जिला अध्यक्षों की नई प्रक्रिया के तहत की गई थी। ऐसे में यह मनरेगा बचाओ संग्राम इन राज्य इकाइयों की जुझारू क्षमता और जमीनी सक्रियता को परखने का बड़ा मौका साबित होगा।
पंचायत से संसद तक डेढ़ महीने का व्यापक कार्यक्रम
कांग्रेस पार्टी ने इसे राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए पंचायत से संसद तक डेढ़ महीने का व्यापक कार्यक्रम तैयार किया है। योजना के तहत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पत्र सीधे ग्राम प्रधानों, पूर्व ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों और मनरेगा मजदूरों तक पहुंचाए जाएंगे, ताकि आंदोलन का संदेश सीधे निचले स्तर तक पहुँच सके और जनता के बीच सियासी दबाव बनाया जा सके। कांग्रेस का आरोप है कि, मोदी सरकार मनरेगा का नाम और ढांचा बदलकर इसकी कानूनी गारंटी कमजोर करना चाहती है। मनरेगा सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों, खासकर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए जीवन रेखा रही है। वीबी जीराम जी जैसे नए ढांचे में रोजगार की गारंटी, समय पर मजदूरी और जरूरत के हिसाब से काम देने की व्यवस्था खत्म होने का खतरा है।
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कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल का कहना है कि, मनरेगा को लेकर सभी राज्यों में आंदोलन का प्लान तैयार हुआ है। केंद्र सरकार का नया कानून मनरेगा को कमजोर करने की साजिश है। जी राम जी कानून में सबकुछ दिल्ली तय करेगा। पहले मनरेगा डिमांड ड्रिवन था। लेकिन अब फंड खत्म होने के बाद कोई काम नहीं मिलेगा। महात्मा गांधी का नाम इस स्कीम से हटाना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। वेणुगोपाल ने कहा, इस नए कानून के विरोध कांग्रेस पार्टी मनरेगा बचाओ संग्राम शुरू करने जा रहे ही। 10 जनवरी को सभी जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया जाएगा। इसमें पंचायती राज को खत्म करने की साजिश को उजागर किया जाएगा। 11 जनवरी को सभी जिलों में महात्मा गांधी या बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की मूर्ति के सामने एक दिनों का उपवास किया जाएगा। 12 जनवरी से 29 जनवरी तक हर पंचायत में चौपाल लगाया जाएगा।
वेणुगोपाल ने बताया, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता विपक्ष राहुल गांधी की तरफ से सभी ग्राम प्रधान को पत्र लिखा जाएगा। 30 जनवरी को वार्ड और ब्लॉक लेवल पर कार्यक्रम किया जाएगा। 31 जनवरी से 6 फरवरी के बीच जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर धरना दिया जाएगा। 7 फरवरी से 15 के बीच विधानसभा और राजभवन के घेराव कार्यक्रम किया जाएगा। इसमें सभी जनप्रतिनिधि शामिल होंगे। 16 फरवरी से 25 फरवरी के बीच कांग्रेस पार्टी बड़ी रैली करेगी।