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'संसद में बिल आने के बाद तय होगी रणनीति': परिसीमन पर DMK ने नहीं खोले पत्ते; दक्षिण के राज्यों को क्या मिलेगा?
Fri, 07 Aug 2026 04:12 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, चेन्नई।
पीटीआई, चेन्नई।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 07 Aug 2026 04:12 PM IST
सार
परिसीमन बिल पर डीएमके ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। पार्टी संसद में बिल का आधिकारिक मसौदा आने का इंतजार कर रही है। ड्राफ्ट देखने और अपने सुझावों की समीक्षा करने के बाद ही पार्टी अपना अंतिम राजनीतिक रुख तय करेगी।
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आरएस भारती, डीएमके नेता
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
संसद में परिसीमन विधेयक को लेकर सियासी हलचल तेज है। इस बीच तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी डीएमके ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता आरएस भारती ने शुक्रवार को बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) इस बिल का समर्थन करेगी या विरोध, इसका फैसला संसद में बिल पेश होने के बाद ही होगा।
भारती ने कहा कि विधेयक के अंतिम मसौदे को देखे बिना कोई भी निर्णय लेना जल्दबाजी होगी। उनका मानना है कि जब तक आधिकारिक बिल सामने नहीं आ जाता, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं है।
क्या बिल में शामिल होंगे पुराने सुझाव?
परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर हाल ही में लोकसभा में तीखी बहस हो चुकी है। इस विधेयक में दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक विवाद गहराया हुआ है।
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आरएस भारती ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में अपनी बात रखी। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार जब परिसीमन का मुद्दा उठा था, तब पार्टी ने इसका विरोध किया था। उस समय डीएमके ने केंद्र सरकार को अपने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी सौंपे थे।
भारती ने कहा, 'अगर सरकार हमारे उन सुझावों को नए बिल में शामिल करती है, तो हम इस पर विचार करेंगे। हम बिल के हर एक पहलू, उसके फायदे और नुकसान का लाइन दर लाइन गहराई से अध्ययन करेंगे।' उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी पूरा ड्राफ्ट देखने के बाद ही अपने कदम तय करेगी।
यह भी पढ़ें: संसद में घमासान के आसार: कांग्रेस ने पार्टी सांसदों को जारी किया व्हिप, क्या है 10 से 12 अगस्त का प्लान?
क्या हैं परिसीमन बिल से जुड़े पांच सबसे बड़ी बातें?
क्या दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व घटेगा?
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के नेताओं में एक बड़ा डर बना हुआ है। उन्हें लगता है कि आबादी के आधार पर परिसीमन होने से दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज किया है। सरकार का दावा है कि इस नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
अप्रैल 2026 में सामने आए विधायी प्रस्तावों के मुताबिक, लोकसभा में कुल सीटों की संख्या लगभग 50 फीसदी बढ़ाने की योजना है। इससे कुल सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी, इसमें केंद्र शासित प्रदेशों की भी 35 सीटें शामिल होंगी। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी में तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी। इस तरह विस्तारित संसद में भी तमिलनाडु का हिस्सा 7.2 फीसदी पर सुरक्षित रहेगा।
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भारती ने कहा कि विधेयक के अंतिम मसौदे को देखे बिना कोई भी निर्णय लेना जल्दबाजी होगी। उनका मानना है कि जब तक आधिकारिक बिल सामने नहीं आ जाता, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं है।
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क्या बिल में शामिल होंगे पुराने सुझाव?
परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर हाल ही में लोकसभा में तीखी बहस हो चुकी है। इस विधेयक में दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक विवाद गहराया हुआ है।
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आरएस भारती ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में अपनी बात रखी। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार जब परिसीमन का मुद्दा उठा था, तब पार्टी ने इसका विरोध किया था। उस समय डीएमके ने केंद्र सरकार को अपने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी सौंपे थे।
भारती ने कहा, 'अगर सरकार हमारे उन सुझावों को नए बिल में शामिल करती है, तो हम इस पर विचार करेंगे। हम बिल के हर एक पहलू, उसके फायदे और नुकसान का लाइन दर लाइन गहराई से अध्ययन करेंगे।' उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी पूरा ड्राफ्ट देखने के बाद ही अपने कदम तय करेगी।
यह भी पढ़ें: संसद में घमासान के आसार: कांग्रेस ने पार्टी सांसदों को जारी किया व्हिप, क्या है 10 से 12 अगस्त का प्लान?
क्या हैं परिसीमन बिल से जुड़े पांच सबसे बड़ी बातें?
- संसद के पटल पर आधिकारिक रूप से ड्राफ्ट आने के बाद ही डीएमके अंतिम फैसला लेगी।
- पार्टी विधेयक के प्रत्येक प्रावधान और बिंदु का बारीकी से अध्ययन करेगी।
- डीएमके देखेगी कि उनके द्वारा दिए गए पुराने सुझावों को बिल में जगह मिली है या नहीं।
- अप्रैल 2026 के विधायी पैकेज में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है।
- सरकार के अनुसार तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 होंगी और सदन में हिस्सेदारी 7.2% बनी रहेगी।
क्या दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व घटेगा?
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के नेताओं में एक बड़ा डर बना हुआ है। उन्हें लगता है कि आबादी के आधार पर परिसीमन होने से दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज किया है। सरकार का दावा है कि इस नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
अप्रैल 2026 में सामने आए विधायी प्रस्तावों के मुताबिक, लोकसभा में कुल सीटों की संख्या लगभग 50 फीसदी बढ़ाने की योजना है। इससे कुल सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी, इसमें केंद्र शासित प्रदेशों की भी 35 सीटें शामिल होंगी। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी में तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी। इस तरह विस्तारित संसद में भी तमिलनाडु का हिस्सा 7.2 फीसदी पर सुरक्षित रहेगा।