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Drought Crisis In India: तपती जलवायु, घटती वर्षा और भूजल दोहन ने बढ़ाई चुनौती; भारत में बढ़ रहा सूखे का संकट

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: Devesh Tripathi Updated Mon, 23 Mar 2026 06:25 AM IST
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सार

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी रिपोर्ट के अनुसार जल संकट अब केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। विशेषज्ञ कावेह मदानी के मुताबिक जल संसाधनों की कमी भविष्य में देशों और समाजों के बीच संघर्ष को बढ़ा सकती है।

Drought Crisis In India Warming climate decreasing rainfall and groundwater exploitation pose challenges
भारत में सूखे का संकट - फोटो : PTI
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विस्तार

भारत में सूखे का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे गंभीर असर गंगा के मैदानी क्षेत्र (आईजीपी) और पूर्वोत्तर भारत में देखा जा रहा है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कमजोर मानसून, बढ़ते तापमान और भूजल के अत्यधिक दोहन ने देश में जल संकट को एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है।
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जर्नल क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार भारत के छह प्रमुख क्षेत्रों पश्चिमी, केंद्रीय, हिमालयी, आईजीपी, प्रायद्वीपीय और उत्तर-पूर्वी भारत में सूखे और हाइड्रो-क्लाइमेटिक अस्थिरता में स्पष्ट वृद्धि दर्ज की गई है। एसपीईआई, एसएलए और एनसीएस जैसे सूखा मापने के संकेतकों से पता चलता है कि देश में शुष्कता तेजी से बढ़ रही है और जलवायु के नए असामान्य पैटर्न बन रहे हैं। आईजीपी (-0.47) और उत्तर-पूर्व (-0.41) में एसपीईआई मान सबसे अधिक गिरावट दर्शाते हैं, जो गंभीर सूखे का संकेत हैं। हिमालय (-0.21) और मध्य भारत (-0.07) अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं।
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विशेषज्ञों के अनुसार दिन और रात दोनों समय तापमान में वृद्धि और वर्षा में कमी से इन क्षेत्रों में नमी तेजी से घट रही है। सितंबर 2025 में पीएनएएस अर्थ, एटमॉस्फेरिक एंड प्लेनेटरी साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 1991–2020 के बीच गंगा नदी बेसिन ने पिछले 1,300 वर्षों का सबसे तीव्र सूखा झेला।

राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा
यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी रिपोर्ट के अनुसार जल संकट अब केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। विशेषज्ञ कावेह मदानी के मुताबिक जल संसाधनों की कमी भविष्य में देशों और समाजों के बीच संघर्ष को बढ़ा सकती है।

कृषि क्षेत्र में बदलाव सबसे जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार भारत में 85 प्रतिशत से अधिक जल उपयोग कृषि में होता है, इसलिए समाधान भी यहीं केंद्रित होना चाहिए। ड्रिप सिंचाई, सौर पंप, कम पानी वाली फसलें और मिट्टी में नमी संरक्षण जैसी तकनीकों को तेजी से अपनाना होगा। साथ ही भूजल दोहन रोकने के लिए नीतिगत सुधार जरूरी हैं।

इस्राइल और कैलिफोर्निया से सीख
इस्राइल ने डीसैलिनेशन, जल पुनर्चक्रण और आर्थिक विविधता के जरिये सूखे के प्रभाव को कम किया है। वहीं अमेरिका का कैलिफोर्निया और ऑस्ट्रेलिया मजबूत जल ढांचे और विविध अर्थव्यवस्था के कारण बड़े सूखों के बावजूद आर्थिक रूप से स्थिर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जल संकट का समाधान केवल तकनीक से नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय ज्ञान, संस्थागत सुधार और आर्थिक विविधता का संयोजन जरूरी है।

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