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देश पर मंडरा रहा खतरा!: भारत में कभी भी तबाही मचा सकती हैं 2500 ग्लेशियर झीलें, 27 राज्यों पर बाढ़ का साया
सार
देश के 36 में से 27 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण और 2500 से ज्यादा संवेदनशील ग्लेशियल झीलें हैं।
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देश में 25 सौ से अधिक ग्लेशियल झीलें संवेदनशील।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश के 36 राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में से 27 प्रदेश, आपदा के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील या जोखिम वाली स्थिति में हैं। हिमनदी झील के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) की स्थिति में जोखिम का आकलन करने की तकनीक तो विकसित कर ली गई है, लेकिन इससे बचाव अभी तक एक चुनौती बना हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ मैदानी क्षेत्रों पर अतिक्रमण हो चुका है। नदी तल में अनियमित गतिविधियां जारी हैं। नदी बेसिन-स्तरीय योजना का अभाव है। ऐसे में अगर जीएलओएफ जैसा कुछ होता है तो उस दौरान जानमाल के बचाव का अचूक और सुरक्षित समाधान नजर नहीं आ रहा। देश में 25 सौ से अधिक ग्लेशियल झीलें संवेदनशील स्थिति में हैं तो वहीं हिमालय की 400 से अधिक ग्लेशियर झीलें तेजी से पिंघल रही हैं।
तिब्बत से सटे नेपाल के रसुवा जिले की भोटेकोशी नदी में अचानक आई तेज बाढ़ से जानमाल की भारी क्षति हुई है। नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली भोटेकोशी नदी को हिमालयी नदी कहा जाता है। नेपाल की इस भयानक त्रासदी के पीछे हिमनदी झील का फटना बताया जा रहा है।
देश के अनेक भागों में बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या इसलिए गंभीर हो जाती है, क्योंकि बाढ़ मैदानी क्षेत्रों पर अतिक्रमण हो चुका है। नदी तल में अनियमित गतिविधियां जारी हैं। नदी बेसिन-स्तरीय योजना का अभाव है। इसके चलते जब बाढ़ आती है तो भारी नुकसान होता है। अगर उक्त उपायों पर गंभीरता से काम हो तो जन-धन एवं संपत्ति की हानि को टाला जा सकता है। आपदा प्रबंधन पर डॉ. राधा मोहनदास अग्रवाल की अध्यक्षता वाली गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 261 वीं रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
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यह भी पढ़ें: नेपाल में मंडरा रहा नया संकट?: तबाही के बीच एक और झील टूटने का खतरा; चीन ने दी चेतावनी, कहा- अगले 72 घंटे अहम
आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल पर काम हो
समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा कि नदी तल एवं बाढ़-मैदानी क्षेत्रों में अतिक्रमण की निगरानी एवं उन्हें हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा विकसित किया जाए। ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अतिक्रमण किया गया है, उन्हें मानचित्र पर अंकित किया जाए। इससे संबंधित एजेंसी या विभाग की जिम्मेदारी सुनिश्चित हो सकेगी और भविष्य में होने वाली अतिक्रमण एवं अन्य उल्लंघनों को रोकने में भी मदद मिलेगी। उन क्षेत्रों में सख्ताई के साथ अतिक्रमण को हटाया जाए, ताकि जल का प्राकृतिक प्रवाह दोबारा से स्थापित हो सके। इससे बाढ़ का जोखिम कम होगा। शहरों में जल निकासी मास्टर प्लान तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल पर गंभीरता से काम हो। नगर स्तरीय बाढ़ प्रबंधन योजना तैयार की जाएं।
गूगल अर्थ इंजन आधारित तकनीक से निगरानी
केंद्रीय जल आयोग ने सुदूर संवेदन तकनीक के माध्यम से हिमनदीय झीलों की निगरानी के क्षेत्र में अपनी आंतरिक क्षमता विकसित की है। गूगल अर्थ इंजन आधारित एक ऐसा मंच विकसित किया गया है, जो उपग्रह चित्रों का स्वचालित विश्लेषण कर हिमनदीय झीलों एवं अन्य जल निकायों के क्षेत्रफल का मापन करता है। जल आयोग, गूगल अर्थ प्लेटफार्म का उपयोग कर हिमनदीय झीलों के जल प्रवाह मार्गों को भी मैप पर दिखाता है। यह हिमनदीय झील के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) की स्थिति में जोखिम के आकलन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। ऐसे मानचित्रों को राज्यों, संघ क्षेत्रों, संस्थानों तथा सार्वजनिक उपक्रमों आदि के साथ साझा किया जाता है।
एआई की मदद से बाढ़ का पूर्वानुमान
केंद्रीय जल आयोग, हर माह निगरानी रिपोर्ट तैयार करता है। इसके जरिए संबंधित राज्यों को हिमनदीय झीलों की निगरानी संबंधी सलाह दी जाती है। भारतीय हिमालय में स्थित हिमनदीय झीलों के जोखिम आकलन के लिए मानदंड निर्धारित किए गए हैं। ऐसी झीलें जो सर्वाधिक संवेदनशील हैं, उनकी पहचान कर उन्हें जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया जा रहा है।
यह भी पढ़ें: नेपाल त्रासदी: सैलाब में बहते सपने, मलबे में दबी जिंदगी की उम्मीद, झकझोर देंगी तबाही की ये भयावह तस्वीरें
देश में आपदा का जोखिम
देश के भूभाग का लगभग 58.6 प्रतिशत हिस्सा, मध्यम से लेकर अत्याधिक तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। भू क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात 40 मिलियन हैक्टेयर से ज्यादा, बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित होने योग्य है। 7516 किलोमीटर लंबी तटरेखा में से लगभग 5700 किमी तटरेखा, चक्रवात और सुनामी के मुहाने पर है। कृषि योग्य क्षेत्र का लगभग 68 प्रतिशत भाग, सूखे के प्रति संवेदनशील है। पहाड़ी क्षेत्र भूस्खलन और हिमस्खलन के जोखिम में हैं। इसमें से लगभग 15 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन के खतरे में आता है। 5161 शहरी नगर निकाय, बाढ़ के प्रति संवेदनशील हैं।
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तिब्बत से सटे नेपाल के रसुवा जिले की भोटेकोशी नदी में अचानक आई तेज बाढ़ से जानमाल की भारी क्षति हुई है। नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली भोटेकोशी नदी को हिमालयी नदी कहा जाता है। नेपाल की इस भयानक त्रासदी के पीछे हिमनदी झील का फटना बताया जा रहा है।
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देश के अनेक भागों में बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या इसलिए गंभीर हो जाती है, क्योंकि बाढ़ मैदानी क्षेत्रों पर अतिक्रमण हो चुका है। नदी तल में अनियमित गतिविधियां जारी हैं। नदी बेसिन-स्तरीय योजना का अभाव है। इसके चलते जब बाढ़ आती है तो भारी नुकसान होता है। अगर उक्त उपायों पर गंभीरता से काम हो तो जन-धन एवं संपत्ति की हानि को टाला जा सकता है। आपदा प्रबंधन पर डॉ. राधा मोहनदास अग्रवाल की अध्यक्षता वाली गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 261 वीं रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
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आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल पर काम हो
समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा कि नदी तल एवं बाढ़-मैदानी क्षेत्रों में अतिक्रमण की निगरानी एवं उन्हें हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा विकसित किया जाए। ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अतिक्रमण किया गया है, उन्हें मानचित्र पर अंकित किया जाए। इससे संबंधित एजेंसी या विभाग की जिम्मेदारी सुनिश्चित हो सकेगी और भविष्य में होने वाली अतिक्रमण एवं अन्य उल्लंघनों को रोकने में भी मदद मिलेगी। उन क्षेत्रों में सख्ताई के साथ अतिक्रमण को हटाया जाए, ताकि जल का प्राकृतिक प्रवाह दोबारा से स्थापित हो सके। इससे बाढ़ का जोखिम कम होगा। शहरों में जल निकासी मास्टर प्लान तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल पर गंभीरता से काम हो। नगर स्तरीय बाढ़ प्रबंधन योजना तैयार की जाएं।
गूगल अर्थ इंजन आधारित तकनीक से निगरानी
केंद्रीय जल आयोग ने सुदूर संवेदन तकनीक के माध्यम से हिमनदीय झीलों की निगरानी के क्षेत्र में अपनी आंतरिक क्षमता विकसित की है। गूगल अर्थ इंजन आधारित एक ऐसा मंच विकसित किया गया है, जो उपग्रह चित्रों का स्वचालित विश्लेषण कर हिमनदीय झीलों एवं अन्य जल निकायों के क्षेत्रफल का मापन करता है। जल आयोग, गूगल अर्थ प्लेटफार्म का उपयोग कर हिमनदीय झीलों के जल प्रवाह मार्गों को भी मैप पर दिखाता है। यह हिमनदीय झील के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) की स्थिति में जोखिम के आकलन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। ऐसे मानचित्रों को राज्यों, संघ क्षेत्रों, संस्थानों तथा सार्वजनिक उपक्रमों आदि के साथ साझा किया जाता है।
एआई की मदद से बाढ़ का पूर्वानुमान
केंद्रीय जल आयोग, हर माह निगरानी रिपोर्ट तैयार करता है। इसके जरिए संबंधित राज्यों को हिमनदीय झीलों की निगरानी संबंधी सलाह दी जाती है। भारतीय हिमालय में स्थित हिमनदीय झीलों के जोखिम आकलन के लिए मानदंड निर्धारित किए गए हैं। ऐसी झीलें जो सर्वाधिक संवेदनशील हैं, उनकी पहचान कर उन्हें जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया जा रहा है।
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देश में आपदा का जोखिम
देश के भूभाग का लगभग 58.6 प्रतिशत हिस्सा, मध्यम से लेकर अत्याधिक तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। भू क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात 40 मिलियन हैक्टेयर से ज्यादा, बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित होने योग्य है। 7516 किलोमीटर लंबी तटरेखा में से लगभग 5700 किमी तटरेखा, चक्रवात और सुनामी के मुहाने पर है। कृषि योग्य क्षेत्र का लगभग 68 प्रतिशत भाग, सूखे के प्रति संवेदनशील है। पहाड़ी क्षेत्र भूस्खलन और हिमस्खलन के जोखिम में हैं। इसमें से लगभग 15 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन के खतरे में आता है। 5161 शहरी नगर निकाय, बाढ़ के प्रति संवेदनशील हैं।