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'फिल्म बनाना जोखिम भरा कारोबार': सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, धोखधड़ी मामले में निर्माता को मिली बड़ी राहत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Himanshu Singh Chandel Updated Thu, 19 Mar 2026 06:06 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिल्म बनाना जोखिम भरा कारोबार है और हर निवेश में लाभ की गारंटी नहीं होती। अदालत ने एक निर्माता पर दर्ज धोखाधड़ी का केस रद्द करते हुए कहा कि केवल पैसा वापस न कर पाने से आपराधिक इरादा साबित नहीं होता। कोर्ट ने इसे सिविल विवाद मानते हुए आपराधिक कार्रवाई को गलत बताया।

Filmmaking is risky business Supreme Court significant observation grants major relief producer fraud case
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म उद्योग से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि फिल्म बनाना एक जोखिम भरा कारोबार है और हर फिल्म के सफल होने की गारंटी नहीं होती। इसी के साथ कोर्ट ने एक फिल्म निर्माता के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी के आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में धोखाधड़ी साबित करने के लिए शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत होना जरूरी है। केवल यह कहना कि बाद में पैसा वापस नहीं किया गया, अपने आप में आपराधिक इरादा साबित नहीं करता। कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह टिप्पणी की।
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क्या था पूरा मामला?
मामला फिल्म निर्माता वी गणेशन से जुड़ा है, जिन्होंने फिल्म बनाने के लिए एक व्यक्ति से पैसे लिए थे। समझौते के अनुसार, निवेशक को मुनाफे में हिस्सा देने की बात कही गई थी। बाद में और पैसा लिया गया और कुल निवेश पर हिस्सेदारी तय की गई।

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कैसे बढ़ा विवाद?
फिल्म बनने और रिलीज होने के बाद भी निवेशक को पैसा नहीं मिला। निर्माता ने दो पोस्टडेटेड चेक दिए, लेकिन खाते में पर्याप्त रकम न होने के कारण वे बाउंस हो गए। इसके बाद निवेशक ने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि फिल्म बनाना स्वभाव से जोखिम भरा होता है और निवेश करने वाला व्यक्ति लाभ या नुकसान दोनों के लिए तैयार रहता है। अगर फिल्म नहीं चलती है, तो निवेशक को नुकसान हो सकता है और इसे आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता।

क्या है अदालत का अंतिम निष्कर्ष?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धोखाधड़ी का कोई ठोस सबूत नहीं है। फिल्म बनाई गई और रिलीज भी हुई, इसलिए यह मामला आपराधिक नहीं बल्कि सिविल प्रकृति का है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आपराधिक कार्रवाई की बजाय सिविल उपाय अपनाने चाहिए।

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