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दिल की डायरी से लैला खान- फिरोज खान

Sun, 29 Apr 2018 12:42 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 29 Apr 2018 12:42 PM IST
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from the diary of heart from laila khan to feroz khan

पिता को बेटियों से अधिक प्यार होता है। ये बात सबके लिए सच हो या ना हो, लेकिन मेरे लिए सच साबित हुई। मेरे पिता एक मशहूर अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे। दुनिया उन्हें फिरोज खान के नाम से जानती थी। दौलत, शोहरत और रुतबा होने के बाद भी वह बहुत ही सुलझे हुए और सरल व्यक्ति थे। स्टारडम के नशे में चूर न होने वाले और अपने परिवार से बेहद प्यार करने वाले शख्स थे। वह कभी आगे बढ़ने की रेस में शामिल नहीं हुए। पापा को लैला नाम बहुत पसंद था, इसलिए जब मैं पैदा हुई, तो मेरा नाम उन्होंने प्यार से लैला रख दिया। वह जितना प्यार भाई को करते थे, उतना ही मुझे भी। उन्होंने हम दोनों में कभी कोई भेदभाव नहीं किया।

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मेरी उम्र 12 साल की थी, एक दिन पापा फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद जब घर में घुसे, तो उन्होंने मुझे बताया कि बेबी मैंने आपके नाम से एक गाना तैयार किया है। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई और गाने को सुनकर उतना ही। वह गीत है फिल्म ‘कुर्बानी’ का “लैला मैं लैला”। यह गीत आज भी बहुत लोकप्रिय है। यह गीत मेरे दिल के बहुत करीब है। पापा की ओर से यह मेरे लिए सबसे अच्छा तोहफा भी है। मैं जब भी इस गाने को सुनती हूं, तो मुझे बहुत गर्व होता है कि ये गाना मेरे पापा ने मेरे नाम को ध्यान में रखकर तैयार किया था। मैं बचपन में इस गाने पर खूब थिरकती थी। अपने जीवन में जितना इस गाने पर डांस किया, उतना डांस किसी और गाने पर नहीं किया। और पापा हमेशा मुझे इस गाने पर थिरकते देख खुश होते थे।
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जब मैं बड़ी हो रही थी, तब अक्सर आए दिन घर में पार्टियां देखा करती थी। फिल्मी दुनिया से जुड़े लोग इकट्ठा होते थे। चारों ओर फिल्मी माहौल रहता था। फिल्मों की बातें होती थी। ऐसे में मेरा फिल्मों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था, लेकिन मुझे यह अहसास हुआ कि पापा नहीं चाहते थे कि मैं फिल्मों में काम करूं। इसलिए मैंने फिल्मों में काम करने का इरादा छोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि कभी उन्होंने मुझपर कोई दबाव डाला हो। उन्होंने कभी किसी भी चीज को लेकर मुझे टोका नहीं। अगर मैं चाहती कि मुझे फिल्मों में काम करना है, तो पापा मुझे कभी नहीं रोकते। वह शायद मेरे सामने हथियार डाल देते, लेकिन मुझे अहसास था उनकी भावनाओं का। मुझे उनकी भावनाओं की कद्र थी, इसलिए उनकी भावनाओं का ख्याल रखा।

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from the diary of heart from laila khan to feroz khan

इस बीच मुझमें पेंटिंग करने का शौक जागा। मुझे मेरी मां ने पेंटिंग बनाने के लिए लगातार प्रेरित किया। मुझे भी लगता था कि पेंटिंग में मैं अपना करियर बना सकती हूं और पापा का सिर गर्व से ऊंचा कर सकती हूं। पापा को जब मैंने बताया कि मैं पेंटिंग को ही करियर बनाना चाहती हूं, तो वे बहुत खुश हुए। उन्होंने मुझे सख्ती से किसी चीज के लिए नहीं रोका। मेरी जरूरतों को पूरा किया और हर फैसले में मेरे साथ खड़े रहे। मेरी मां और पापा के बीच जब अलगाव हो गया था, तब भी दोनों ने मुझे यह महसूस ही नहीं होने दिया कि मेरे लिए उन दोनों के मन में प्यार या संरक्षण का भाव कम हुआ है। उनके बीच की दूरियों ने भी हमारे प्रति उनके उत्तरदायित्व को कभी कम नहीं होने दिया। 

उन्होंने कभी धर्म को भी खुद पर हावी होने नहीं दिया। जब भाई ने एक हिंदू लड़की से शादी की, तब भी उन्हें कोई गुरेज नहीं था। और जब मैंने पापा को बताया कि मुझे टेनिस खिलाड़ी रोहित राजपाल से शादी करनी है, तब भी उन्होंने मुझे रोका नहीं। बावजूद इसके कि रोहित हिंदु थे, पापा ने कोई एतराज नहीं जताया। उन्होंने मेरी पसंद को प्राथमिकता दी और बहुत धूमधाम से मेरी शादी की। उनके लिए किसी भी धर्म से बढ़कर अपना परिवार और उनकी खुशी मायने रखती थी। शुरू से ही पापा मेरे आदर्श रहे हैं। वे सिर्फ फिल्मी पर्दे पर ही बेहद स्टाइलिश नजर नहीं आते थे, बल्कि निजी जीवन में भी बहुत ठाठ से रहने वाले शख्स थे। उनका जीवन जीने का अपना अंदाज था। उनकी मामूली चीजों में भी स्टाइल होता था।
 
वे बहुत जिंदादिल इंसान थे। जब पापा मुंबई आए थे, तब उनके पिता की मौत हो चुकी थी। पापा ने पूरे परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने अपने सभी भाइयों को मुंबई बुलाया और स्थापित किया। उनके सारे भाई उनकी बहुत इज्जत करते थे। परिवार के अलावा भी पापा ने बहुत लोगों की मदद की। फिल्म इंडस्ट्री को कई नए चेहरे दिए। लोगों को कई मौके दिए। वे बहुत दयालु इंसान थे। हालांकि, मुझे इस बात का अफसोस जरूर होता है कि पापा ने फिल्म इंडस्ट्री को जो दिया उसकी चर्चा कभी नहीं होती है। हिंदी फिल्मों में पहली बार कार रेसिंग, विदेशों में नई लोकेशन्स पर शूटिंग के अलावा भी और कई तरह के प्रयोग करने वाले फिरोज खान को महज स्टाइलिश हीरो के रूप में ही याद किया जाता है। आज पापा तो नहीं हैं, लेकिन अपनी फिल्मों के जरिए वे अपने प्रशंसकों और मुझे हमेशा याद रहते हैं। मुझे गर्व है कि मैं फिरोज खान की बेटी हूं। 
इकबाल रिजवी से बातचीत पर आधारित

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