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बंगाल की शिक्षा व्यवस्था: 500+ स्कूलों में शिक्षक नहीं, फंड का कम इस्तेमाल, CAG रिपोर्ट क्या-क्या खुलासे हुए?
Mon, 03 Aug 2026 03:41 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, कोलकाता।
पीटीआई, कोलकाता।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 03 Aug 2026 03:41 PM IST
सार
बंगाल की शिक्षा व्यवस्था पर सीएजी की रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े किए हैं। आखिर क्यों 500 से ज्यादा स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और समग्र शिक्षा योजना के फंड का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया? रिपोर्ट में स्कूल छोड़ने की दर और शिक्षकों की कमी को लेकर बड़े खुलासे हुए हैं।
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बंगाल में स्कूल छोड़ने की दर क्यों बढ़ी?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में समग्र शिक्षा योजना के क्रियान्वयन पर ज्यादा स्कूल छोड़ने की दर, शिक्षकों की कमी और केंद्र से मिले फंड के कम इस्तेमाल का असर पड़ा है। नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
सीएजी की यह प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट साल 2019-20 से 2023-24 के बीच पश्चिम बंगाल में समग्र शिक्षा योजना के क्रियान्वयन की जांच पर आधारित है। रिपोर्ट में उच्च प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचने वाले छात्रों की संख्या में 28 से 42 फीसदी तक की कमी का जिक्र किया गया है।
ड्रॉपआउट की वजह पता लगाने के लिए ऑडिट टीम ने छह जिलों के 21 हाई स्कूलों में सर्वे किया। इस दौरान स्कूल छोड़ चुके 581 बच्चों से जानकारी जुटाई गई। रिपोर्ट में कहा गया, सर्वे से पता चला कि छात्रों के स्कूल छोड़ने की मुख्य वजह आर्थिक परेशानियां, कम उम्र में शादी और जल्दी कमाई शुरू करने की इच्छा थी।
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रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी और आर्थिक तंगी छात्रों के स्कूल छोड़ने की सबसे बड़ी वजह रही। सर्वे में शामिल 53 फीसदी अभिभावकों ने कहा कि आर्थिक परेशानी के कारण उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल से हटा लिया।
वहीं, 14 फीसदी अभिभावकों ने बताया कि छात्र आगे पढ़ाई जारी रखने के इच्छुक नहीं थे। 13 फीसदी ने काम के लिए पलायन को वजह बताया, जबकि 12 फीसदी ने पढ़ाई छोड़ने के पीछे कम उम्र में शादी को जिम्मेदार ठहराया।
500 से ज्यादा स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं
रिपोर्ट में पाया गया कि 500 से ज्यादा स्कूल ऐसे थे, जहां एक भी शिक्षक नहीं था। रिपोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती और छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) से जुड़ी गंभीर खामियों को भी उजागर किया।
रिपोर्ट में कहा गया, राज्य के 8 फीसदी स्कूल (5,152 स्कूल) केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे थे। इससे 1,76,491 छात्र प्रभावित हो रहे थे। वहीं, 520 स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं था, जिससे 8,596 छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई।
ऑडिट में शिक्षकों की तैनाती को लेकर भी असंतुलन सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, 150 से कम छात्रों वाले स्कूलों में 40,530 प्रधान शिक्षकों की तैनाती की गई थी, जो शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तय नियमों के खिलाफ है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्कूलों के 29 फीसदी और उच्च प्राथमिक स्कूलों के 30 फीसदी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के तय मानक पूरे नहीं हो पाए। इसकी मुख्य वजह प्राथमिक स्तर पर 31,684 और उच्च प्राथमिक स्तर पर 2,058 शिक्षकों की कमी रही।
रिपोर्ट में कहा गया कि प्राथमिक स्कूलों में 29 फीसदी और उच्च प्राथमिक स्कूलों में 30 फीसदी स्कूल न्यूनतम छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के मानकों को पूरा नहीं कर पाए। इसकी वजह प्राथमिक स्तर पर 31,684 और उच्च प्राथमिक स्तर पर 2,058 शिक्षकों की कमी रही। उच्च माध्यमिक स्तर पर 79 फीसदी स्कूलों में तय सीमा से ज्यादा छात्र-शिक्षक अनुपात पाया गया।
फंड का कम इस्तेमाल किया?
राज्य सरकार ने क्या कहा?
ऑडिट रिपोर्ट पर जवाब देते हुए राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग ने अगस्त 2025 में कहा कि वरिष्ठ स्तर पर छात्रों की संख्या में कमी इसलिए आती है क्योंकि कुछ छात्र माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद कमाई शुरू कर देते हैं, जबकि कुछ माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद पलायन कर जाते हैं।
राज्य सरकार के जवाब को स्वीकार करते हुए सीएजी ने कहा कि माध्यमिक शिक्षा के बाद छात्रों के स्कूल छोड़ने और आगे की पढ़ाई में जाने की प्रक्रिया में काफी कमी देखी गई।
सीएजी ने सिफारिश की कि शिक्षा विभाग को सामुदायिक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, काउंसलिंग सत्र आयोजित करने चाहिए और समय-समय पर सर्वे कर स्कूल से बाहर बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा औपचारिक शिक्षा से जोड़ना चाहिए।
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सीएजी की यह प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट साल 2019-20 से 2023-24 के बीच पश्चिम बंगाल में समग्र शिक्षा योजना के क्रियान्वयन की जांच पर आधारित है। रिपोर्ट में उच्च प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचने वाले छात्रों की संख्या में 28 से 42 फीसदी तक की कमी का जिक्र किया गया है।
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ड्रॉपआउट की वजह पता लगाने के लिए ऑडिट टीम ने छह जिलों के 21 हाई स्कूलों में सर्वे किया। इस दौरान स्कूल छोड़ चुके 581 बच्चों से जानकारी जुटाई गई। रिपोर्ट में कहा गया, सर्वे से पता चला कि छात्रों के स्कूल छोड़ने की मुख्य वजह आर्थिक परेशानियां, कम उम्र में शादी और जल्दी कमाई शुरू करने की इच्छा थी।
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रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी और आर्थिक तंगी छात्रों के स्कूल छोड़ने की सबसे बड़ी वजह रही। सर्वे में शामिल 53 फीसदी अभिभावकों ने कहा कि आर्थिक परेशानी के कारण उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल से हटा लिया।
वहीं, 14 फीसदी अभिभावकों ने बताया कि छात्र आगे पढ़ाई जारी रखने के इच्छुक नहीं थे। 13 फीसदी ने काम के लिए पलायन को वजह बताया, जबकि 12 फीसदी ने पढ़ाई छोड़ने के पीछे कम उम्र में शादी को जिम्मेदार ठहराया।
500 से ज्यादा स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं
रिपोर्ट में पाया गया कि 500 से ज्यादा स्कूल ऐसे थे, जहां एक भी शिक्षक नहीं था। रिपोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती और छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) से जुड़ी गंभीर खामियों को भी उजागर किया।
रिपोर्ट में कहा गया, राज्य के 8 फीसदी स्कूल (5,152 स्कूल) केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे थे। इससे 1,76,491 छात्र प्रभावित हो रहे थे। वहीं, 520 स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं था, जिससे 8,596 छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई।
ऑडिट में शिक्षकों की तैनाती को लेकर भी असंतुलन सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, 150 से कम छात्रों वाले स्कूलों में 40,530 प्रधान शिक्षकों की तैनाती की गई थी, जो शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तय नियमों के खिलाफ है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्कूलों के 29 फीसदी और उच्च प्राथमिक स्कूलों के 30 फीसदी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के तय मानक पूरे नहीं हो पाए। इसकी मुख्य वजह प्राथमिक स्तर पर 31,684 और उच्च प्राथमिक स्तर पर 2,058 शिक्षकों की कमी रही।
रिपोर्ट में कहा गया कि प्राथमिक स्कूलों में 29 फीसदी और उच्च प्राथमिक स्कूलों में 30 फीसदी स्कूल न्यूनतम छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) के मानकों को पूरा नहीं कर पाए। इसकी वजह प्राथमिक स्तर पर 31,684 और उच्च प्राथमिक स्तर पर 2,058 शिक्षकों की कमी रही। उच्च माध्यमिक स्तर पर 79 फीसदी स्कूलों में तय सीमा से ज्यादा छात्र-शिक्षक अनुपात पाया गया।
फंड का कम इस्तेमाल किया?
- सरकारी फंड के प्रबंधन की जांच करते हुए सीएजी ने कहा कि पांच साल की अवधि में राज्य में योजना के लिए मिले फंड का इस्तेमाल केवल 46 से 65 फीसदी के बीच रहा।
- ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया, केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से फंड जारी करने में देरी और तय योजनाओं को लागू करने में देरी से वित्तीय अनुशासन कमजोर हुआ। इससे योजना के उद्देश्यों को हासिल करने पर असर पड़ा।
- रिपोर्ट के अनुसार, स्वीकृत निर्माण कार्य पूरे नहीं होने के कारण राज्य को स्कूलों के बुनियादी ढांचे के लिए मिले 395 करोड़ रुपये वापस करने पड़े।
- इसके अलावा, काम में देरी और क्रियान्वयन में कमी के कारण केंद्र से मिलने वाले 2,428 करोड़ रुपये की राशि भी कम मिली, जिससे योजना का दायरा प्रभावित हुआ।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
ऑडिट रिपोर्ट पर जवाब देते हुए राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग ने अगस्त 2025 में कहा कि वरिष्ठ स्तर पर छात्रों की संख्या में कमी इसलिए आती है क्योंकि कुछ छात्र माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद कमाई शुरू कर देते हैं, जबकि कुछ माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद पलायन कर जाते हैं।
राज्य सरकार के जवाब को स्वीकार करते हुए सीएजी ने कहा कि माध्यमिक शिक्षा के बाद छात्रों के स्कूल छोड़ने और आगे की पढ़ाई में जाने की प्रक्रिया में काफी कमी देखी गई।
सीएजी ने सिफारिश की कि शिक्षा विभाग को सामुदायिक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, काउंसलिंग सत्र आयोजित करने चाहिए और समय-समय पर सर्वे कर स्कूल से बाहर बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा औपचारिक शिक्षा से जोड़ना चाहिए।