Explainer: एक मक्खी ले सकती है 15 साल से कम उम्र के बच्चों की जान, कैसे फैलता है चांदीपुरा वायरस, लक्षण क्या?
चांदीपुरा वायरस भारत में नया नहीं है। पिछले दो दशकों में इसके कई प्रकोप सामने आ चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित हुए। इसकी सबसे बड़ी चिंता संक्रमण का तेजी से गंभीर होना और कम उम्र के बच्चों में जानलेवा साबित होना है। मानसून में इसका खतरा क्यों बढ़ता है, बीमारी की पहचान कैसे होती है और इससे बचने के क्या उपाय हैं, जानिए इस एक्सप्लेनर में।
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विस्तार
राजस्थान और गुजरात में चांदीपुरा वायरस ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। बच्चों में तेजी से गंभीर रूप लेने वाला यह संक्रमण सैंड फ्लाई के जरिए फैल सकता है और कुछ मामलों में महज दो-तीन दिनों में जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में सवाल है कि आखिर चांदीपुरा वायरस क्या है? बच्चों को इससे ज्यादा खतरा क्यों है? और मानसून में इसके मामले बढ़ने की आशंका क्यों रहती है? जानिए इससे जुड़े अहम सवालों के जवाब...
क्या है ताजा मामला?
राजस्थान में 2026 में चांदीपुरा वायरस संक्रमण का पहला मामला डूंगरपुर जिले में सामने आया। रतनपुरा गांव की बच्ची को 12 जुलाई को तेज बुखार और दूसरे गंभीर लक्षणों के बाद गुजरात के हिम्मतनगर सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 15 जुलाई को उसके नमूने जांच के लिए भेजे गए, लेकिन उसी दिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इसके बाद परिजन शव लेकर गांव लौट आए।
उस समय स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को मामले की जानकारी नहीं मिल पाई थी। बाद में हिम्मतनगर अस्पताल ने जांच से जुड़ी जानकारी गुजरात स्वास्थ्य विभाग को भेजी। मरीज के डूंगरपुर निवासी होने के कारण गुजरात सरकार ने राजस्थान स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना दी।
18 जुलाई को जानकारी मिलने के बाद डूंगरपुर स्वास्थ्य विभाग ने रतनपुरा गांव में विशेष सर्वे और स्वास्थ्य जांच अभियान शुरू किया। स्वास्थ्य विभाग ने घर-घर जाकर लोगों की स्क्रीनिंग की। इस दौरान किसी दूसरे व्यक्ति में चांदीपुरा वायरस जैसे लक्षण नहीं मिले। एहतियात के तौर पर गांव में लगातार निगरानी रखी जा रही है।
चांदीपुरा वायरस क्या है?
चांदीपुरा वायरस यानी सीएचपीवी, रैब्डोविरिडे फैमिली का वायरस है। यह एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस का कारण बन सकता है। इसके मामले भारत के पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में पहले भी सामने आते रहे हैं। खास तौर पर मानसून के दौरान इसके मामले और प्रकोप देखे गए हैं।
एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का एक समूह है, जिसमें मस्तिष्क प्रभावित होता है। इसमें मरीज को अचानक तेज बुखार के साथ दौरे पड़ना, भ्रम होना, बेहोशी या मानसिक स्थिति में बदलाव जैसे लक्षण हो सकते हैं। AES के पीछे वायरस, बैक्टीरिया और दूसरे संक्रमण समेत कई कारण हो सकते हैं।
चांदीपुरा वायरस फैलता कैसे है?
चांदीपुरा वायरस को फैलाने में सैंड फ्लाई की प्रमुख भूमिका मानी जाती है। इसके अलावा मच्छर और कीट भी इसके वाहक हो सकते हैं। गुजरात में फ्लेबोटोमस पापाटासी नाम की सैंड फ्लाई को चांदीपुरा वायरस का वाहक बताया गया है।
डूंगरपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अलंकार गुप्ता के मुताबिक, सैंड फ्लाई अक्सर पशुओं के आसपास पाई जाती है। आदिवासी क्षेत्रों में पशुशालाएं कई बार घरों से सटी होती हैं। इससे लोगों के इनके संपर्क में आने और संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ सकती है। अभी तक चांदीपुरा वायरस के इंसान से इंसान में फैलने का कोई मामला सामने नहीं आया है।
गुजरात में 12 बच्चों की मौत
जानकारी के मुताबिक, गुजरात में पिछले करीब डेढ़ महीने के दौरान 12 बच्चों की मौत हुई है। इनमें तीन बच्चों में चांदीपुरा वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई है, जबकि अन्य नौ मामलों में भी इसी वायरस की आशंका जताई गई है।
चांदीपुरा वायरस के लक्षण क्या हैं?
चांदीपुरा वायरस से संक्रमित होने पर बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसके लक्षणों में अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी और दौरे शामिल हो सकते हैं। गंभीर स्थिति में मरीज बेहोश हो सकता है और कोमा में भी जा सकता है।डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, यह बीमारी मुख्य रूप से 15 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। बच्चों में संक्रमण गंभीर होने पर लक्षण शुरू होने के महज 48 से 72 घंटे के भीतर मौत भी हो सकती है।
कितना जानलेवा है चांदीपुरा वायरस?
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, भारत में पहले सामने आए प्रकोपों में सीएचपीवी संक्रमण की केस फैटेलिटी रेशियो 56 से 75 फीसदी तक दर्ज की गई है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर प्रकोप में इतने ही प्रतिशत मरीजों की मौत होगी, बल्कि पिछले प्रकोपों में इतनी ऊंची मृत्यु दर दर्ज की गई थी।
2003 में 329 बच्चे हुए थे बीमार, 183 की मौत
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के मुताबिक, 2003 में दक्षिण भारत में एक बड़ा प्रकोप सामने आया था। इसमें 329 बच्चों में एक्यूट एन्सेफलाइटिस विकसित हुआ और 183 बच्चों की मौत हो गई। उस समय मरीजों में अचानक तेज बुखार के साथ सिरदर्द, दौरे और उल्टी जैसे लक्षण सामने आए थे। कुछ मरीज बेहोश भी हो गए थे। लक्षणों को देखते हुए डॉक्टरों ने ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दी और नमूने जांच के लिए पुणे स्थित आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी यानी एनआईवी भेजे गए।
ICMR-NIV ने कैसे की थी वायरस की जांच?
ICMR-NIV ने मामलों की पहचान के लिए घर-घर जाकर सर्वे किया था। संभावित मरीजों में चांदीपुरा वायरस के साथ जापानी एन्सेफलाइटिस, डेंगू, चिकनगुनिया और वेस्ट नाइल वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी की जांच एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनोसॉर्बेंट परख (ELISA) के जरिए की गई।
इसके अलावा इंसानों के खून के नमूनों और सैंड फ्लाई में चांदीपुरा वायरस के आरएनए की जांच की गई। वायरस फैलाने वाले वाहकों की पहचान के लिए वेक्टर सर्वे भी किया गया। ICMR-NIV भारत में इस वायरस का पता लगाने और इसे आइसोलेट करने वाला पहला संस्थान बना।
ICMR-NIV ने देश में चांदीपुरा वायरस के सबसे बड़े प्रकोप की जांच का नेतृत्व भी किया। इसके साथ नए वायरस आइसोलेट्स का इस्तेमाल करके इनएक्टिवेटेड वैक्सीन विकसित करने का काम शुरू किया गया। इसे प्रकोप की निगरानी से लेकर वैक्सीन विकसित करने की दिशा में भारत की तैयारियों को मजबूत करने वाली पहल माना गया।
2024 में आया था 20 साल का सबसे बड़ा प्रकोप
- जून की शुरुआत से 15 अगस्त 2024 के बीच भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस के 245 मामले दर्ज किए थे। इनमें 82 मरीजों की मौत हुई थी और उस समय एईएस की केस फैटेलिटी रेशियो 33 फीसदी रही थी।
- इन 245 मामलों में से 64 मरीजों में चांदीपुरा वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई थी। इनमें 61 मामले गुजरात और तीन राजस्थान में मिले थे। डब्ल्यूएचओ ने 2024 के इस प्रकोप को पिछले 20 वर्षों में भारत में चांदीपुरा वायरस का सबसे बड़ा प्रकोप बताया था।
- उस दौरान देश के कुल 43 जिलों से एईएस के मामले सामने आए थे। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, पिछले प्रकोपों की तरह अलग-अलग जिलों में मामले बिखरे हुए थे। गुजरात में चांदीपुरा वायरस के प्रकोप में हर चार से पांच साल में बढ़ोतरी देखी गई है।
किस मौसम में बढ़ सकता है खतरा?
चांदीपुरा वायरस के मामले पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत में खास तौर पर मानसून के दौरान सामने आते रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, मानसून के दौरान वायरस फैलाने वाले कीटों की आबादी बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। खराब आवास और साफ-सफाई की खराब स्थिति भी जोखिम बढ़ा सकती है। कचरे का सही प्रबंधन न होना और खुली नालियां सैंड फ्लाई के पनपने और रहने के लिए अनुकूल जगह बना सकती हैं। इससे सैंड फ्लाई के इंसानों तक पहुंचने की संभावना भी बढ़ सकती है।
क्या भारत के बाहर भी मिला है चांदीपुरा वायरस?
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, चांदीपुरा वायरस की पुष्टि दूसरे देशों में नहीं हुई है। हालांकि, एक अध्ययन के अनुसार यह एशिया और अफ्रीका के कुछ दूसरे देशों में मौजूद हो सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में इसे फैलाने वाली सैंड फ्लाई बड़ी संख्या में पाई जाती हैं। इसके बावजूद भारत से दूसरे देशों की यात्रा करने वाले लोगों में इस वायरस का पता चलने का कोई प्रमाण नहीं है।
क्या चांदीपुरा वायरस का इलाज या वैक्सीन है?
फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई खास एंटीवायरल इलाज और कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। मरीज का इलाज उसके लक्षणों के आधार पर किया जाता है। हालांकि, समय पर अस्पताल पहुंचने और जरूरी सपोर्टिव केयर मिलने से मरीज के बचने की संभावना बेहतर हो सकती है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, प्राथमिक और जिला स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों में ऐसे मरीजों को शुरुआती सपोर्टिव केयर देने की व्यवस्था होना जरूरी है। इसके बाद जरूरत पड़ने पर मरीज को तय अस्पताल में रेफर किया जाना चाहिए। इसके लिए स्वास्थ्य कर्मचारियों को बीमारी के लक्षणों और मरीज को कहां और कब रेफर करना है, इसकी जानकारी होना भी जरूरी है।
किन बच्चों पर खास नजर रखने की जरूरत?
15 साल से कम उम्र के ऐसे बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत होती है, जिन्हें अचानक बुखार आने के साथ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र यानी सेंट्रल नर्वस सिस्टम से जुड़े लक्षण दिखाई दे रहे हों।
2024 में सरकार ने क्या कदम उठाए थे?
2024 के प्रकोप के दौरान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने गुजरात सरकार की मदद और बीमारी की विस्तृत जांच के लिए नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम तैनात की थी। सैंड फ्लाई जैसे वायरस फैलाने वाले वाहकों को नियंत्रित करने के लिए बड़े स्तर पर कीटनाशकों का छिड़काव और फ्यूमिगेशन किया गया। लोगों और मेडिकल स्टाफ को वायरस, इसके लक्षणों और बचाव के तरीकों की जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए।
चांदीपुरा वायरस से बचाव कैसे किया जा सकता है?
चांदीपुरा वायरस से बचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय सैंड फ्लाई, मच्छर और कीट को नियंत्रित करना और इनके काटने से बचना है। खराब आवास, कचरे का सही प्रबंधन न होना और खुली नालियां सैंड फ्लाई के पनपने और रहने की जगह बढ़ा सकती हैं। इसलिए आसपास साफ-सफाई और वेक्टर कंट्रोल जरूरी है। इसके अलावा लोगों को वायरस के संभावित खतरे, इससे बचने के तरीके, बीमारी के लक्षण और किस स्थिति में जांच व इलाज के लिए अस्पताल जाना चाहिए, इसकी जानकारी देना भी जरूरी है।