Explainer: एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर नियम की मांग कैसे सुप्रीम कोर्ट पहुंची, सरकार का इस पर क्या रुख?
क्रीमी लेयर का सिद्धांत फिलहाल ओबीसी आरक्षण में लागू है, जबकि एससी-एसटी आरक्षण में इसे लागू करने की मांग को लेकर विवाद चल रहा है। केंद्र का कहना है किएससी-एसटी और ओबीसी की सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए दोनों के लिए एक जैसा नियम नहीं अपनाया जा सकता।
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विस्तार
अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है। केंद्र ने कहा है कि एससी/एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं है। सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि एससी/एसटी के आरक्षण में आय के आधार पर बदलाव करने से पहले व्यापक समीक्षा, सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों और ठोस अध्ययन की जरूरत होगी।
ऐसे में सवाल उठता है कि ताजा मामला क्या है? एससी/एसटी में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग क्यों उठी? केंद्र सरकार ने इसका विरोध क्यों किया? आरक्षण नीति बनाने का अधिकार किसके पास है? क्रीमी लेयर है क्या? क्रीमी लेयर को लेकर क्या फैसला हो चुका है? भारत में आरक्षण को लेकर क्या व्यवस्था है? संविधान इस पर क्या कहता है?
ताजा मामला क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग की गई। केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध किया है। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि कहीं भी विशेष रूप से यह नहीं कहा गया है कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत एससी और एसटी पर लागू होता है। केंद्र के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में क्रीमी लेयर का जिक्र मुख्य रूप से ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग और एसईबीसी यानी सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के आरक्षण के संदर्भ में हुआ है। सरकार ने अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ मामले के संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत एससी और एसटी पर लागू नहीं है।
एससी/एसटी में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग क्यों उठी?
इस मामले में अलग-अलग जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं। रामाशंकर प्रजापति और अन्य की याचिका में मांग की गई है कि प्रत्येक आरक्षित वर्ग के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय की जाए, ताकि आरक्षण का लाभ आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों तक ज्यादा समान रूप से पहुंच सके। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस सभी आरक्षित वर्गों को शामिल किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया कि एससी और एसटी के भीतर संपन्न परिवार आरक्षण के लाभ पर लगातार कब्जा कर रहे हैं, जिससे इन समुदायों के सबसे हाशिए पर रहने वाले लोगों को शिक्षा और सरकारी रोजगार में आरक्षण का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है।
वहीं, अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका में खास तौर पर एससी और एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि अगर किसी एससी या एसटी परिवार का कोई सदस्य पहले ही संवैधानिक या वरिष्ठ सरकारी पद हासिल कर चुका है, तो उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
रामाशंकर प्रजापति और अन्य की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को नोटिस जारी किया था। इसके बाद अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर 12 जनवरी 2026 को केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया गया। अब केंद्र ने अपने हलफनामे के जरिए इन मांगों का विरोध किया है।
केंद्र सरकार ने इसका विरोध क्यों किया?
केंद्र सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि एससी-एसटी और ओबीसी एक जैसी श्रेणियां नहीं हैं। सरकार के मुताबिक एससी समुदाय को ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। एसटी की पहचान अलग संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ेपन से जुड़ी है। वहीं, ओबीसी की पहचान मुख्य रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर होती है।
सरकार का कहना है कि एससी-एसटी के लिए आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता और न्याय हासिल करना व ऐतिहासिक नुकसान को दूर करना है। इन समुदायों के साथ भेदभाव केवल उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं होता। इसी वजह से केंद्र का तर्क है कि ओबीसी में लागू क्रीमी लेयर के सिद्धांत को एससी-एसटी पर उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार ने कहा- सिर्फ आय के आधार पर फैसला नहीं हो सकता
केंद्र ने कहा है कि आरक्षण नीति में बदलाव, खासकर आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय करने से पहले व्यापक समीक्षा और गहन अनुभवजन्य अध्ययन होना चाहिए। इसके लिए आरक्षण का लाभ पाने वाले लोगों से जुड़ा सामाजिक-आर्थिक आंकड़ा भी जरूरी है।
आरक्षण नीति बनाने का अधिकार किसके पास है?
केंद्र ने इस मामले में यह भी कहा है कि अदालत सरकार को किसी खास तरीके से आरक्षण की नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती। सरकार का कहना है कि आरक्षण की नीति बनाना कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अगर आरक्षण में आय आधारित प्राथमिकता लागू करनी है तो इसके लिए व्यापक समीक्षा, अनुभवजन्य आंकड़े और कानूनी आधार जरूरी है।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत केवल इसलिए सरकार को किसी नीति को लागू करने का आदेश नहीं दे सकती क्योंकि कोई दूसरा विकल्प उसे बेहतर या ज्यादा निष्पक्ष लगता है। न्यायपालिका विधायिका की जगह लेकर सार्वजनिक नीति तय नहीं कर सकती।
केंद्र ने याचिकाओं को लेकर क्या कहा?
सरकार का कहना है कि इन याचिकाओं में संविधान के तहत दिए गए किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन की बात सामने नहीं आती। इसलिए केंद्र के अनुसार ये याचिकाएं अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई योग्य नहीं हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से इन याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है।
एससी/एसटी की सूची में बदलाव को लेकर सरकार ने क्या कहा?
केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का भी हवाला दिया है। इनके तहत एससी और एसटी की सूचियां तय की जाती हैं। सरकार के अनुसार इन सूचियों में किसी जाति या जनजाति को शामिल करने या बाहर करने का काम संसद कानून बनाकर कर सकती है। राज्य सरकार, अदालत, न्यायाधिकरण या कोई अन्य प्राधिकरण खुद से इन सूचियों को बदल नहीं सकता।
अब समझें- क्रीमी लेयर क्या है?
क्रीमी लेयर का सिद्धांत 1992 के मंडल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ा है। इसके तहत पिछड़े वर्गों के उन अपेक्षाकृत संपन्न लोगों को आरक्षण से बाहर रखने की व्यवस्था की गई, जिन्हें सामाजिक रूप से आगे बढ़ा हुआ माना गया। यानी एक ही आरक्षित वर्ग में अगर कुछ लोग काफी आगे बढ़ चुके हैं तो सवाल उठता है कि क्या उन्हें भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए। यहीं से ओबीसी में क्रीमी लेयर की व्यवस्था आती है।
ओबीसी में क्रीमी लेयर कैसे तय होती है?
ओबीसी के मामले में क्रीमी लेयर की व्यवस्था 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन से जुड़ी है। इसमें ओबीसी के भीतर सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके वर्गों की पहचान के लिए एक व्यवस्था बनाई गई थी। इसमें ऊंचे सरकारी पदों पर बैठे लोगों के बच्चों को आरक्षण से बाहर रखने का प्रावधान था। प्रथम श्रेणी यानी समूह-ए और कुछ द्वितीय श्रेणी यानी समूह-बी के पदों को सामाजिक उन्नति का संकेत माना गया। इस व्यवस्था में आय और संपत्ति की जांच को भी अतिरिक्त आधार बनाया गया था, खासकर उन मामलों में जहां पदों की सरकारी पदों से बराबरी तय नहीं की गई थी।
2004 में क्रीमी लेयर को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया गया?
14 अक्तूबर 2004 को सरकार ने एक स्पष्टीकरण जारी किया। यह उन मामलों के लिए था जहां माता-पिता ऐसी संस्थाओं में काम करते थे, जिनके पदों की सरकारी पदों से बराबरी तय नहीं की गई थी। इसमें कहा गया कि वेतन से होने वाली आय और दूसरी आय को अलग-अलग देखा जाए। अगर इनमें से किसी एक श्रेणी की आय लगातार तीन वर्षों तक तय सीमा से ज्यादा रहती है, तो बच्चे को क्रीमी लेयर में माना जा सकता है।
ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला क्या था?
13 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण से जुड़े एक मामले में कहा था कि क्रीमी लेयर सिर्फ माता-पिता की आय के आधार पर तय नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि माता-पिता की स्थिति और उनके पद की श्रेणी को भी ध्यान में रखना होगा। यह मामला केंद्र सरकार की उन अपीलों से जुड़ा था, जिनमें कुछ ओबीसी उम्मीदवारों को सिविल सेवा परीक्षा में राहत दी गई थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और उच्च न्यायालयों ने कहा था कि माता-पिता की वेतन आय तय सीमा से ज्यादा होने मात्र से ओबीसी उम्मीदवार को आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता।
ओबीसी की क्रीमी लेयर की आय सीमा कितनी है?
सरकार ने लोकसभा में बताया है कि ओबीसी की गैर-क्रीमी लेयर की सालाना आय सीमा को 2017 में छह लाख रुपये से बढ़ाकर आठ लाख रुपये किया गया था। यह आदेश कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने 13 सितंबर 2017 को जारी किया था। सरकार ने कहा है कि फिलहाल इस आय सीमा को और बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि क्रीमी लेयर केवल ओबीसी के लिए लागू है।
भारत में आरक्षण की व्यवस्था क्या है?
- लंबवत आरक्षण: सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए दिए जाने वाले आरक्षण को लंबवत आरक्षण कहा जाता है।
- क्षैतिज आरक्षण: यह लंबवत आरक्षण की श्रेणियों के आर-पार लागू होता है, जैसे दिव्यांग व्यक्तियों और पूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण।
- जाति/सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित आरक्षण: ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को शिक्षा और सरकारी रोजगार में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमुख हैं।
- महिलाओं के लिए आरक्षण: संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटें आरक्षित हैं।
- आर्थिक आधार पर आरक्षण: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के लिए दिया जाने वाला आरक्षण आर्थिक आधार पर आरक्षण का उदाहरण है।
- दिव्यांग लोगों के लिए आरक्षण: केंद्र सरकार की सीधी भर्ती में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले लोगों के लिए कम से कम चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
संविधान में आरक्षण के प्रमुख प्रावधान क्या है?
- अनुच्छेद 15(4): सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों व एससी/एसटी के लिए विशेष प्रावधान।
- अनुच्छेद 16(4): सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण।
- अनुच्छेद 16(4ए): एससी/एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण।
- अनुच्छेद 16(4बी): खाली रह गई आरक्षित सीटों को आगे भरने की व्यवस्था।
- अनुच्छेद 39ए: कमजोर वर्गों के लिए न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता।
- अनुच्छेद 243डी: पंचायती राज संस्थाओं में एससी/एसटी और महिलाओं के लिए आरक्षण।
- अनुच्छेद 330: संसद में एससी/एसटी के लिए आरक्षित सीटें।
- अनुच्छेद 332: राज्य विधानसभाओं में एससी/एसटी के लिए आरक्षित सीटें।
50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 के इंद्रा साहनी मामले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। सरकार के अनुसार एससी, एसटी और ओबीसी को इन्हीं प्रावधानों के तहत दिया जाने वाला आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। वहीं ईडब्लूएस का 10 प्रतिशत आरक्षण अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत अलग संवैधानिक आधार पर है। सरकार के अनुसार इसलिए यह 50 प्रतिशत की सीमा से अलग है और कानूनी रूप से सुरक्षित है।