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Vande Mataram: लाल किले पर पहली बार गूंजा वंदे मातरम; देश की 150 साल की विरासत का भव्य जश्न, जानिए इसका इतिहास
Sat, 15 Aug 2026 08:05 AM IST
नितिन गौतम
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 15 Aug 2026 08:05 AM IST
सार
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर पहली बार वंदे मातरम का गायन हुआ। वंदे मातरम के बाद राष्ट्रगान का गायन हुआ।
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लालकिले पर पहली बार गूंजा वंदे मातरम
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने के अवसर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। किले की प्राचीर पर फूलों की सजावट में बीच में राष्ट्रीय ध्वज और उसके दोनों ओर हिंदी में 'वंदे मातरम' लिखा हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभक्ति के जोश और कड़ी सुरक्षा के बीच लाल किले पर 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह का नेतृत्व किया। सेना के बैंड ने वंदे मातरम की धुन बजाई। इस दौरान मौजूद मेहमानों ने राष्ट्रीय गीत गाया।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद राष्ट्रगान गाया गया। ध्वजारोहण के बाद राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी गई। इसके बाद, भारतीय वायु सेना के दो Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने कार्यक्रम स्थल पर फूलों की बारिश की। एक हेलीकॉप्टर राष्ट्रीय ध्वज लेकर उड़ रहा था और दूसरे पर 'वंदे मातरम' लिखा हुआ ध्वज था।
वंदे मातरम का इतिहास
1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक प्रेरणादायक नारा बन गया था। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। सरकार ने पिछले साल नवंबर में 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले समारोह की शुरुआत की थी।
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सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वंदे मातरम पहली बार 1882 में लिखा गया था। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना।
'वंदे मातरम' का सरल अर्थ है- मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। यहां मां से आशय मातृभूमि से है।
वंदे मातरम के 150 साल के इतिहास का जश्न
वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।
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इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद राष्ट्रगान गाया गया। ध्वजारोहण के बाद राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी गई। इसके बाद, भारतीय वायु सेना के दो Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने कार्यक्रम स्थल पर फूलों की बारिश की। एक हेलीकॉप्टर राष्ट्रीय ध्वज लेकर उड़ रहा था और दूसरे पर 'वंदे मातरम' लिखा हुआ ध्वज था।
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वंदे मातरम का इतिहास
1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक प्रेरणादायक नारा बन गया था। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। सरकार ने पिछले साल नवंबर में 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले समारोह की शुरुआत की थी।
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सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वंदे मातरम पहली बार 1882 में लिखा गया था। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना।
'वंदे मातरम' का सरल अर्थ है- मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। यहां मां से आशय मातृभूमि से है।
वंदे मातरम के 150 साल के इतिहास का जश्न
वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।