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Hindi News ›   India News ›   India's First Hydrogen Train: Everything You Need to Know About Its Route, Fare, and Features

Explainer: देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन चलने की तारीख आई सामने; कहां से होगी शुरुआत, कितना होगा किराया?

Tue, 07 Jul 2026 03:13 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 07 Jul 2026 03:13 PM IST
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सार
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन 17 जुलाई से दौड़ने जा रही है। इसे स्वच्छ और भविष्य की रेल तकनीक की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन इस ट्रेन का रूट क्या होगा और कितना किराया लगेगा? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब।
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India's First Hydrogen Train: Everything You Need to Know About Its Route, Fare, and Features
हाइड्रोजन ट्रेन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत की पहली हाइड्रोजन ईंधन से चलने की तारीख सामने आ गई है। सरकार का दावा है कि इसके संचालन के दौरान लगभग शून्य प्रदूषण होगा। 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे हरी झंडी दिखाएंगे। जींद-सोनीपत रेलखंड पर चलने वाली इस ट्रेन के लिए जींद में विशेष हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सुविधा भी विकसित की गई है। 



हाइड्रोजन ट्रेन क्या होती है? यह ट्रेन कैसे काम करेगी? जीवाश्म ईंधन-बिजली के मुकाबले ट्रेनों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल कितना बेहतर है? ट्रेन का किराया और गति कितनी होगी? जींद-सोनीपत रूट को ही इसके संचालन के लिए क्यों चुना गया है? यह ट्रेन क्यों खास है? सुरक्षा के लिए इसमें क्या इंतजाम किए गए हैं? इस परियोजना पर कितना खर्च किया गया है? भारत के अलावा किन दशों में हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन होता है? आइए विस्तार से जानते हैं...

हाइड्रोजन ट्रेन
हाइड्रोजन ट्रेन - फोटो : अमर उजाला

किस तकनीक पर काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन? 

सीधे शब्दों में समझा जाए तो हाइड्रोजन ट्रेन उन ट्रेनों को कहा जाता है, जो कि संचालन के लिए बिजली या जीवाश्म ईंधन के बजाय हाइड्रोजन (H2) का इस्तेमाल करती हैं। इन ट्रेनों के इंजन को इस तरह बनाया जाता है कि इनमें ऊर्जा हाइड्रोजन के प्रयोग से पैदा की जाती है। 

जीवाश्म ईंधन-बिजली के मुकाबले ट्रेनों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल कितना बेहतर?

जीवाश्म ईंधन मुख्यतः कार्बन (C) आधारित होते हैं, इसलिए इनके प्रयोग से वातावरण में कार्बन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा होता है, जो कि वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की अधिकता और ग्लोबल वॉर्मिंग का मुख्य कारण है। इसे पर्यावरण के लिए घातक माना जाता है। इसलिए डीजल से चलने वाले इंजन सबसे बड़े प्रदूषकों में गिने जाते हैं। भारत में पहले ही इनका प्रयोग बहुत कम किया जा चुका है। 

भारत में मौजूदा समय में बिजली का इस्तेमाल करके चलने वाली ट्रेनें प्रदूषण कम करने के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं, लेकिन इनके प्रयोग में एक पेंच यह है कि जिस बिजली से यह ट्रेनें चलती हैं, उसे फिलहाल ऐसे पावर स्टेशनों से पैदा किया जाता है जो कि कोयले (एक और जीवाश्म ईंधन) के प्रयोग से चलते हैं। ऐसे में बिजली से चलने वाली ट्रेनें खुद भले ही प्रदूषण का सीधे तौर पर कारण नहीं होतीं, लेकिन इन्हें मिलने वाली बिजली को जीवाश्म ईंधन से ही पैदा किया जाता है, जो कि पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है।
इसके चलते हाइड्रोजन के जरिए संचालित होने वाली ट्रेनें पर्यावरण के लिए काफी बेहतर होती हैं। यह ट्रेनें न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह बंद कर देती हैं, बल्कि आम ईंधनों के मुकाबले ज्यादा स्वच्छ और ज्यादा ऊर्जा देने वाली साबित होती हैं। 

हाइड्रोजन रेल
हाइड्रोजन रेल - फोटो : एएनआई / पीआईबी / माईगॉव डॉट जीओवी

भारत की हाइड्रोजन ट्रेन में क्या है खास?

  • यह ट्रेन ब्रॉड गेज पर चलने वाली सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन होगी। 
  • इसमें कुल 10 कोच होंगे, जिनमें दो ड्राइविंग पावर कार और आठ यात्री कोच शामिल हैं। 
  • इसकी कुल शक्ति 2400 किलोवाट होगी, यानी प्रत्येक ड्राइविंग पावर कार 1200 किलोवाट की क्षमता वाली होगी।
  • जींद-सोनीपत रेलखंड पर चलने वाली इस ट्रेन के लिए जींद में विशेष हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सुविधा विकसित की गई है। 
  • यहीं पर कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित रखा जाएगा और ट्रेन में भरा जाएगा।
  • रिफ्यूलिंग के लिए हाइड्रोजन कंप्रेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसके साथ आवश्यक तकनीकी-सहायता और महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स भी उपलब्ध कराए गए हैं ताकि पूरी प्रणाली सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम कर सके। 
  • किसी तकनीकी खराबी की स्थिति में संचालन प्रभावित न हो, इसके लिए स्टैंडबाय कंप्रेसर यूनिट की भी व्यवस्था की जा रही है।

सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?

  • हाइड्रोजन गैस के सुरक्षित उपयोग के लिए रेलवे ने कई सुरक्षा उपाय किए हैं।
  • हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और रिफ्यूलिंग स्टेशन पर हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर और फ्लेम डिटेक्टर लगाए गए हैं। 
  • इन उपकरणों की नियमित जांच और सफाई की जाएगी ताकि धूल जमा न हो और वे लगातार सही तरीके से काम करते रहें।
  • पूरे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग सिस्टम की 24 घंटे निगरानी की जाएगी। 
  • शुरुआती चरण में ट्रेन के साथ तकनीकी विशेषज्ञ भी मौजूद रहेंगे ताकि किसी भी समस्या का तुरंत समाधान किया जा सके।
  •  इसके अलावा ट्रेन और हाइड्रोजन प्लांट के लिए संचालन व रखरखाव मैनुअल तैयार किए गए हैं, जिन्हें आरडीएसओ (RDSO) से मंजूरी मिल चुकी है। 
  • शकूरबस्ती स्थित रखरखाव केंद्र के लिए भी सुरक्षा प्रावधान, नियमित ऑडिट और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू की गई है।

हाइड्रोजन ट्रेन
हाइड्रोजन ट्रेन - फोटो : अमर उजाला

जींद-सोनीपत पर चलने वाली ट्रेन के बारे में जानें सबकुछ 

  • यह ट्रेन लगभग 90 किलोमीटर की दूरी तय करेगी।
  • इस रूट पर यात्रा का अनुमानित समय करीब एक घंटा होगा।
  • शुरुआती ट्रायल के दौरान ट्रेन की गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी।
  • भविष्य में इसकी अधिकतम गति 110 से 140 किलोमीटर प्रति घंटा तक प्रस्तावित है।
  • इस रूट पर कुल छह रेलवे स्टेशन होंगे।
  •  ट्रेन का न्यूनतम किराया 5 रुपये और अधिकतम किराया 25 रुपये प्रस्तावित है।
  • इस ट्रेन में करीब 2,500 यात्रियों के सफर कर सकते हैं। 

जींद-सोनीपत रूट को क्यों चुना गया?

  • इस रूट को पायलट प्रोजेक्ट इसलिए चुना गया है क्योंकि भारतीय रेलवे का ज्यादातर ब्रॉड गेज नेटवर्क पहले ही बिजली से जुड़ चुका है। 
  • अब रेलवे हाइड्रोजन तकनीक का परीक्षण उन इलाकों के लिए कर रहा है, जहां बिजली के ओवरहेड तार बिछाना मुश्किल या बहुत महंगा पड़ता है।
  • जींद में पहले से हाइड्रोजन प्लांट है, इसलिए ट्रेन को हाइड्रोजन ईंधन आसानी से मिल सकेगा।
  • यह रूट छोटा है और यहां ट्रेन की गति भी कम रहती है, इसलिए नई तकनीक का सुरक्षित परीक्षण करने के लिए यह उपयुक्त है।

भारतीय रेलवे।
भारतीय रेलवे। - फोटो : अमर उजाला

इस परियोजना पर कितना खर्च किया गया है?

  • रेल मंत्रालय ने वर्ष 2023-24 के बजट में 2,800 करोड़ रुपये हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना के विकास के लिए आवंटित किए थे। 
  • इस राशि का उपयोग अनुसंधान, डिजाइन, परीक्षण और आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करने में किया जा रहा है।
  • भारतीय रेलवे ने इसके अलावा मौजूदा डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (DEMU) रैक में हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाने की 111.83 करोड़ रुपये की पायलट परियोजना भी मंजूर की है।

रेलवे का कहना है कि फिलहाल हाइड्रोजन ट्रेनों की परिचालन लागत तय नहीं हुई है। शुरुआती चरण में इनका संचालन खर्च अधिक रहने का अनुमान है, लेकिन जैसे-जैसे ऐसी ट्रेनों की संख्या बढ़ेगी, लागत में कमी आने की उम्मीद है।

हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज परियोजना क्या है?

भारतीय रेलवे हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज परियोजना के तहत कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेनें शुरू करने की योजना पर काम कर रहा है। इन ट्रेनों को मुख्य रूप से हेरिटेज और पहाड़ी रेल मार्गों पर चलाने की योजना है ताकि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में प्रदूषण कम हो और टिकाऊ पर्यटन को बढ़ावा मिल सके।

इस योजना के तहत एक हाइड्रोजन ट्रेन की अनुमानित लागत लगभग 80 करोड़ रुपये है, जबकि प्रत्येक रूट पर आवश्यक हाइड्रोजन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की लागत लगभग 70 करोड़ रुपये आंकी गई है।

..और किन देशों में हो रहा हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन?

  • चीन: यहां हाइड्रोजन से चलने वाली कम्यूटर (शहरी) और पर्यटन के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जा रही हैं।
  • जापान: जापान ने त्सुरुमी लाइन सहित कई मार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनों का सफल परीक्षण किया है।
  • अमेरिका: दक्षिणी कैलिफोर्निया में 'एरो' नाम की हाइड्रोजन कम्यूटर ट्रेन संचालित की जा रही है।
  • फ्रांस और स्वीडन: दोनों देश भी हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक के विकास और पायलट परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।
  • ब्रिटेन: ब्रिटेन में हाइड्रोजन ट्रेनों का अलग से उत्पादन नहीं किया गया है, बल्कि यहां पहले से जीवाश्म ईंधन या बिजली पर चल रही ट्रेनों में ही हाइड्रोजन टैंक और फ्यूल सेल लगाए गए।
  • जर्मनी: दुनिया में सबसे पहले हाइड्रोजन ट्रेन जर्मनी में 2016 में उतारी गई थी। 2018 में इस ट्रेन का वाणिज्यिक स्तर पर संचालन शुरू किया गया। तबसे लेकर अब तक जर्मन कंपनी एलस्टोम कोरैडिया आईलिंट अलग-अलग मार्गों पर इन ट्रेनों को चला रहा है।
  • स्विट्जरलैंड: 2022 में पहली बार हाइड्रोजन ट्रेन के मॉडल को पेश किया गया था। अगले एक साल में स्विट्जरलैंड की अधिकतर ट्रेनों में हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया।
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