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जयराम बानन: 13 साल की आयु में घर छोड़ा, 18 रुपये के लिए धोए बर्तन; आज कंपनी का टर्नओवर करोड़ों रुपये
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 07 Oct 2025 12:58 AM IST
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सार
जयराम बानन के पास व्यवसाय का बुनियादी ज्ञान नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने कई रेस्टोरेंट में काम करके अनुभव हासिल किया। आज करोड़ों रुपये की कंपनी खड़ी करके वह लोगों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं, जो मुश्किलों के डर से ख्वाब देखने की हिम्मत नहीं करते।
जयराम बानन
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
दबीर-उल-मुल्क और नज्म-उद-दौला के खिताब से नवाजे गए, उर्दू के महान शायर, सबसे लोकप्रिय व प्रभावशाली कवि और लेखक मिर्जा गालिब की एक मशहूर पंक्ति है- मंजिल मिल ही जाएगी भटकते ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं...। किसे पता था, तेरह साल की उम्र में घर छोड़कर भागने वाला यह लड़का एक दिन करोड़ों रुपये की कंपनी खड़ी कर देगा, लेकिन उनको यह सफलता इतनी आसानी से नहीं मिली। एक वक्त ऐसा भी था जब उनके पास खाने और रहने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन इन विषम परिस्थितियों के बावजूद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी मेहनत और लगन के बदौलत लगभग 300 करोड़ का वार्षिक कारोबार करने वाली कंपनी खड़ी कर दी। साथ ही उनके देश व विदेश में कई आउटलेट्स भी हैं। आज जयराम का नाम उत्तर का डोसा किंग नाम से भी काफी मशहूर है। जयराम की यह प्रेरणादायक कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है, जो जीवन में कठिनाई और रुकावटों के डर से कुछ बड़ा करने का साहस नहीं कर पाते हैं। जयराम की यह कहानी बताती है कि यदि आपके हौसले बुलंद हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती है।
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प्रारंभिक जीवन
लोकप्रिय रेस्टोरेंट चेन के मालिक जयराम बानन का जन्म मंगलौर कर्नाटक के पास उडुपी में हुआ था। वह एक बहुत ही अनुशासित परिवार में पले-बढ़े हंै। जयराम बानन के पिता काफी गुस्सैल स्वभाव के थे। वह घर चलाने के लिए एक ड्राइवर के रूप में काम करते थे। इसके अतिरिक्त, जहां बच्चों का जीवन अच्छी यादों से भरा होता है, वहीं जयराम का प्रारंभिक जीवन बचपन में मिली असफलताओं के लिए दंड और संघर्षों से भरा था।
लोकप्रिय रेस्टोरेंट चेन के मालिक जयराम बानन का जन्म मंगलौर कर्नाटक के पास उडुपी में हुआ था। वह एक बहुत ही अनुशासित परिवार में पले-बढ़े हंै। जयराम बानन के पिता काफी गुस्सैल स्वभाव के थे। वह घर चलाने के लिए एक ड्राइवर के रूप में काम करते थे। इसके अतिरिक्त, जहां बच्चों का जीवन अच्छी यादों से भरा होता है, वहीं जयराम का प्रारंभिक जीवन बचपन में मिली असफलताओं के लिए दंड और संघर्षों से भरा था।
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13 साल की उम्र में घर से भागे
जयराम बानन के पिता चाहते थे कि बेटा अच्छे से पढ़-लिखकर जीवन में कुछ बड़ा काम करे, लेकिन जयराम का पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता था, जिस वजह से वह अक्सर स्कूल में फेल हो जाया करते थे। पिता स्वभाव से काफी गुस्सैल थे। वह जयराम बानन का बार-बार स्कूल में फेल हो जाना बर्दास्त नहीं कर पाते थे, जिस वजह से वह उन्हें खूब डांटते व मारते-पीटते थे। एक बार तो उनके पिता ने गुस्से में उनकी आंखों में मिर्च पाउडर डाल दिया था। इसके बावजूद जयराम एक बार फिर 13 साल की उम्र में फेल हो गए, लेकिन अब जयराम अपने पिता की डांट और पिटाई से बचना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इस बार घर छोड़ने का फैसला लिया। इसके लिए उन्होंने अपने पिता के बटुए से कुछ पैसे निकाले और मंगलौर से मुंबई के लिए रवाना हो गए। जयराम के लिए यह समय बहुत ज्यादा कठिन था।
जयराम बानन के पिता चाहते थे कि बेटा अच्छे से पढ़-लिखकर जीवन में कुछ बड़ा काम करे, लेकिन जयराम का पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता था, जिस वजह से वह अक्सर स्कूल में फेल हो जाया करते थे। पिता स्वभाव से काफी गुस्सैल थे। वह जयराम बानन का बार-बार स्कूल में फेल हो जाना बर्दास्त नहीं कर पाते थे, जिस वजह से वह उन्हें खूब डांटते व मारते-पीटते थे। एक बार तो उनके पिता ने गुस्से में उनकी आंखों में मिर्च पाउडर डाल दिया था। इसके बावजूद जयराम एक बार फिर 13 साल की उम्र में फेल हो गए, लेकिन अब जयराम अपने पिता की डांट और पिटाई से बचना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इस बार घर छोड़ने का फैसला लिया। इसके लिए उन्होंने अपने पिता के बटुए से कुछ पैसे निकाले और मंगलौर से मुंबई के लिए रवाना हो गए। जयराम के लिए यह समय बहुत ज्यादा कठिन था।
जूठे बर्तन भी धोए
मुंबई आने के बाद उन्होंने यहां एक कैंटीन में काम किया। उन्हें काम का ज्यादा अनुभव नहीं था। इसलिए उन्होंने वहां बर्तन धोने का काम किया। उन्हें बतौर मेहनताना 18 रुपये की तनख्वाह मिलती थी। इतनी कम तनख्वाह में गुजर-बसर करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दिन-रात कड़ी मेहनत की। यहां उन्होंने छह साल तक काम किया, जिस दौरान उन्हें पहले वेटर और फिर मैनेजर के रूप में पदोन्नत कर उनकी तनख्वाह में 200 रुपये की वृद्धि की गई।
मुंबई आने के बाद उन्होंने यहां एक कैंटीन में काम किया। उन्हें काम का ज्यादा अनुभव नहीं था। इसलिए उन्होंने वहां बर्तन धोने का काम किया। उन्हें बतौर मेहनताना 18 रुपये की तनख्वाह मिलती थी। इतनी कम तनख्वाह में गुजर-बसर करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दिन-रात कड़ी मेहनत की। यहां उन्होंने छह साल तक काम किया, जिस दौरान उन्हें पहले वेटर और फिर मैनेजर के रूप में पदोन्नत कर उनकी तनख्वाह में 200 रुपये की वृद्धि की गई।
कुछ बड़ा करने की ख्वाहिश
वह उद्यमिता की दुनिया में कदम रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने दिल्ली में अपना व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया, लेकिन उससे पहले उन्होंने गाजियाबाद की एक कैंटीन में टेंडर लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी बचत और दोस्तों से कुछ पैसे उधार लेकर साउथ दिल्ली में 'सागर' नाम से अपने पहले रेस्टोरेंट की शुरुआत की। उनकी साउथ-इंडियन डिश लोगों को खूब पसंद आने लगी, जिसके बाद उन्होंने लोधी मार्केट में एक और रेस्टोरेंट की शुरुआत की और नाम में 'रत्न' जोड़ा। इस तरह उनका यह व्यवसाय 'सागर रत्न' ब्रांड के रूप में अपनी एक लोकप्रिय पहचान बना चुका है।
वह उद्यमिता की दुनिया में कदम रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने दिल्ली में अपना व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया, लेकिन उससे पहले उन्होंने गाजियाबाद की एक कैंटीन में टेंडर लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी बचत और दोस्तों से कुछ पैसे उधार लेकर साउथ दिल्ली में 'सागर' नाम से अपने पहले रेस्टोरेंट की शुरुआत की। उनकी साउथ-इंडियन डिश लोगों को खूब पसंद आने लगी, जिसके बाद उन्होंने लोधी मार्केट में एक और रेस्टोरेंट की शुरुआत की और नाम में 'रत्न' जोड़ा। इस तरह उनका यह व्यवसाय 'सागर रत्न' ब्रांड के रूप में अपनी एक लोकप्रिय पहचान बना चुका है।
युवाओं को सीख
- चुनौतियां जीवन का महज एक हिस्सा हैं, इसे स्वीकार करें, वे आपको और मजबूत बनाएंगी।
- सकारात्मक सोच से आप जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं।
- यदि आप में मेहनत करने का जुनून है, तो आप हर सपने को पूरा कर सकते हैं।
- आत्मनिर्भर बनें, यह आपके जीवन को सशक्त बनाएगा।
- जीवन का हर पल बहुमूल्य है, इसलिए इसका उपयोग अच्छे से करें।