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Justice Yashwant Verma: बंगले में अधजले नोट मिलने से इस्तीफा देने तक, ऐसे खाक हुई जस्टिस वर्मा की प्रतिष्ठा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Asmita Tripathi Updated Fri, 10 Apr 2026 02:32 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित घर से जले नोट मिलने के बाद सुर्खियों में आए थे। इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक पहुंचा।  

Justice Yashwant Verma resigns, know what was the case against him?
जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दिया। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट में तैनात जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया है। दरअसल, उनके दिल्ली वाले घर में पिछले साल मार्च में भारी मात्रा में जले हुए नोट मिले थे। इस मामले में उनके खिलाफ आंतरिक जांच चल रही थी। इसके साथ ही महाभियोग की भी चर्चा थी। इसी बीच उन्होंने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया है। जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर में जले हुए कैश मिलने के बाद उनका स्थानांतरण इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया गया था। इसके साथ उनको न्यायिक कार्य से फिलहाल अलग किया गया था। उनके खिलाफ महाभियोग लाने के मामले में कमेटी का गठन किया गया है। इस मामले में कई सांसदों ने संसद में जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए नोटिस दिया था। 

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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जस्टिस वर्मा कौन हैं? उनके खिलाफ केस क्या है? इस मामले में जांच पैनल ने किस तरह जांच की? इनके जवाब में जांच करने वाले जजों ने क्या कहा था? जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसदीय समिति के सामने क्या जवाब दिया? आइये जानते हैं...

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57 साल के जस्टिस यशवंत वर्मा को अक्तूबर 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा ने 8 अगस्त 1992 को वकील के रूप में नामांकन कराया था। 13 अक्तूबर 2014 को उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 1 फरवरी 2016 को जस्टिस वर्मा स्थायी न्यायाधीश बने। 11 अक्तूबर 2021 को जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे। इसके बाद उन्हें वापस इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्होंने 5 अप्रैल, 2025 को शपथ ली।

 


 

23 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले के पास कूड़े के ढेर में 500-500 के जले नोट मिले। इस मामले में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही इस पर कुछ कहेंगे। वहीं, 24 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा से अगले आदेश तक के लिए न्यायिक जिम्मेदारियां ले ली गईं। 

जजों के पैनल की जो रिपोर्ट सामने आई, उसमें क्या तथ्य हैं?

जस्टिस वर्मा से जुड़े कैशकांड की जांच के लिए तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने 22 मार्च 2025 को पैनल गठित किया। पैनल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधवालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जज अनु शिवरमण शामिल थीं। इस पैनल ने जांच के जरिए कई सवालों के जवाब सामने रखे। अमर उजाला ने इसी रिपोर्ट के आधार पर सवाल-जवाब के जरिए पाठकों को पूरे केस की जांच समझाने की कोशिश की है।

सवाल-1: जांच कितने दिन चली, कितने गवाहों से पूछताछ हुई?

जजों के पैनल ने 10 दिन जांच की। 55 गवाहों से पूछताछ की गई। जस्टिस वर्मा के घर पर जिस जगह आग लगी थी, पैनल के सदस्यों ने उस जगह का भी दौरा किया। सबूतों और गवाहों के बयान को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करते हुए जस्टिस वर्मा को भेजा गया।  

सवाल-2: जज के घर जले हुए नोट मिलने के आरोप पर जांच रिपोर्ट में क्या?

जजों के पैनल ने मामले से जुड़े जिन लोगों- पुलिसकर्मी, दमकलकर्मी, जस्टिस वर्मा के घर पर तैनात स्टाफ, गार्ड, आदि लोगों से पूछताछ की, उनमें से कम से कम 10 गवाहों ने कहा कि उन्होंने कई जले हुए और अधजले नोट देखे। एक गवाह ने तो यहां तक कहा था कि…
 

सवाल-3: क्या स्टोर रूम जज के घर के परिसर में ही था?

पैनल ने कहा कि यह तथ्य पहले से स्थापित है कि स्टोर रूम में आने-जाने का सक्रिय नियंत्रण जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों के पास था और इस स्टोर रूम पर पूरी निगरानी भी रखी गई थी। इसमें कोई भी बाहरी बिना इजाजत के नहीं जा सकता था। इसलिए मामले में यह आपत्ति ही निरर्थक है कि स्टोर रूम घर के मुख्य परिसर से कुछ दूरी पर था।

 

सवाल-4: जस्टिस वर्मा ने स्टोर रूम में कैश की मौजूदगी पर क्या कहा?

जजों के पैनल ने कहा कि जांच के बाद स्टोर रूम में जले हुए नोट मिलने का तथ्य स्थापित हो चुका था। इस स्टोर रूम में बताया गया कैश/पैसा कहां से आया इसके बारे में सही स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी जस्टिस वर्मा की थी। लेकिन वे न सिर्फ इसमें नाकाम रहे, बल्कि वे आरोपों से सीधा इनकार करते रहे और मामले में साजिश की बात कहते रहे।

 

सवाल-5: स्टोर रूम में कैश होने के सबूत मिले तो यह गया कहां?

रिपोर्ट में पैनल ने कहा…


 

पैनल ने कहा, "न्यायमूर्ति वर्मा या उनके परिवार के किसी सदस्य या किसी अन्य गवाह की ओर से कोई भी विश्वसनीय स्पष्टीकरण न आने की स्थिति में, यह समिति किसी और निष्कर्ष पर पहुंचने में असमर्थ है। समिति यह मानने को विवश है कि जस्टिस वर्मा पर जो भरोसा रखा गया था, उसे उन्होंने खुद तोड़ा, क्योंकि उनके स्टोर रूम में भारी मात्रा में संदिग्ध नकदी का ढेर पाया गया। यह बात अधिक मायने नहीं रखती कि यह नकदी उनके या उनके परिवार के सदस्यों की मौन या स्पष्ट सहमति से रखी गई थी या नहीं, क्योंकि यह पूरे मामले में उस बड़ी अवधारणा का उल्लंघन है, जिसमें एक उच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से सार्वजनिक विश्वास और संपत्ति की रक्षा की अपेक्षा की जाती है।" 

 

सवाल-6: जस्टिस वर्मा के बचाव न पेश करने पर रिपोर्ट में क्या?

रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के अपना बचाव पेश न करने के साथ इस मामले को साजिश बताए जाने के पक्ष को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया था कि जस्टिस वर्मा या उनके घर के किसी व्यक्ति ने इस मामले को कहीं भी रिपोर्ट करने की कोशिश नहीं की और न ही सीसीटीवी कैमरों में कैद दृश्यों को तुरंत सुरक्षित करने और उन्हें अपने बचाव में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। तब भी नहीं, जब 17 मार्च 2025 को उन्हें बताया गया कि उनके घर से जले हुए कैश की तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं। इसलिए उनकी तरफ से किए जा रहे दावे (साजिश के) पूरी तरह अविश्वसनीय हैं।

 

सवाल-7: स्टोर रूम के सभी के लिए खुले होने के दावों पर क्या सामने आया?

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाकर्मियों के बयान इसके उलट हैं, इसलिए स्टोर रूम के सभी के लिए खुले होने के दावे को नहीं स्वीकारा जा सकता। सुरक्षाकर्मियों ने पूछताछ के दौरान बताया कि अनुशासन हमेशा बनाकर रखा जाता था और उनमें से कोई भी बिना परिवार की इजाजत के घर में भी नहीं घुस सकता था। इसे लेकर ड्यूटी पर तैनात रहे दो सीआरपीएफ जवानों ने बताया कि जब आग लगी तब स्टोर रूम का दरवाजा लॉक था और उन्होंने दरवाजा तोड़ने में मदद की थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे यह साबित होता है कि दरवाजा हर वक्त लॉक कर के सुरक्षित रखा जाता था। खासकर तब जब जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी छुट्टियों पर बाहर गए थे।

 

जांच पैनल ने कहा कि जस्टिस वर्मा के आवास में मौजूद स्टोर रूम पर लगातार सीसीटीवी कैमरों से नजर रखी जाती थी। ऐसे में ये भी संभव नहीं है कि वहां कोई और नकदी रख सके, लेकिन जस्टिस वर्मा ने बताया कि सीसीटीवी के हार्ड डिस्क में डाटा नहीं मिला। जस्टिस वर्मा ने कहा कि कैमरे काम नहीं कर रहे थे तो इसमें उनकी गलती नहीं है। हालांकि, जांच समिति ने उनके इस तर्क पर संदेह जाहिर किया था। 

 

सवाल-8: जस्टिस वर्मा के निजी स्टाफ ने इन आरोपों पर क्या कहा?

जस्टिस वर्मा के निजी स्टाफ के कुछ लोगों ने कहा कि स्टोर रूम आदतन लॉक नहीं रखा जाता था। लेकिन उनमें से कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं गया था। कई और ने यह कहा कि उन्होंने स्टोर रूम का दरवाजा हमेशा ताले से बंद देखा। 

 



 

सवाल-9: क्या जज के घर से इकट्ठा किए गए साक्ष्यों की पुष्टि हुई?

पैनल ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत जैसे- वीडियो रिकॉर्डिंग और फोटोग्राफ भी चश्मदीदों के बयानों की पुष्टि कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की सत्यता की पुष्टि चंडीगढ़ स्थित फोरेंसिक लैब से भी हुई है। जस्टिस वर्मा के घर पर नोट जलने का जो एक कथित वीडियो वायरल हुआ और जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में डाला, उसमें एक व्यक्ति जले हुए नोटों को देखकर कहता है-  महात्मा गांधी में आग लग रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह आवाज दिल्ली दमकल विभाग के स्टेशन अफसर मनोज मेहलावत की थी, जो कि केस में गवाह नंबर-6 हैं। मेहलावत ने खुद इन नोटों को लेकर ऐसी टिप्पणी की पुष्टि की है। 

सवाल-10: जांच समिति की रिपोर्ट के अंत में क्या प्रस्ताव?

64 पेज की इस रिपोर्ट के अंत में कहा गया था कि जांच में ये साबित हुआ है कि दुराचरण हुआ है, जो उन्हें पद से हटाने की मांग के लिए काफी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'जब सरकार किसी सरकारी अधिकारी को आवास आवंटित करती है तो यह उसमें रहने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह आवासीय परिसर को उन चीजों से मुक्त रखे, जो आम लोगों की नजरों में संदेह पैदा करती हैं।'

 

इसके बाद जस्टिस वर्मा से जुड़े मामले पर संसदीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में जस्टिस वर्मा ने समिति के सामने अपना विस्तृत जवाब दाखिल किया। अपने जवाब में उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम में किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ तौर पर इनकार किया है। मामले की जांच कर रही संसदीय समिति के समक्ष प्रस्तुत अपने जवाब में उन्होंने यह सवाल भी उठाया है कि इस मामले को लेकर उन पर महाभियोग क्यों चलाया जाना चाहिए। 


उनके अनुसार इस मामले में तो उनके आवास पर मौजूद पुलिस, अग्निशमन और सुरक्षा बल के अधिकारियों और कर्मियों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जिन्होंने मानक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। सूत्रों के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने दावा किया था कि उनके आवासीय परिसर से कोई नकदी बरामद नहीं हुई। उन्होंने यह तर्क दिया कि अधिकारियों की ओर से घटनास्थल की सुरक्षा और जांच में हुई चूक का आरोप उन पर अनुचित तरीके से लगाया जा रहा है, जबकि संसदीय जांच और न्यायिक कार्यवाही जारी है। 

 

उन्होंने यह भी कहा कि आग लगने के समय वह आवास पर मौजूद नहीं थे। इस कथित घटना में उनकी कोई भूमिका नहीं है। वह घटनास्थल पर सबसे पहुंचने वाले व्यक्ति भी नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग घटना स्थल पर पहुंचे थे वे उसे ठीक से सुरक्षित करने में विफल रहे।

संसद में इस मामले में क्या हुआ?   

21 जुलाई 2025 को रविशंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित 146 लोकसभा सदस्यों की ओर से न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने का प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को मिला। लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के लिए बहुदलीय नोटिस स्वीकार करने के बाद उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इससे इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस जांच समिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वी. आचार्य शामिल किए गए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 25 फरवरी को तीन सदस्यीय जांच समिति का पुनर्गठन किया। इसमें   मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव की जगह बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रशेखर को शामिल किया गया। इस समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।



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