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देखना ये है कि आखिर कब मिलते हैं वायुसेना को 110 फाइटर प्लेन
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Updated Sat, 07 Apr 2018 06:08 PM IST
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Rafale Fighter Jets
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भारत के सामने पाकिस्तान और चीन से लगातार भले ही चुनौती बढ़ रही हो, लेकिन आधारभूत संसाधनों की कमी झेल रही देश की अनुशासित सेना राजनीतिक कलाबाजियों के आगे कभी मुंह नहीं खोलती। वायुसेना का फाइटरजेट सौदा इसी का उदाहरण है। वायुसेना ने एक बार फिर चौथी पीढ़ी के बहुउद्देश्यीय 110 लड़ाकू विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियों से प्रस्ताव (आरएफआई, रिक्वेस्ट फॉर इंफार्मेशन) मांगा है। इसके पहले वायुसेना ने 2007 में चौथी पीढ़ी के 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू वमानों के लिए आरएफआई जारी की थी। दिलचस्प यह भी है कि वायुसेना का यह प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय द्वारा दो साल पहले लाए गए प्रस्ताव को रद्द करने के बाद लाया गया है। रक्षा मंत्रालय के इस प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय निर्माता कंपनी के सहयोग से देश में 114 एकल इंजन वाले लड़ाकू विमानों को तैयार करने की योजना थी। ऐसे में अब देखना होगा कि कब वायुसेना को इन नए लड़ाकू विमानों की कोई खेप मिल पाती है।
F-16 fighter aircraft in India
फ्लिप फ्लॉप पॉलिसी
वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद में नीतिगत झोल जमकर दिखाई दे रहा है। यूपीए सरकार जहां परीक्षण का दौर पूरा करने के बाद सौदे को अंतिम रूप देने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाई, वहीं 2014 में केन्द्र में सत्ता बदलने के बाद आई नई सरकार ने पुरानी निविदा को रद्द कर दिया। 126 लड़ाकू विमानों के रक्षा सौदे में जहां वायुसेना ने दो इंजन वाले लड़ाकू विमानों की जरूरत पर जोर दिया था, वहीं दो साल पहले रक्षा मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी के सहयोग से एकल इंजन वाले 114 फाइटर जेट के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके लिए अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन का एफ-16 और ब्रिटेन की ग्रिपेन जैसी दो ही कंपनियां दौड़ में थी। कुछ महीने पहले रक्षा मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया और वायुसेना की पुरानी जरूरत को आधार बनाते हुए अब एकल और दो इंजन वाले लड़ाकू विमानों के सौदे के लिए प्रस्ताव मंगाने की मंजूरी दे दी है। इस बारे में वायुसेना के अफसर मुंह नहीं खोलना चाहते। हालांकि मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार सामरिक चुनौती, भावी जरूरत और रणनीतिक साझेदारी के हिसाब से 110 लड़ाकू विमानों की आरएफआई जारी होना ही उपयुक्त कदम है। इससे विमान निर्माता कंपनियों की संख्या और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ेगी। सामरिक साझेदारी के लिहाज से भी यह देश हित में है।
वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद में नीतिगत झोल जमकर दिखाई दे रहा है। यूपीए सरकार जहां परीक्षण का दौर पूरा करने के बाद सौदे को अंतिम रूप देने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाई, वहीं 2014 में केन्द्र में सत्ता बदलने के बाद आई नई सरकार ने पुरानी निविदा को रद्द कर दिया। 126 लड़ाकू विमानों के रक्षा सौदे में जहां वायुसेना ने दो इंजन वाले लड़ाकू विमानों की जरूरत पर जोर दिया था, वहीं दो साल पहले रक्षा मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी के सहयोग से एकल इंजन वाले 114 फाइटर जेट के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके लिए अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन का एफ-16 और ब्रिटेन की ग्रिपेन जैसी दो ही कंपनियां दौड़ में थी। कुछ महीने पहले रक्षा मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया और वायुसेना की पुरानी जरूरत को आधार बनाते हुए अब एकल और दो इंजन वाले लड़ाकू विमानों के सौदे के लिए प्रस्ताव मंगाने की मंजूरी दे दी है। इस बारे में वायुसेना के अफसर मुंह नहीं खोलना चाहते। हालांकि मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार सामरिक चुनौती, भावी जरूरत और रणनीतिक साझेदारी के हिसाब से 110 लड़ाकू विमानों की आरएफआई जारी होना ही उपयुक्त कदम है। इससे विमान निर्माता कंपनियों की संख्या और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ेगी। सामरिक साझेदारी के लिहाज से भी यह देश हित में है।
F/A-18 Hornet fighter jets
वायुसेना की आवश्यकता
वायुसेना चीन और पाकिस्तान से मिल रही दोहरी चुनौतियों को ध्यान में रखकर करीब डेढ़ दशक से 40-42 स्क्वाड्रान (एक स्क्वाड्रान में 16+2 फाइटरजेट) का सपना लेकर चल रही है। 1998 में ही वायुसेना ने 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की जरूरत बताया था। कारिगल संघर्ष के बाद वायुसेना की इस मांग ने और जोर पकड़ा, लेकिन कई साल के विचार विमर्श और मशक्कत के बाद 2007 में उसे केन्द्र सरकार से सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत इसकी हरी झंडी मिल सकी। तब तक वायुसेना की क्षमता घटकर 32.5 स्क्वाड्रॉन पर आ चुकी थी। वायुसेना सूत्रों के मुताबिक मौजूदा समय में सुखोई-30एमकेआई के लगातार बेड़े में शामिल होने के बाद भी वायुसेना की क्षमता 30 स्क्वाड्रान के आस-पास ही है। मिग सीरीज के कई फाइटर जेट अपनी आयु पूरी करके रिटायर हो चुके हैं। वहीं फाइटर जेट सौदों की बात की जाए तो 2007 में आरएफआई जारी होने के बाद से अब तक फ्रांस के साथ केवल 36 (दो स्क्वाड्रॉन) राफेल फाइटर जेटों का सौदा हुआ है। इस सौदे की शर्तों के अनुसार नए राफेल विमानों की खेप भी 2019 के अंत में आने की संभावना है।
वायुसेना चीन और पाकिस्तान से मिल रही दोहरी चुनौतियों को ध्यान में रखकर करीब डेढ़ दशक से 40-42 स्क्वाड्रान (एक स्क्वाड्रान में 16+2 फाइटरजेट) का सपना लेकर चल रही है। 1998 में ही वायुसेना ने 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की जरूरत बताया था। कारिगल संघर्ष के बाद वायुसेना की इस मांग ने और जोर पकड़ा, लेकिन कई साल के विचार विमर्श और मशक्कत के बाद 2007 में उसे केन्द्र सरकार से सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत इसकी हरी झंडी मिल सकी। तब तक वायुसेना की क्षमता घटकर 32.5 स्क्वाड्रॉन पर आ चुकी थी। वायुसेना सूत्रों के मुताबिक मौजूदा समय में सुखोई-30एमकेआई के लगातार बेड़े में शामिल होने के बाद भी वायुसेना की क्षमता 30 स्क्वाड्रान के आस-पास ही है। मिग सीरीज के कई फाइटर जेट अपनी आयु पूरी करके रिटायर हो चुके हैं। वहीं फाइटर जेट सौदों की बात की जाए तो 2007 में आरएफआई जारी होने के बाद से अब तक फ्रांस के साथ केवल 36 (दो स्क्वाड्रॉन) राफेल फाइटर जेटों का सौदा हुआ है। इस सौदे की शर्तों के अनुसार नए राफेल विमानों की खेप भी 2019 के अंत में आने की संभावना है।
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fighter jets
अच्छा तो नहीं रहा अनुभव
2007 में अंतरराष्ट्रीय अनुरोध पत्र जारी करने के बाद वायुसेना के पास छह अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियों के प्रस्ताव आए थे। इनमें अमेरिका की दोनों कंपनियों लॉकहीड मार्टिन (एफ-16) और बोइंग (एफ-18 सुपरहार्नेट) ने भाग लिया था। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन का ग्रिपेन, फ्रांस की देसाल्ट एवियेशन का राफेल, यूरोपीय देशों का यूरोफाइटर तथा रूस के मिग कॉर्पोरेशन ने हिस्सा लिया था। इसके लिए वायुसेना ने सभी फाइटरजेटों का हर स्तर से काफी गहन परीक्षण किया था। भारत की चुनौती, जरूरत के हिसाब से लड़ाकू विमान टटोले गए और अंत में फ्रांस का राफेल और यूरोपीय देशों का यूरोफाइटर बाजी मारने में सफल रहा। कॉमर्शियल ट्रायल के बाद बाजी राफेल के हाथ लगी और सौदे के अंतिम रूप लेने तक सन् 2013 का वक्त आ गया। तत्कालीन यूपीए सरकार ने परीक्षण, कॉमर्शियल ट्रायल समेत सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली, इस सौदे को 2014 में आम चुनाव के बाद केन्द्र में आने वाली नई सरकार के जिम्मे छोड़ दिया। मई 2014 में केन्द्र में सत्ता बदल गई। एनडीए की सरकार आई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बने। नई सरकार ने 2007 में जारी हुई इस निविदा को ही रद्द कर दिया और जनवरी 2015 में फ्रांस से तैयार हालत में 36 राफेल लड़ाकू विमानों को लेने का फैसला किया।
2007 में अंतरराष्ट्रीय अनुरोध पत्र जारी करने के बाद वायुसेना के पास छह अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियों के प्रस्ताव आए थे। इनमें अमेरिका की दोनों कंपनियों लॉकहीड मार्टिन (एफ-16) और बोइंग (एफ-18 सुपरहार्नेट) ने भाग लिया था। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन का ग्रिपेन, फ्रांस की देसाल्ट एवियेशन का राफेल, यूरोपीय देशों का यूरोफाइटर तथा रूस के मिग कॉर्पोरेशन ने हिस्सा लिया था। इसके लिए वायुसेना ने सभी फाइटरजेटों का हर स्तर से काफी गहन परीक्षण किया था। भारत की चुनौती, जरूरत के हिसाब से लड़ाकू विमान टटोले गए और अंत में फ्रांस का राफेल और यूरोपीय देशों का यूरोफाइटर बाजी मारने में सफल रहा। कॉमर्शियल ट्रायल के बाद बाजी राफेल के हाथ लगी और सौदे के अंतिम रूप लेने तक सन् 2013 का वक्त आ गया। तत्कालीन यूपीए सरकार ने परीक्षण, कॉमर्शियल ट्रायल समेत सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली, इस सौदे को 2014 में आम चुनाव के बाद केन्द्र में आने वाली नई सरकार के जिम्मे छोड़ दिया। मई 2014 में केन्द्र में सत्ता बदल गई। एनडीए की सरकार आई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बने। नई सरकार ने 2007 में जारी हुई इस निविदा को ही रद्द कर दिया और जनवरी 2015 में फ्रांस से तैयार हालत में 36 राफेल लड़ाकू विमानों को लेने का फैसला किया।
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Fighter Plane
विडंबना
विडंबना यह है कि यूपीए सरकार ने सौदे की सारी औपचारिकताओं को करीब-करीब पूरा कर केवल मुहर लगाने की जिम्मेदारी अगली सरकार पर सौंप दी थी। इसके ठीक एक साल बाद देश में आम चुनाव होने थे। मौजूदा समय में भी आरएफआई भर जारी हुई है और अगले साल देश में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके अलावा एक स्थिति और है। 2007 में जारी हुई निविदा, परीक्षण और सौदे की औपचारिकताओं को पूरा करने में करीब पांच साल का समय लग गया था। वायुसेना के परीक्षण करने के मानक के अनुसार फाइटर जेटों को परखने में ही करीब तीन साल से अधिक का समय लग सकता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि आखिरकार वायुसेना कब तक लड़ाकू वमानों की इस नई खेप को पा सकेगी?
विडंबना यह है कि यूपीए सरकार ने सौदे की सारी औपचारिकताओं को करीब-करीब पूरा कर केवल मुहर लगाने की जिम्मेदारी अगली सरकार पर सौंप दी थी। इसके ठीक एक साल बाद देश में आम चुनाव होने थे। मौजूदा समय में भी आरएफआई भर जारी हुई है और अगले साल देश में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके अलावा एक स्थिति और है। 2007 में जारी हुई निविदा, परीक्षण और सौदे की औपचारिकताओं को पूरा करने में करीब पांच साल का समय लग गया था। वायुसेना के परीक्षण करने के मानक के अनुसार फाइटर जेटों को परखने में ही करीब तीन साल से अधिक का समय लग सकता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि आखिरकार वायुसेना कब तक लड़ाकू वमानों की इस नई खेप को पा सकेगी?