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BJP: मोदी-योगी के कारण बदल रही मुसलमानों की सोच, चुनाव में नए समीकरण बनने की संभावना
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सार
इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मुसलमान मतदाता भाजपा को लेकर आशंकित रहते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 10 साल के शासनकाल में मुसलमानों ने यह देखा है कि उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं का ठीक उसी प्रकार लाभ मिल रहा है, जैसे कि हिंदुओं या समाज के किसी अन्य वर्ग को मिल रहा है।
क्या भाजपा को लेकर बदल रही मुस्लिम वोटरों की सोच।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मुसलमान मतदाताओं को लेकर लंबे समय से एक आम धारणा रही है कि वे भाजपा को वोट नहीं करते। वे उसी राजनीतिक दल या प्रत्याशी को वोट करना ठीक समझते हैं, जो भाजपा या उसके उम्मीदवारों को हराने की क्षमता रखता हो। लेकिन कई ऐसे संकेत मिल रहे हैं, जो यह बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 'सबका साथ और सबका विकास' का वादा कर केंद्र की सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों को लेकर इस पारंपरिक सोच को बदलने का काम किया है। कम या अधिक, लेकिन कई स्थानों पर मुसलमान मतदाता भाजपा के पक्ष में बातें करते और उसे वोट करने की बात कहते देखे-सुने जा रहे हैं। क्या मुस्लिम मतदाताओं की सोच में कोई बुनियादी बदलाव आ रहा है? क्या मुस्लिम समाज एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है? इसका असर देश, समाज और राजनीति पर किस तरह दिखाई पड़ सकता है?
इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मुसलमान मतदाता भाजपा को लेकर आशंकित रहते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 10 साल के शासनकाल में मुसलमानों ने यह देखा है कि उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं का ठीक उसी प्रकार लाभ मिल रहा है, जैसे कि हिंदुओं या समाज के किसी अन्य वर्ग को मिल रहा है। बल्कि ज्यादा गरीबी होने के कारण कई स्थानों पर मुसलमान लोग केंद्र सरकार की योजनाओं का ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में उनके मन से यह डर दूर हुआ है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके साथ किसी तरह का भेदभाव होगा।
डॉ. फैजी के अनुसार, आम मुसलमानों को यह डर दिखाया जाता था कि मोदी-योगी के सत्ता में आने के बाद वे अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगे, या उनसे निचले स्तर के नागरिकों जैसा व्यवहार होगा। लेकिन दस साल में मुसलमानों ने देखा कि वे पहले की तरह न केवल अपने धर्म का आजादी के साथ पालन कर पा रहे हैं, बल्कि इसके लिए उन पर कोई रोक-टोक भी नहीं लगाई जा रही है। ऐसे में भाजपा या आरएसएस को लेकर मुसलमानों के मन में जो भय पैदा किये गए थे, वे समय के साथ धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं।
शिक्षा बढ़ने के साथ दूर हो रही गलतफहमी
उनका मानना है कि अशिक्षा और गरीबी में उलझा मुसलमान मौलानाओं की बातों में उलझा हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, लोगों की पारंपरिक सोच में बदलाव आ रहा है। आधुनिक शिक्षा मुसलमान समुदाय की सोच में बड़ा बदलाव ला सकती है। जिस तरह केंद्र सरकार ने मुसलमान बच्चों-युवाओं को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का काम किया है, उसका असर भी जल्द दिखाई पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी यूपी का इलाका मुस्लिम बहुल है और कई मायनों में यह यूपी के मुसलमानों की सोच का प्रतिनिधित्व भी करता है। लेकिन यह खुलेआम देखा जा रहा है कि अमरोहा से कांग्रेस उम्मीदवार दानिश अली के खिलाफ यही मुसलमान मतदाता खुलेआम नारेबाजी कर रहा है। साथ ही वह भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने की बात भी कह रहा है। ये मतदाता अपने जनप्रतिनिधि का विरोध बिजली, पानी, सड़क और उनकी जनता के बीच उपलब्धता को लेकर प्रश्न कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनता का अपने धर्म के उम्मीदवार का जमीनी मुद्दों के कारण विरोध करना और दूसरे धर्म के उम्मीदवार का समर्थन करना यह बताता है कि अब उनकी प्राथमिकता धर्म नहीं, बल्कि विकास और सुविधाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक बदलाव है।
सीमित वर्ग ही कर रहा वोट
राजस्थान के पोकरण में दारुम उलूम देवबंद मदरसा के प्रबंधन से जुड़े कैप्टन रहमतुल्लाह कासमी (रिटायर्ड) ने अमर उजाला से कहा कि यह कहना तो बिल्कुल सही नहीं होगा कि अब भाजपा-आरएसएस को लेकर मुसलमानों के मन का पूरा संदेह दूर हो गया है, लेकिन यह बात भी सही है कि केंद्र सरकार या राजस्थान की राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ मुसलमानों को ठीक उसी प्रकार मिल रहा है, जैसे कि किसी अन्य समुदाय को मिल रहा है। ऐसे में भाजपा को लेकर कुछ भ्रम तो दूर हुआ है। लेकिन अभी भी मुसलमानों का एक सीमित वर्ग ही भाजपा को वोट कर रहा है।
राजस्थान में भी भेदभाव नहीं हुआ
कैप्टन रहमतुल्लाह कासमी (रिटायर्ड) ने कहा कि राजस्थान विधानसभा का चुनाव पूरी तरह कन्हैयालाल हत्याकांड के कारण एक तरफा हो गया था। इससे भी मुसलमानों के मन में एक आशंका थी कि भाजपा की सरकार आने के बाद उनसे सौतेला व्यवहार किया जा सकता है। लेकिन भजनलाल शर्मा की सरकार ने अब तक कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे यह कहा जा सके कि वह मुसलमानों को लेकर गलत रास्ते पर जा रही है। बल्कि सबके विकास के लिए एक जैसी कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यों से अल्पसंख्यक वर्ग के मन में भाजपा-आरएसएस को लेकर संदेह कुछ कम अवश्य होता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दूर किए संदेह
रहमतुल्लाह का मानना है कि भाजपा के कुछ नेता मुसलमानों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर माहौल खराब कर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे लोगों को चुनाव में टिकट न देकर मुसलमानों को एक साफ संकेत दिया है कि वे ऐसी लीडरशिप नहीं पसंद करेंगे, जो नकारात्मक माहौल बनाए। ठीक इसी तरह राजस्थान में भी चुनाव के बाद कुछ लोगों ने मुसलमानों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। लेकिन राज्य सरकार ने ऐसे लोगों के साथ कठोरता बरती। उन्हें राज्य सरकार में कोई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी न दिया जाना भी भाजपा का एक संकेत है कि वह बदलाव की ओर देख रही है। इसका परिणाम मुसलमानों के अंदर भी दिखाई पड़ रहा है।
लेकिन मुसलमान विद्वानों का मानना है कि भाजपा ने अभी भी मुसलमान उम्मीदवार उतारने में कंजूसी बरती है। उसने केरल के एक उम्मीदवार को छोड़कर कोई दूसरा मुसलमान नेता चुनाव में नहीं उतारा। फौरी तौर पर यह वर्तमान चुनाव जीतने की उसकी अपनी रणनीति हो सकती है, लेकिन यदि वह मुसलमानों को अपने साथ लाना चाहती है, तो उसे यह दूरी भी समाप्त करनी होगी।
अभी बाकी हैं संदेह- जमाते इस्लामी हिंद
जमाते इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोहतसिम खान ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लगातार मुसलमान नेताओं-धर्मगुरुओं से मिलकर एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश अवश्य कर रहे हैं, लेकिन जब तक निचले स्तर पर आपत्तिजनक बयानबाजी बंद नहीं होती, मुसलमानों के मन में उनके प्रति संदेह कभी दूर नहीं होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपनी उपलब्धि का बड़ा दावा कर रही है, लेकिन भारत की शक्ति इससे कहीं ज्यादा है। यदि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर विश्वास के साथ आगे बढ़ा जाए, तो देश की उपलब्धि इससे कहीं अधिक हो सकती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान मतदाता इस चुनाव को बड़े बदलाव के अवसर पर देख रहा है। जिस तरह भाजपा के कुछ नेता चुनाव जीतने के बाद संविधान बदलने की बात कहते हैं, उससे भी उसके मन में एक संदेह बना हुआ है। यूसीसी और बुलडोजर पॉलिटिक्स के कारण भी उसका संदेह गहरा हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद ही मुसलमान यह तय करेगा कि इन परिस्थितियों में उसे क्या करना है।
बदलेंगे समीकरण
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि पिछले कई सर्वे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि पिछले कई चुनावों में भाजपा पांच से दस फीसदी के बीच मुसलमानों का वोट हासिल कर रही है। यह आंकड़ा कम अवश्य है, लेकिन कम मतों के अंतर से होने वाली जीत में यह बड़ी भूमिका निभा सकता है। धीरे-धीरे इन आंकड़ों में और अधिक परिवर्तन दिखाई पड़ सकता है।
विवेक सिंह ने कहा कि लेकिन इसकी व्याख्या केवल चुनावी संदर्भ में नहीं होनी चाहिए। कटु सच्चाई यह है कि राजनीतिक कारणों से कई बार अलग-अलग जातियों और धर्मों के लोगों के बीच वैमनस्य पैदा हो जाता है। इसका समाज पर गलत परिणाम पड़ता है। लेकिन बाद में जब यही दल साथ आ जाते हैं, तो इन्हीं समुदायों में कुछ हद तक एकता भी स्थापित हो जाती है। उनका मानना है कि जिस दिन मुसलमान मतदाताओं का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग भाजपा को वोट करने लगेगा, पार्टी नेताओं की बयानबाजी और उसकी नीतियों में मुसलमानों को लेकर बड़ा परिवर्तन दिखाई दे सकता है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव का असर समाज पर भी देखने को मिल सकता है, लिहाजा इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
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इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मुसलमान मतदाता भाजपा को लेकर आशंकित रहते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 10 साल के शासनकाल में मुसलमानों ने यह देखा है कि उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं का ठीक उसी प्रकार लाभ मिल रहा है, जैसे कि हिंदुओं या समाज के किसी अन्य वर्ग को मिल रहा है। बल्कि ज्यादा गरीबी होने के कारण कई स्थानों पर मुसलमान लोग केंद्र सरकार की योजनाओं का ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में उनके मन से यह डर दूर हुआ है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके साथ किसी तरह का भेदभाव होगा।
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डॉ. फैजी के अनुसार, आम मुसलमानों को यह डर दिखाया जाता था कि मोदी-योगी के सत्ता में आने के बाद वे अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगे, या उनसे निचले स्तर के नागरिकों जैसा व्यवहार होगा। लेकिन दस साल में मुसलमानों ने देखा कि वे पहले की तरह न केवल अपने धर्म का आजादी के साथ पालन कर पा रहे हैं, बल्कि इसके लिए उन पर कोई रोक-टोक भी नहीं लगाई जा रही है। ऐसे में भाजपा या आरएसएस को लेकर मुसलमानों के मन में जो भय पैदा किये गए थे, वे समय के साथ धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं।
शिक्षा बढ़ने के साथ दूर हो रही गलतफहमी
उनका मानना है कि अशिक्षा और गरीबी में उलझा मुसलमान मौलानाओं की बातों में उलझा हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, लोगों की पारंपरिक सोच में बदलाव आ रहा है। आधुनिक शिक्षा मुसलमान समुदाय की सोच में बड़ा बदलाव ला सकती है। जिस तरह केंद्र सरकार ने मुसलमान बच्चों-युवाओं को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का काम किया है, उसका असर भी जल्द दिखाई पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी यूपी का इलाका मुस्लिम बहुल है और कई मायनों में यह यूपी के मुसलमानों की सोच का प्रतिनिधित्व भी करता है। लेकिन यह खुलेआम देखा जा रहा है कि अमरोहा से कांग्रेस उम्मीदवार दानिश अली के खिलाफ यही मुसलमान मतदाता खुलेआम नारेबाजी कर रहा है। साथ ही वह भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने की बात भी कह रहा है। ये मतदाता अपने जनप्रतिनिधि का विरोध बिजली, पानी, सड़क और उनकी जनता के बीच उपलब्धता को लेकर प्रश्न कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनता का अपने धर्म के उम्मीदवार का जमीनी मुद्दों के कारण विरोध करना और दूसरे धर्म के उम्मीदवार का समर्थन करना यह बताता है कि अब उनकी प्राथमिकता धर्म नहीं, बल्कि विकास और सुविधाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक बदलाव है।
सीमित वर्ग ही कर रहा वोट
राजस्थान के पोकरण में दारुम उलूम देवबंद मदरसा के प्रबंधन से जुड़े कैप्टन रहमतुल्लाह कासमी (रिटायर्ड) ने अमर उजाला से कहा कि यह कहना तो बिल्कुल सही नहीं होगा कि अब भाजपा-आरएसएस को लेकर मुसलमानों के मन का पूरा संदेह दूर हो गया है, लेकिन यह बात भी सही है कि केंद्र सरकार या राजस्थान की राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ मुसलमानों को ठीक उसी प्रकार मिल रहा है, जैसे कि किसी अन्य समुदाय को मिल रहा है। ऐसे में भाजपा को लेकर कुछ भ्रम तो दूर हुआ है। लेकिन अभी भी मुसलमानों का एक सीमित वर्ग ही भाजपा को वोट कर रहा है।
राजस्थान में भी भेदभाव नहीं हुआ
कैप्टन रहमतुल्लाह कासमी (रिटायर्ड) ने कहा कि राजस्थान विधानसभा का चुनाव पूरी तरह कन्हैयालाल हत्याकांड के कारण एक तरफा हो गया था। इससे भी मुसलमानों के मन में एक आशंका थी कि भाजपा की सरकार आने के बाद उनसे सौतेला व्यवहार किया जा सकता है। लेकिन भजनलाल शर्मा की सरकार ने अब तक कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे यह कहा जा सके कि वह मुसलमानों को लेकर गलत रास्ते पर जा रही है। बल्कि सबके विकास के लिए एक जैसी कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यों से अल्पसंख्यक वर्ग के मन में भाजपा-आरएसएस को लेकर संदेह कुछ कम अवश्य होता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दूर किए संदेह
रहमतुल्लाह का मानना है कि भाजपा के कुछ नेता मुसलमानों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर माहौल खराब कर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे लोगों को चुनाव में टिकट न देकर मुसलमानों को एक साफ संकेत दिया है कि वे ऐसी लीडरशिप नहीं पसंद करेंगे, जो नकारात्मक माहौल बनाए। ठीक इसी तरह राजस्थान में भी चुनाव के बाद कुछ लोगों ने मुसलमानों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। लेकिन राज्य सरकार ने ऐसे लोगों के साथ कठोरता बरती। उन्हें राज्य सरकार में कोई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी न दिया जाना भी भाजपा का एक संकेत है कि वह बदलाव की ओर देख रही है। इसका परिणाम मुसलमानों के अंदर भी दिखाई पड़ रहा है।
लेकिन मुसलमान विद्वानों का मानना है कि भाजपा ने अभी भी मुसलमान उम्मीदवार उतारने में कंजूसी बरती है। उसने केरल के एक उम्मीदवार को छोड़कर कोई दूसरा मुसलमान नेता चुनाव में नहीं उतारा। फौरी तौर पर यह वर्तमान चुनाव जीतने की उसकी अपनी रणनीति हो सकती है, लेकिन यदि वह मुसलमानों को अपने साथ लाना चाहती है, तो उसे यह दूरी भी समाप्त करनी होगी।
अभी बाकी हैं संदेह- जमाते इस्लामी हिंद
जमाते इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोहतसिम खान ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लगातार मुसलमान नेताओं-धर्मगुरुओं से मिलकर एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश अवश्य कर रहे हैं, लेकिन जब तक निचले स्तर पर आपत्तिजनक बयानबाजी बंद नहीं होती, मुसलमानों के मन में उनके प्रति संदेह कभी दूर नहीं होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपनी उपलब्धि का बड़ा दावा कर रही है, लेकिन भारत की शक्ति इससे कहीं ज्यादा है। यदि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर विश्वास के साथ आगे बढ़ा जाए, तो देश की उपलब्धि इससे कहीं अधिक हो सकती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान मतदाता इस चुनाव को बड़े बदलाव के अवसर पर देख रहा है। जिस तरह भाजपा के कुछ नेता चुनाव जीतने के बाद संविधान बदलने की बात कहते हैं, उससे भी उसके मन में एक संदेह बना हुआ है। यूसीसी और बुलडोजर पॉलिटिक्स के कारण भी उसका संदेह गहरा हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद ही मुसलमान यह तय करेगा कि इन परिस्थितियों में उसे क्या करना है।
बदलेंगे समीकरण
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि पिछले कई सर्वे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि पिछले कई चुनावों में भाजपा पांच से दस फीसदी के बीच मुसलमानों का वोट हासिल कर रही है। यह आंकड़ा कम अवश्य है, लेकिन कम मतों के अंतर से होने वाली जीत में यह बड़ी भूमिका निभा सकता है। धीरे-धीरे इन आंकड़ों में और अधिक परिवर्तन दिखाई पड़ सकता है।
विवेक सिंह ने कहा कि लेकिन इसकी व्याख्या केवल चुनावी संदर्भ में नहीं होनी चाहिए। कटु सच्चाई यह है कि राजनीतिक कारणों से कई बार अलग-अलग जातियों और धर्मों के लोगों के बीच वैमनस्य पैदा हो जाता है। इसका समाज पर गलत परिणाम पड़ता है। लेकिन बाद में जब यही दल साथ आ जाते हैं, तो इन्हीं समुदायों में कुछ हद तक एकता भी स्थापित हो जाती है। उनका मानना है कि जिस दिन मुसलमान मतदाताओं का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग भाजपा को वोट करने लगेगा, पार्टी नेताओं की बयानबाजी और उसकी नीतियों में मुसलमानों को लेकर बड़ा परिवर्तन दिखाई दे सकता है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव का असर समाज पर भी देखने को मिल सकता है, लिहाजा इसका स्वागत किया जाना चाहिए।