Lok Sabha Election Result 2019: भाजपा को पहले से बड़ी जीत मिली, ये हैं मुख्य कारण
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बहुमत से भी अधिक सीट हासिल कर एक बार फिर सत्ता अपने नाम कर ली है। वहीं विपक्ष को जितनी सीटों की उम्मीद थी, उतनी भी नहीं मिल पाईं। ऐसे बहुत से कारण हैं, जिनसे भाजपा ने ये ऐतिहासिक जीत हासिल की है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बहुमत से भी अधिक सीट हासिल कर एक बार फिर सत्ता अपने नाम कर ली है। वहीं विपक्ष को जितनी सीटों की उम्मीद थी, उतनी भी नहीं मिल पाईं। ऐसे बहुत से कारण हैं, जिनसे भाजपा ने ये ऐतिहासिक जीत हासिल की है।
2014 की अगर बात करें तो गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, बिहार और दिल्ली की कुल 273 सीटों में से 240 सीटें ही भाजपा को मिली थीं। वहीं इस बार उसे 246 सीटें मिली हैं।
हैरानी की बात तो ये है कि करीब चार महीने पहले ही विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार गंवाने के बावजूद भाजपा को इन राज्यों में 61 सीटें मिली हैं। उत्तर प्रदेश में भले ही भाजपा की नौ सीटें घटी हों लेकिन वोट प्रतिशत 2014 के मुकाबले 7 फीसदी बढ़कर 50 फीसदी हुआ है। यहां पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 71 सीटें जीती थीं, जबकि इस बार भाजपा को यहां 62 सीटें मिली हैं।
यहां बेशक सपा-बसा गठबंधन के जाति आधारित वोट बंधे हुए हों लेकिन मोदी का राष्ट्रवाद का मुद्दा उसपर भारी पड़ गया। भाजपा ने यहां पहले ही 60 सीटें चुन ली थीं, लेकिन इस गठबंधन के होते हुए 40 सीटों पर नुकसान पहले से ही संभव था।
इन राज्यों में मिला उम्मीद से ज्यादा
पश्चिम बंगाल जो टीएमसी का गढ़ है, वहां भाजपा को 18 सीटें मिलीं। वहीं पटनायक के ओडिशा में भाजपा ने इस बार 8 सीट हासिल की हैं। ओडिशा में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को अभी तक के रुझानों के अनुसार 16 सीट मिल चुकी हैं। वहीं 2014 में भाजपा ने बंगाल में 2 और ओडिशा में सिर्फ 1 सीट जीती थी।
120 सांसदों के टिकट कटे
इस बार पार्टी ने 120 सासंदों के टिकट काटे। उनकी जगह 100 से अधिक प्रत्याशी जीत भी गए। टिकट उनके काटे गए थे जिनके प्रति अलग-अलग सर्वे में नाराजगी दिख रही थी।
भाजपा की चुनावी रणनीति मोदी की लोकप्रियता की लहर में उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी खत्म करने की भी थी। जिसके चलते उम्मीदवारों को पूरी तरह से अप्रासंगिक कर दिया गया। वोट मोदी के नाम पर मांगे गए। ऐसा भी हुआ कि मोदी ने रैलियों में उम्मीदवारों के नाम तक नहीं लिए।