{"_id":"699d587bd617cbbd08083602","slug":"madras-high-court-directs-dme-to-permit-organ-transplant-for-kidney-patient-2026-02-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kidney Transplant: 'जान बचाने से बड़ा कुछ नहीं', अंगदान को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Kidney Transplant: 'जान बचाने से बड़ा कुछ नहीं', अंगदान को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: नवीन पारमुवाल
Updated Tue, 24 Feb 2026 01:26 PM IST
विज्ञापन
सार
मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि हर अंगदान को शक की नजर से नहीं देखना चाहिए। कोर्ट ने किडनी के एक मरीज को अंगदान की इजाजत देने का निर्देश दिया है।
मद्रास हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
विज्ञापन
विस्तार
Madras High Court: मद्रास हाईकोर्ट ने अंगदान से जुड़े एक मामले में बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि सभी अंगदान करने वालों को संदेह की नजर से नहीं देखना चाहिए। यह मामला किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे एक मरीज से जुड़ा है। मरीज को उसकी मामी के पति के भाई अपनी किडनी देना चाहते थे। लेकिन मेडिकल शिक्षा निदेशालय ने इसकी मंजूरी देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह मामला कोर्ट पहुंचा।
चेन्नई में जस्टिस पी टी आशा ने इस मामले पर सुनवाई की। उन्होंने मेडिकल शिक्षा निदेशालय को निर्देश दिया कि मरीज को ट्रांसप्लांट की इजाजत दी जाए। कोर्ट ने कहा कि गैर-रिश्तेदारों के बीच होने वाले अंगदान को सिर्फ गणित के पैमाने पर तौलना या उन्हें शक की नजर से देखना ठीक नहीं है।
याचिका एक मरीज और उनके डोनर ने दायर की थी। मरीज किडनी की बीमारी के पांचवें स्टेज पर है। डोनर, मरीज की मामी के पति का भाई है और वह अपनी इच्छा से किडनी दान करने के लिए आगे आया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में निदेशालय का रवैया सही नहीं है।
यह भी पढ़ें: Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- बेरोजगार पत्नी निरुपयोगी नहीं, उसकी मेहनत की अनदेखी करना अन्यायपूर्ण
जान बचाना ज्यादा जरूरी
कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ दयालु लोग भी होते हैं। वे निस्वार्थ भाव से अपने परिवार के सदस्य या दोस्त को नया जीवन देने के लिए अंगदान करना चाहते हैं। ऐसे में हर मामले को शक की नजर से देखना गलत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी की जान बचाना सबसे महत्वपूर्ण है।
जस्टिस आशा ने कहा कि अंगदान को नामंजूर करने वाला कमेटी का फैसला मनमाना और बिना किसी आधार के था। कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया है कि इस आदेश की कॉपी मिलने के तीन हफ्तों के अंदर कानून के मुताबिक ट्रांसप्लांट की इजाजत दी जाए।
Trending Videos
चेन्नई में जस्टिस पी टी आशा ने इस मामले पर सुनवाई की। उन्होंने मेडिकल शिक्षा निदेशालय को निर्देश दिया कि मरीज को ट्रांसप्लांट की इजाजत दी जाए। कोर्ट ने कहा कि गैर-रिश्तेदारों के बीच होने वाले अंगदान को सिर्फ गणित के पैमाने पर तौलना या उन्हें शक की नजर से देखना ठीक नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
याचिका एक मरीज और उनके डोनर ने दायर की थी। मरीज किडनी की बीमारी के पांचवें स्टेज पर है। डोनर, मरीज की मामी के पति का भाई है और वह अपनी इच्छा से किडनी दान करने के लिए आगे आया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में निदेशालय का रवैया सही नहीं है।
यह भी पढ़ें: Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- बेरोजगार पत्नी निरुपयोगी नहीं, उसकी मेहनत की अनदेखी करना अन्यायपूर्ण
जान बचाना ज्यादा जरूरी
कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ दयालु लोग भी होते हैं। वे निस्वार्थ भाव से अपने परिवार के सदस्य या दोस्त को नया जीवन देने के लिए अंगदान करना चाहते हैं। ऐसे में हर मामले को शक की नजर से देखना गलत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी की जान बचाना सबसे महत्वपूर्ण है।
जस्टिस आशा ने कहा कि अंगदान को नामंजूर करने वाला कमेटी का फैसला मनमाना और बिना किसी आधार के था। कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया है कि इस आदेश की कॉपी मिलने के तीन हफ्तों के अंदर कानून के मुताबिक ट्रांसप्लांट की इजाजत दी जाए।