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MVA में उथल-पुथल के आसार: नगर निकाय चुनाव में सहयोगियों से आगे कांग्रेस, क्या गठबंधन में बढ़ेगी हिस्सेदारी?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई। Published by: राहुल कुमार Updated Sun, 18 Jan 2026 05:35 PM IST
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सार

महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों के नतीजों के बाद एमवीए के भीतर संतुलन बदल सकता है। एनसीपी (एसपी) अपने गढ़ों में हारी, वहीं शिवसेना (यूबीटी) मुंबई तक सीमित रही, जबकि कांग्रेस कई शहरों में उभरी। इससे 2029 से पहले नेतृत्व और सीट-बंटवारे में नई रणनीति देखने को मिल सकती है। विस्तार से पढ़ें विश्लेषकों की राय.........

Maharashtra Civic Poll Verdict Set to Reshape Opposition Equations as Congress Gains
महाविकास अघाड़ी के नेता - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों के चुनाव नतीजे विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी के अंदर समीकरण बदल सकते हैं। चुनावों में शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (शरद) अपने गढ़ पुणे में बुरी तरह हार गई है, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने अपने घरेलू मैदान मुंबई में तो मुकाबला किया, लेकिन दूसरे इलाकों में उसके आधार में गिरावट देखने को मिली, इसके उलट राज्य के रई जिलों में कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत की है।

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महाराष्ट्र निकाय चुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी बनी कांग्रेस
निकाय चुनाव के अंतिम नतीजों के मुताबिक, 29 नगर निगमों की कुल 2869 सीटों में से भाजपा ने 1,425 सीटें जीतीं, एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 399, कांग्रेस ने 324, अजीत पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने 167, शिवसेना (यूबीटी) ने 155, एनसीपी (एसपी) ने 36 एमएनएस ने 13, बीएसपी ने 6,  अन्य रजिस्टर्ड पार्टियों ने 129, गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों ने 196 और 19 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।
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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नतीजों से संकेत मिलता है कि 2029 के विधानसभा चुनावों से पहले एमवीए के भीतर सीट-बंटवारे, नेतृत्व और तालमेल को लेकर नए सिरे से मंथन होगा। जहां शिवसेना (यूबीटी) मुंबई में भाजपा के लिए मुख्य चुनौती बनी रही, वहीं राज्य के अन्य हिस्सों में उसका आधार कमजोर पड़ा। दूसरी ओर, एनसीपी (एसपी) को पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों में करारी हार का सामना करना पड़ा।

इसके उलट, कांग्रेस कोल्हापुर, चंद्रपुर और भिवंडी जैसे शहरों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी अब एमवीए में बड़ा हिस्सा मांगेगी और यह तर्क देगी कि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति भाजपा की बढ़त को रोकने में कारगर नहीं रही। सूत्रों के मुताबिक, कई जगहों पर कांग्रेस का अकेले या सीमित गठबंधन में चुनाव लड़ना एक स्ट्रेस टेस्ट साबित हुआ, जिससे पार्टी की जमीनी मौजूदगी सामने आई।

एमवीए में आंकड़े बदलेंगे समीकरण
विश्लेषकों ने कहा कि जहां ठाकरे की पार्टी मुंबई में भाजपा के लिए मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी बनी हुई है, वहीं राज्य के दूसरे हिस्सों में उसका प्रभाव कम हो गया है, जिसका सीधा असर एमवीए में अपनी संगठनात्मक ताकत के आधार पर बड़े साझेदार होने के उसके दावे पर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि नतीजों से पता चलता है कि शिवसेना (यूबीटी) और शिवसेना के बीच वोटों के बंटवारे से कई वार्डों में सत्ताधारी गठबंधन को फायदा हुआ है। इन विश्लेषकों ने कहा कि जहां ठाकरे की पार्टी भावनात्मक जुड़ाव और ब्रांड पहचान बनाए हुए है, वहीं एक एकजुट संगठनात्मक मशीनरी की कमी में इसे वार्ड-स्तर की जीत में बदलना एक चुनौती बना हुआ है।

सूत्रों का कहना है कि पुणे और ज्यादातर शहरी इलाकों में एनसीपी-शरद का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा है। जिसका असर गठबंधन में उसकी दावादेरी पर देखने को मिल सकता है। एक विश्लेषक ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस अब विपक्ष में पैन-महाराष्ट्र मौजूदगी वाली एकमात्र पार्टी है, जो उसे एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के लिए दबाव बनाने पर मजबूर करेगी जो उसके राष्ट्रीय एजेंडे को प्राथमिकता दे, जिससे संभावित रूप से शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) को दूसरा स्थान चुनने या विपक्षी वोटों में तीन-तरफा बंटवारे का जोखिम उठाना पड़ सकता है। 

'शरद और उद्धव को कांग्रेस के साथ चलना होगा'
जानकारों का कहा कि एमवीए के घटकों को एआईएमआईएम जैसे समूहों से भी निपटना होगा, जिसने छत्रपति संभाजीनगर और मालेगांव सहित अन्य जगहों पर अच्छा प्रदर्शन किया और बहुजन विकास अघाड़ी जिसने वसई-विरार में जीत हासिल की। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने कहा, शरद और उद्धव के पास अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनका चुनाव चिन्ह पूरे महाराष्ट्र में पहुंचे। 2029 के विधानसभा चुनाव बहुत दूर हैं, लेकिन जिला परिषद चुनावों से शुरू करके इन दोनों पार्टियों को इसके लिए कांग्रेस के साथ चलना होगा। 

एनसीपी ने माना- अब सड़कों पर उतरने का समय
भाजपा नेता माधव भंडारी ने कहा कि कांग्रेस सहित विपक्षी दल जमीनी हकीकत से बहुत दूर हैं, जबकि ठाकरे अपनी ही दुनिया में जी रहे हैं।विकास महत्वाकांक्षी आबादी के लिए मुख्य मुद्दा है और स्थानीय चुनावों में इस बात को निर्णायक रूप से रेखांकित किया गया है। एनसीपी-एसी के महासचिव अरविंद तिवारी ने राय दी, उद्धव की पार्टी और एनसीपी (शरद) के लिए सड़कों पर उतरने और नया नेतृत्व बनाने के लिए अपने संगठनों पर फिर से काम करने का समय है।

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कांग्रेस ने बताया कहां रह गई कमी 
कांग्रेस नेता रत्नाकर महाजन ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्षी गुट में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उन्होंने माना कि हाल के स्थानीय निकाय और नगर निगम चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि जीतने वालों और विपक्ष के बीच का अंतर बहुत अधिक है। उन्होंने कहा, पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों को कैश का फ्लो एक वजह हो सकता है, लेकिन इस बात को नजरअंदाज किया गया है। कांग्रेस के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका ब्लॉक लेवल पर संगठन को मजबूत करना है। ऐसा नहीं है कि लीडरशिप यह नहीं समझती, लेकिन लागू करने में कमियां हैं। पार्टी को भाजपा का मुकाबला करने के लिए एकजुट चेहरा भी पेश करना होगा और अपनी गठबंधन रणनीति पर फिर से सोचना होगा।


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