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Explainer: किस मामले की वजह से रद्द हुई मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी, नियम क्या कहते हैं और आगे कौन से रास्ते
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 10 Jun 2026 04:12 PM IST
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सार
मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द किए जाने के मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। बुधवार को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात कर रिटर्निंग अधिकारी के फैसले को गलत, पक्षपातपूर्ण और कानून के विरुद्ध बताते हुए उसे तत्काल निरस्त करने की मांग की।
मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा उम्मीदवार के तौर पर नामांकन खारिज होने पर विवाद।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राज्यसभा चुनाव को लेकर देशभर में सियासी सरगर्मिया जारी है। इसका केंद्र मध्य प्रदेश बना हुआ है, जहां मंगलवार को कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द हो गया। मीनाक्षी की तरफ से एक केस की जानकारी छिपाना नामांकन खारिज करने की वजह बताया गया। भाजपा ने आरोप लगाया कि मीनाक्षी पर तेलंगाना में एक मामला दर्ज है, जिसकी जानकारी उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में नहीं दी। वहीं, कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें सिर्फ एक मामले में नोटिस मिला है, जिससे उनका सीधे तौर पर लेना-देना भी नहीं है। ऐसे में उनके नामांकन को रद्द करना गलत है।
अलग-अलग दलों और नेताओं के दावों के बीच इस बात को लेकर भ्रम की स्थिति है कि आखिर चुनाव आयोग का खुद का नियम किसी उम्मीदवार की ओर से दी जाने वाली जानकारियों पर क्या कहता है? चुनाव आयोग को कौन सी जानकारियां दी जानी अनिवार्य हैं? कौन सी जानकारियों पर चूक के मामले में उम्मीदवार का नामांकन खारिज हो सकता है? इसकी पूरी प्रक्रिया क्या है? अगर नामांकन को लेकर किसी भी तरह के विवाद की स्थिति है तो उम्मीदवार के पास राहत पाने के क्या विकल्प हैं? इन सभी बातों पर हमने चर्चा की सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता से। आइये जानते हैं इस पूरे मामले को...
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पहले जानें- क्या है वह मामला, जिसे लेकर रद्द हुआ नटराजन का नामांकन?
क्या था मामला?हैदराबाद की फोर्थ एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अदालत में कॉरपोरेटर ए. श्रीलता ने मीनाक्षी नटराजन सहित अन्य लोगों के खिलाफ एक परिवाद दायर किया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि शिव कुमार रेड्डी नामक व्यक्ति ने उनके साथ छेड़छाड़ की और मीनाक्षी नटराजन ने उसे संरक्षण दिया। शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराएं 356, 61, 45, 46, 351(2), 3(5) और 79 के तहत कार्रवाई की मांग की गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरे मामले की शुरुआत 2021 में ही हो गई थी। हैदराबाद (तारनाका) की एक पूर्व महिला नगर कॉर्पोरेटर, जो पहले तेदेपा में थीं और बाद में कांग्रेस में आईं, ने चतुर्थ अतिरिक्त मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में निजी याचिका दायर की थी। उस महिला नेता का मुख्य विवाद तेलंगाना के ही एक अन्य कांग्रेस नेता से था। महिला ने आरोप लगाया था कि उनकी जान को खतरा है और कांग्रेस के नेता उन्हें परेशान कर रहे हैं।
ये भी पढ़ें: Explainer: चुनाव आयोग ने भी नहीं मानी मीनाक्षी नटराजन की दलील तो क्या करेगी कांग्रेस? कौन सा रास्ता अब भी बाकी
इसमें मीनाक्षी नटराजन का नाम कैसे आया?
चूंकि, मीनाक्षी नटराजन उस समय तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी थीं, शिकायतकर्ता महिला ने अदालत को बताया कि उन्होंने इस उत्पीड़न की शिकायत मीनाक्षी नटराजन और अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से की थी। लेकिन कार्रवाई करने के बजाय, ये नेता कथित तौर पर उस महिला पर केस वापस लेने का दबाव बना रहे थे।
इस निजी शिकायत के आधार पर हैदराबाद की अदालत ने मीनाक्षी नटराजन को एक नोटिस जारी किया था कि वे अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखें। जब कोई व्यक्ति कोर्ट में प्राइवेट कम्प्लेंट करता है, तो कोर्ट सीधे उस शख्स को अपराधी नहीं मान लेती, जिसके खिलाफ शिकायत हो। कोर्ट पहले यह जांचने के लिए नोटिस भेजती है कि 'क्या इस शिकायत में कोई दम है?' कांग्रेस के मुताबिक, इस मामले में अदालत ने अब तक आरोप तय नहीं किए हैं और सुनवाई जारी है।
चूंकि, मीनाक्षी नटराजन उस समय तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी थीं, शिकायतकर्ता महिला ने अदालत को बताया कि उन्होंने इस उत्पीड़न की शिकायत मीनाक्षी नटराजन और अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से की थी। लेकिन कार्रवाई करने के बजाय, ये नेता कथित तौर पर उस महिला पर केस वापस लेने का दबाव बना रहे थे।
इस निजी शिकायत के आधार पर हैदराबाद की अदालत ने मीनाक्षी नटराजन को एक नोटिस जारी किया था कि वे अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखें। जब कोई व्यक्ति कोर्ट में प्राइवेट कम्प्लेंट करता है, तो कोर्ट सीधे उस शख्स को अपराधी नहीं मान लेती, जिसके खिलाफ शिकायत हो। कोर्ट पहले यह जांचने के लिए नोटिस भेजती है कि 'क्या इस शिकायत में कोई दम है?' कांग्रेस के मुताबिक, इस मामले में अदालत ने अब तक आरोप तय नहीं किए हैं और सुनवाई जारी है।
मामले पर क्या बोलीं भाजपा-कांग्रेस?
1. भाजपाभाजपा की ओर से प्रस्तुत आपत्ति में कहा गया है कि यह मामला न्यायालय में लंबित है और मीनाक्षी नटराजन इस प्रकरण में अपना जवाब भी दाखिल कर चुकी हैं। इसके बावजूद राज्यसभा चुनाव के लिए दाखिल शपथ पत्र में इस मामले का उल्लेख नहीं किया गया। भाजपा ने इसे तथ्यों को छिपाने का मामला बताते हुए नामांकन पर कार्रवाई और उसे निरस्त करने की मांग की है।
2. कांग्रेस
दूसरी ओर, कांग्रेस का तर्क है कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ किसी न्यायालय ने अभी तक आरोप तय नहीं किए हैं और न ही उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज है। इसलिए भाजपा की आपत्ति का कोई कानूनी आधार नहीं है।
चुनाव आयोग का खुद का नियम उम्मीदवारों की जानकारियों पर क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट के वकील और सांविधानिक मामलों के विशेषज्ञ विराग गुप्ता ने इस मामले में चुनाव आयोग के नियमों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, सभी उम्मीदवारों को अपनी उम्र, शिक्षा, संपत्ति और आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी देना अनिवार्य है। इनमें सभी तरह के लंबित आपराधिक मामले और जिनमें सजा हो गई है उनका पूरा विवरण रिटर्निंग ऑफिसर को देना जरुरी है।पार्टियों को अपनी वेबसाइट में इन विवरणों को सार्वजनिक करने के साथ टीवी और अखबार में विज्ञापन भी देना चाहिए। इसके लिए चुनाव आयोग ने फार्म-सी-6, सी-7, सी-8 और 7-ए जारी किए हैं। चुनाव आयोग ने 19 मार्च 2019 को सभी राजनीतिक दलों को पत्र लिखकर एफएक्यू जारी किया था। उसके सवाल नंबर-8 के जवाब के अनुसार जिन मामलों में सिर्फ एफआईआर दर्ज हुई हो उनका फार्म-26 के आइटम-5 में पूरा विवरण देना जरुरी है।
अगर कोई उम्मीदवार अपने आपराधिक केस से जुड़ी जानकारी छिपाए तो?
विराग गुप्ता ने बताया कि चुनाव आयोग की तरफ से जारी एफएक्यू दस्तावेज के सवाल-14 के जवाब के मुताबिक, अगर किसी प्रत्याशी ने सही जानकारी नहीं दी या छिपाई तो चुनाव के परिणाम के बाद हाईकोर्ट में उनके खिलाफ चुनाव याचिका दायर हो सकती है। गलत या अधूरी जानकारी के मामलों में चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट भेज सकता है, जिससे प्रत्याशी के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला चलाया जा सके।
अगर अदालत ने मामले का संज्ञान न लिया हो और सिर्फ नोटिस जारी किया हो?
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल मामले में मार्च 2003 और लोक प्रहरी मामले में सितंबर 2018 में अहम फैसले दिये थे। सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक, प्रत्याशियों और पार्टियों को आपराधिक मामलों का खुलासा करना जरुरी है। सिर्फ आपराधिक मुकदमे दर्ज होने से कोई अपराधी नहीं होता। चार्जशीट के बाद लोकसेवकों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, जबकि आपराधिक मामले में दो साल से ज्यादा सजा हो तो फिर उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है।दूसरी तरफ जिन आपराधिक मामलों में कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया, उनका विवरण भी देना जरुरी है। लेकिन विवरण नहीं देने से प्रत्याशियों का नामांकन रद्द नहीं किया जा सकता। खासकर अगर कोर्ट ने संज्ञान न लिया हो तो। अगर अदालत ने संज्ञान लिया है तो फिर यह जानकारी छिपाने पर सीधी कार्रवाई की जा सकती है।
मीनाक्षी नटराजन के मामले में मजिस्ट्रेट अदालत में सुनवाई हुई है, क्या इसकी जानकारी देना जरूरी था?
इस मामले में एफआईआर, चार्जशीट या सजा की बातें ज्यादा अहमियत नहीं रखती हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, किसी भी तरह की गलत जानकारी या चूक के लिए मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ आईपीसी की धारा-171-जी या बीएनएस की धारा-175 के अनुसार मुकदमा दर्ज हो सकता है। जनप्रतिनिधित्व कानून-1951 की धारा 123 (4) के अनुसार गलत या अधूरी जानकारी देने के लिए भ्रष्ट आचरण के मामले में उनके खिलाफ चुनाव याचिका दायर की जा सकती है।दूसरी तरफ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार, ऐसे मामलों में शो कॉज नोटिस जारी करने और प्रत्याशी के जवाब के अनुसार ही चुनाव अधिकारी को निर्णय लेना चाहिए। हालांकि, सिर्फ गलत या अधूरी जानकारी देने के मामले में नामांकन को खारिज करने के लिए रिटर्निंग ऑफिसर को पूर्ण अधिकार नहीं है। इसलिए इस मामले में नामांकन खारिज करने के खिलाफ मीनाक्षी नटराजन को अदालत से राहत मिल सकती है।